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इतिहासकार विजया रामास्वामी को याद करते हुए…

इतिहासकार विजया रामास्वामी का बीते दिनों निधन हो गया. उनके विपुल लेखन को एक सूत्र जो जोड़ता है, वह है इतिहास में महिलाओं की उपस्थिति दर्ज करने का प्रयास. दक्षिण भारत की महिला संतों पर उन्होंने जो लिखा है, वह विचारोत्तेजक होने के साथ ही जेंडर संबंधी इतिहास, धर्म, समाज, संस्कृति और पितृसत्ता की जटिल संरचना की समझ को समृद्ध करता है.

विजया रामास्वामी. (फोटो साभार: ट्विटर)

विजया रामास्वामी. (फोटो साभार: ट्विटर)

दक्षिण भारत के सामाजिक-आर्थिक इतिहास और भक्ति आंदोलन की गंभीर अध्येता इतिहासकार विजया रामास्वामी दो साल पहले वर्ष 2018 में वे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़ से सेवानिवृत्त हुई थीं.

वर्तमान में वे शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में टैगोर फेलो के रूप में महाभारत के तमिल संस्करणों में महिलाओं की उपस्थिति और जेंडर संबंधों पर शोध कर रही थीं., जहां  1 जून, 2020 की शाम उनका निधन हो गया.

मृदुभाषी और छात्रों से गहरा स्नेह रखने वाली विजया रामास्वामी के अध्ययन और रुचियों का दायरा बहुत ही विस्तृत था. उन्होंने संगम साहित्य से लेकर दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए सत्याग्रह में तमिल महिलाओं की भागीदारी और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में तमिल भाषा में चले शुद्धतावादी आंदोलन ‘तनि तमिल इयक्कम’ जैसे वैविध्यपूर्ण विषयों पर उत्कृष्ट काम किया.

विजया रामास्वामी ने अपनी उच्च शिक्षा जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़ से प्राप्त की थी. वर्ष 1972 में एमए की छात्रा के रूप में दाखिला लेने के बाद वे पीएचडी के बाद ही यहां से निकलीं.

उन्होंने मध्यकालीन दक्षिण भारत के बुनकर समुदायों पर अपना शोधग्रंथ लिखा था, जो 1985 में प्रकाशित हुआ. 1988-89 के दौरान कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कली में नेहरू फुलब्राइट फेलो रहीं.

जेएनयू में प्राध्यापक नियुक्त होने से पूर्व उन्होंने गार्गी कॉलेज और दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में भी अध्यापन किया. विजया रामास्वामी वर्ष 2012-2014 के दौरान नई दिल्ली स्थित नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय में भी वरिष्ठ फेलो रहीं.

इससे पूर्व वे वर्ष 1992 से 1994 तक भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में फेलो रही थीं, जब उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में दक्षिण भारत में महिला संतों पर काम किया था. उसी समय उनकी मां सेतु रामास्वामी भी शिमला में उनके साथ रहीं.

विजया रामास्वामी के आग्रह पर सेतु रामास्वामी ने उसी दौरान अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा लिखी थी, जो ‘ब्राइड एट टेन, मदर एट फिफ़्टीन’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी.

इतिहास में महिलाएं: महिला संतों से लेकर महिला सत्याग्रहियों तक  

विजया रामास्वामी के विपुल लेखन को एक सूत्र जो जोड़ता है, वह है इतिहास में महिलाओं की उपस्थिति को दर्ज करने का प्रयास. अक्का महादेवी, अंडाल जैसी महिला संतों पर उन्होंने ‘वॉकिंग नेकेड: विमन, सोसाइटी, स्प्रिचुअलिटी इन साउथ इंडिया’ और ‘डिविनिटी एंड डिवीएन्स : विमन इन वीरशैविज़्म’ सरीखी चर्चित किताबें लिखीं.

विजया रामास्वामी ने दक्षिण भारत की महिला संतों पर जो लिखा है, वह विचारोत्तेजक होने के साथ ही जेंडर संबंधी इतिहास, धर्म और अध्यात्म, समाज और संस्कृति, पितृसत्ता की जटिल संरचना की हमारी समझ को समृद्ध करता है.

आधुनिक भारत के संदर्भ में लिखते हुए विजया रामास्वामी ने दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए सत्याग्रह में भाग लेने वाली वलियम्मा, मंगलाथम्माल, वीरासामी, वी. नायडू, वीएस पिल्लै जैसी तमिल सत्याग्रही महिलाओं के बारे में विस्तार से लिखा.

साथ ही, उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा संपादित पत्र ‘इंडियन ओपिनियन’ के बारे में भी लिखा, जो अंग्रेज़ी, गुजराती, तमिल और हिंदी में प्रकाशित होता था. ‘इंडियन ओपिनियन’ के तमिल संस्करण में छपने वाली ख़बरों का विश्लेषण करते हुए उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के इतिहास और तमिल सांस्कृतिक अस्मिता की निर्मिति में इस पत्र की भूमिका को रेखांकित किया.

