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मध्य प्रदेश: क्या भाजपा का बिना मंत्रिमंडल विस्तार किए सरकार चलाना असंवैधानिक है?

संविधान का अनुच्छेद 164 (1 ए) मुख्यमंत्री समेत कम से कम 12 मंत्रियों के मंत्रिमंडल की बात करता है, लेकिन बीते दो महीनों से शिवराज सिंह चौहान केवल पांच मंत्रियों के साथ सरकार चला रहे हैं. कहा जा रहा है कि उन्हें डर है कि मंत्रिमंडल विस्तार करने पर मंत्री न बन सकने से असंतुष्ट विधायक आगामी राज्यसभा चुनाव में कहीं क्रॉस-वोटिंग न कर दें.

(फोटो साभार: फेसबुक/ChouhanShivraj)

(फोटो साभार: फेसबुक/ChouhanShivraj)

मध्य प्रदेश में तख्तापलट के बाद भाजपा की शिवराज सिंह चौहान सरकार को बने ढाई महीने से अधिक समय बीत गया है. लेकिन, अब तक शिवराज सिंह की पूर्ण कैबिनेट (मंत्रिमंडल) का गठन नहीं हो पाया है. हालांकि, पांच मंत्रियों के साथ शिवराज काम कर रहे हैं, लेकिन संवैधानिक प्रावधान कहते हैं कि मुख्यमंत्री समेत कम से कम 12 मंत्रियों की कैबिनेट राज्य को चलाने के लिए जरूरी है.

शिवराज ने 23 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. आमतौर पर मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडल के साथ शपथ लेता है लेकिन शिवराज ने अकेले ही शपथ ली. इसके पीछे उन्होंने तर्क दिया कि अभी मंत्रिमंडल पर विचार करने का समय नहीं है क्योंकि कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है. तब उन्होंने जल्द ही मंत्रिमंडल गठित करने का आश्वासन दिया था.

लेकिन अगले 29 दिन तक शिवराज ने मंत्रिमंडल का गठन नहीं किया और सभी नीतिगत फैसले स्वयं ही लेते रहे. इस तरह देश के सबसे लंबे समय तक बिना मंत्रिमंडल के सरकार चलाने वाले मुख्यमंत्री बने.

तब कांग्रेसी नेता राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा और कपिल सिब्बल ने इस संबंध में राष्ट्रपति के नाम पत्र लिखा. जिसमें उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 164 (1ए) का हवाला दिया. जिसके तहत किसी सरकार में 12 मंत्रियों का होना आवश्यक है.

इसी प्रावधान के तहत कपिल सिब्बल और विवेक तन्खा ने राष्ट्रपति से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने और बिना मंत्रिमंडल के ही शिवराज सरकार द्वारा पारित किए अध्यादेशों को असंवैधानिक मानते हुए उन्हें वापस लेने की मांग की.

अगले ही दिन शिवराज ने पांच मंत्रियों के मंत्रिमंडल का गठन कर दिया, लेकिन यह मंत्रिमंडल भी अनुच्छेद 164 (1ए) की 12 मंत्री होने की आवश्यक शर्त पूरी नहीं करता था. इस पर भाजपा ने कोरोना का हवाला देते हुए दलील दी कि इस संकट भरे वक्त में मंत्रियों के नामों पर विचार करने का समय नहीं मिला है इसलिए फौरी तौर पर छोटा मंत्रिमंडल बनाया है.

उन्होंने जल्द ही मंत्रिमंडल विस्तार का आश्वासन दिया. लेकिन उस बात को भी अब डेढ़ महीने से अधिक का समय हो गया है, पर मंत्रिमंडल विस्तार नहीं हुआ है. पिछले दिनों जरूर शिवराज द्वारा 31 मई तक मंत्रिमंडल विस्तार के दावे किए गए थे लेकिन अब वो तारीख भी निकल चुकी है.

इस पर विवेक तन्खा द वायर से बातचीत में कहते हैं, ‘जब इन्होंने पांच मंत्री बनाए तो हमें लगा कि चलो आगे और बना लेंगे. कोरोना का दौर है, बार-बार इनके पीछे मत पड़ो. लेकिन अब लॉकडाउन खत्म हो गया. कार्यालय, बाजार, मंदिर भी खुल गए, लेकिन इनकी कैबिनेट का विस्तार कब होगा? वर्तमान कैबिनेट संवैधानिक अनिवार्यता पूरी नहीं करती, इसलिए उसके निर्णय भी असंवैधानिक हैं. अब तो केवल एक ही विकल्प बचता है कि अदालत का रुख करें. बाकी कोई और तरीका नहीं है उन्हें संविधान समझाने का.’