बुनकरों का इतिहास

विजया रामास्वामी के कृतित्व का एक बड़ा हिस्सा दक्षिण भारत में शिल्पकारों और दस्तकारों विशेषकर बुनकरों के इतिहास पर केंद्रित था. ‘टेक्सटाइल्स एंड वीवर्स इन मिडीएवल साउथ इंडिया’ और ‘द सॉन्ग ऑफ द लूम : वीवर फोक ट्रेडीशंस इन साउथ इंडिया’ जैसी बेहतरीन किताबें इसके अंतर्गत शामिल हैं.

बुनकरों पर लिखते हुए उन्होंने अनाल्स स्कूल के इतिहासकार फर्नांड ब्रादेल से प्रेरणा लेकर दीर्घकालिक इतिहास (लॉन्ग द्यूरी) की पद्धति का अनुसरण किया. यह अकारण नहीं कि बुनकरों के इस समृद्ध इतिहास को पढ़ते हुए आप दक्षिण भारत की भौगोलिक अवस्थिति, नदियों, मिट्टी के प्रकार, जलवायु से तो  परिचित होंगे ही. साथ ही, चोल और विजयनगर साम्राज्य के स्थानीय प्रशासन में बुनकरों, उनकी श्रेणियों (चेट्टी) की भूमिका और बुनकरों की लोक परंपरा से भी परिचित होंगे.

साथ ही वहां के समाज में रेशमी वस्त्रों के सामाजिक हैसियत का प्रतीक बनने, शाही वस्त्रों की भव्यता और सत्ता की वैधता स्थापित करने में उनकी भूमिका को भी समझ सकेंगे.

स्कूली बच्चों के लिए इतिहास

इतिहास की बेहतरीन किताबें लिखने के साथ ही विजया रामास्वामी ने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में भी लिखा. जहां वे गंभीर और शोधपरक लेखन में दक्ष थीं, वहीं वे स्कूली बच्चों के लिए लिखते हुए भी सहज थीं.

बारहवीं कक्षा के छात्रों के लिए इतिहास की पुस्तक में उन्होंने ‘विजयनगर साम्राज्य’ पर जो अध्याय लिखा है, वह इसका प्रमाण है. स्कूली बच्चों को विजयनगर साम्राज्य के इतिहास से रूबरू कराते हुए वे तत्कालीन राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था, संस्कृति, साहित्य का दिलचस्प ब्योरा देती हैं.

इस विवरण में जहां एक ओर ‘अमुक्तमाल्यद’ के रोचक संदर्भ आते हैं, वहीं अब्दुर रज्जाक, डोमिंगो पेस, बारबोसा सरीखे विदेशी यात्रियों के रोमांचक विवरण भी.

कालगत सीमाओं से परे जाकर सोचने और अतीत-वर्तमान के जटिल संबंधों की उनकी गहरी समझ का ही नतीजा है कि विजयनगर साम्राज्य पर लिखा गया यह अध्याय उन्नीसवीं सदी के पुराविद और ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी कर्नल कॉलिन मैकेंजी द्वारा हम्पी में किए गए ऐतिहासिक सर्वेक्षणों और उसके गहरे निहितार्थों के विवरण से शुरू होता है.

इतिहास, मिथक और गल्प के आईने में भारतीय महिलाएं

विजया रामास्वामी ने वर्ष 1998 में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की पत्रिका ‘स्टडीज़ इन ह्यूमेनिटीज़ एंड सोशल साइंसेज़’ का एक विशेषांक संपादित किया था जो इतिहास, गल्प और मिथकों में अभिव्यक्त होने वाली भारतीय महिलाओं की विविध छवियों और आत्म-छवियों पर केंद्रित था.

इस विशेषांक में कुमकुम रॉय, पैट्रिसिया ओबेरॉय, विद्या राव, राम्या श्रीनिवासन, नंदिनी सिन्हा, सोहिनी घोष, प्रदीप त्रिखा, नरेश जैन आदि विद्वानों ने लेख लिखे. इसी अंक में विजया रामास्वामी ने ‘द टेमिंग ऑफ अल्लि: मिथिक इमेजेज़ एंड तमिल विमन’ शीर्षक से एक लेख लिखा था. यह लेख तमिल मिथकों में महिलाओं की उपस्थिति और मिथकों के स्वरूप में आते बदलावों को रेखांकित करता था.

विजया रामास्वामी ने लिखा कि मिथकों और इतिहास से महिलाओं की आवाज़ों के पुनरुद्धार के दो तरीके हो सकते हैं. एक तो हम अपने अध्ययन के केंद्र में महिलाओं, हाशिये के समुदायों और सबाल्टर्न समूहों को रखें. दूसरे, हम ऐसे मिथकों पर ध्यान दें जो पितृसत्तात्मक संरचना के परे विकसित हुए हैं.

इसी क्रम में उन्होंने तमिल मिथकों को चुना. उनका मानना था कि इन्हें समझते हुए हम तमिल परंपरा में महिलाओं की छवियों और ब्राह्मणवादी-पितृसत्तात्मक परंपरा में गढ़ी गई महिलाओं से जुड़ी रूढ़ियों के बीच अंतरसंबंधों को जान सकेंगे.

इन अंतरसंबंधों की शुरुआत हमें इलांगो आदिगल रचित ‘शिलप्पादिकारम’ में ही देखने को मिल जाती है. बाद में, जब पल्लव शासकों ने ब्राह्मणों को भूमि अनुदान (ब्रह्मदेय) देना शुरू किया, तब ब्राह्मणवादी संस्कृति की पैठ और मजबूत हो गई.

विजया रामास्वामी के अनुसार, अल्लि का मिथक उस तमिल सामाजिक संरचना का उत्पाद है, जिसमें महिलाओं को निजी और सार्वजनिक दायरों में आवाजाही की आजादी थी. जहां उन्हें विवाह के लिए योग्य पुरुष चुनने की स्वतंत्रता थी और वे कृषि और पशुपालन जैसी आर्थिक गतिविधियों में पुरुषों के बराबर भागीदारी कर रही थीं.

ध्यान देने की बात है कि ब्राह्मणवादी संस्कृति के साक्षात्कार के साथ ही तमिल समाज में सामाजिक-आर्थिक विषमता और आगे चलकर जातिगत असमानता का प्रादुर्भाव हुआ. जिसमें आगे चलकर शुद्धता और अशुद्धि, अस्पृश्यता जैसी धारणाएं भी समाहित होती चली गईं.

इससे पूर्व आदिकालीन तमिल समाज में आर्थिक असमानता जरूर थी, लेकिन सामाजिक विषमता या जातिगत भेदभाव नहीं था.

विजया रामास्वामी के अनुसार, तमिलनाडु में प्रचलित अल्लि और अर्जुन के विवाह का मिथक महाभारत के महाआख्यान का एक क्षेत्रीय प्रतिरूप है. इसी क्रम में, महाभारत की नायिका द्रौपदी भी तमिल क्षेत्र में एक लोकदेवी के रूप में उभरीं. यही वजह है कि चिंगलपुट, दक्षिण अरकाट, सेलम आदि ज़िलों में द्रौपदी अम्मान के मंदिर आज भी हैं.

खुद अल्लि के मिथक को भी दक्षिण भारत की ‘मुदिमंगलीर’ (वीरांगना) परंपरा के अंतर्गत रखा जा सकता है. वीरांगनाओं की इस परंपरा का जिक्र संगम साहित्य के ग्रन्थों यथा ‘पत्तुप्पातु, ‘पुरनान्नरु’ में भी मिलता है. अल्लि का यह मिथक स्थानीय कल्ट का हिस्सा होने के साथ-साथ एक गैर-पितृसत्तात्मक समाज से जुड़ा था. जो संभवतः मातृवंशात्मक समाज था और कुछ हद तक मातृस्थानीय भी.

अल्लि का यह मिथक महाभारत के आख्यान के दक्षिण भारत में आने की यात्रा को तो सूचित करता ही है. साथ ही, यह ब्राह्मणवादी और गैर-ब्राह्मणवादी तमिल परंपरा के बीच तनाव को भी दर्शाता है.

पुगशेन्दी पुलवार द्वारा रचित ‘अल्लि अरसनी मलै’ और विल्लिपुत्तुरार रचित ‘विल्लिपुत्तु’ में इस मिथक का विवरण मिलता है, जो सत्ता से प्रतिरोध और सत्ता को अर्जित करने की ऐतिहासिक प्रक्रिया, राजनीतिक विजयों और साम्राज्य-विस्तार का भी सूचक है.

साथ ही, यह मिथक पितृसत्तात्मक मूल्यों को मानने से इनकार करने वाली अल्लि जैसी महिलाओं को लेकर गढ़ी गई रूढ़ सामाजिक छवियों और हरसंभव तरीके से ऐसी महिलाओं को पितृसत्ता के दायरे में लाने के प्रयासों के बारे में बताता है, जिसके अंतर्गत अल्लि जैसी योद्धा और कुशल प्रशासिका को महज एक निष्ठावान पत्नी और मां की भूमिका तक सीमित कर दिया जाता है.

आखिरकार वह पितृसत्ता और उसके बंधनों को सिर्फ़ स्वीकार ही नहीं कर लेती, बल्कि दूसरी महिलाओं को भी उसके दायरे में लाने में भागीदार बन जाती है.

(लेखक बलिया के सतीश चंद्र कॉलेज में पढ़ाते हैं.)