यहां सवाल उठता है कि आखिर शिवराज संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी क्यों कर रहे हैं? इस पर राज्य के वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीक्षित कहते हैं, ‘मंत्रिमंडल विस्तार डर के मारे नहीं हो पा रहा है. 19 जून को राज्यसभा चुनाव हैं, इसलिए शिवराज को डर है कि यदि विस्तार किया तो मंत्री न बन सके असंतुष्ट विधायक कहीं क्रॉस-वोटिंग न कर दें.’

वे आगे कहते हैं, ‘जो होगा इन चुनावों के बाद ही होगा. पहले पांच मंत्री भी बनाए तो वह उनकी संवैधानिक मजबूरी थी क्योंकि अकेला मुख्यमंत्री कैबिनेट नहीं हो सकता. अगर विवेक तन्खा और कपिल सिब्बल मामले को राष्ट्रपति तक नहीं ले जाते तो वे राज्यसभा चुनावों से पहले पांच मंत्री बनाने की भी औपचारिकता नहीं निभाते.’

गौरतलब है कि 19 जून को मध्य प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों पर चुनाव होने हैं. भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने दो-दो उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. एक-एक सीट दोनों ही दलों को निर्विरोध मिल जाएगी, लेकिन दूसरी सीट के लिए वोटिंग की नौबत आएगी.

पहले यह चुनाव 26 मार्च को होने थे. उस समय राज्यसभा की दूसरी सीट जीतने के लिए और प्रदेश में कांग्रेस सरकार गिराकर अपनी सरकार बनाने के लिए भाजपा ने राज्य के कांग्रेसी क्षत्रप ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके 22 समर्थक विधायकों से दल-बदल कराया था.

भाजपा को तब उम्मीद थी कि 26 मार्च को होने वाले चुनावों में वह दो सीट आसानी से जीत जाएगी. लेकिन, कोरोना के चलते तब चुनाव टाल दिए गए और भाजपा के मंसूबे अधर में लटक गए. इसी कारण तबसे भाजपा मंत्रिमंडल बनाने से कतरा रही है. उसे डर है कि मंत्री न बनाए जाने वाले विधायक चुनावों में उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं.

इस डर का कारण वाजिब भी है क्योंकि सिंधिया समर्थक 6 मंत्री समेत 22 विधायकों के भाजपा में आ जाने से पार्टी का अंदरूनी गणित गड़बड़ा गया है. शिवराज पर दबाव है कि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए कम से कम दस विधायकों को मंत्री बनाएं.

इस स्थिति में भाजपा में पहले से मौजूद रहे विधायकों की मंत्री पद की दावेदारी खतरे में आ गई है. राज्य में मुख्यमंत्री समेत अधिकतम 35 मंत्री बनाए जा सकते हैं. यानी कि मुख्यमंत्री के अलावा 34 विधायकों को मंत्री बनाया जा सकता है. पांच विधायकों को पार्टी मंत्री बना चुकी है. इस तरह 29 पद अभी खाली हैं.

जिन पांच विधायकों को मंत्री बनाया है उनमें से दो, गोविंद सिंह राजपूत और तुलसी सिलावट, सिंधिया खेमे से हैं. यह दोनों कांग्रेस सरकार में भी मंत्री थे. इनके अलावा सिंधिया खेमे के इमरती देवी, डॉ. प्रभुराम चौधरी, प्रद्युम्न सिंह तोमर और महेंद्र सिंह सिसोदिया भी कांग्रेस सरकार में मंत्री थे. इन चारों को भी मंत्रिमंडल में समायोजित करना है.

सिंधिया खेमे के ही राज्यवर्द्धन सिंह दत्तीगांव भी कांग्रेस सरकार में मंत्री न बनाए जाने से खफा थे, उन्हें भी मंत्रिमंडल में शामिल करना है. इनके अलावा कांग्रेस से भाजपा में आए ऐंदल सिंह कंसाना, बिसाहूलाल सिंह और हरदीप सिंह डंग कांग्रेस में सिंधिया विरोधी दिग्विजय सिंह खेमे के हुआ करते थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें मंत्री नहीं बनाया तो वे भी सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़ आए.

इस तरह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए आठ और विधायकों का मंत्री बनाया जाना तय है. यानी जो 29 मंत्री पद खाली हैं, उनमें से कम से कम 8 तो कांग्रेस के बगावती विधायकों को मिलना तय है. बाकी 21 पद भाजपा विधायकों में बांटे जाएंगे और शिवराज के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है.

जब शिवराज कैबिनेट में मंत्री बनने के सबसे मजबूत दावेदार भाजपा विधायकों की सूची बनाई गई, तब उसमें 33 नाम निकलकर सामने आए. यानी 21 सीटों पर कम से कम 33 दावेदारी हैं और सभी दावेदारी इतनी मजबूत हैं कि शिवराज और पार्टी आलाकमान के लिए उन्हें नजरअंदाज करना कठिन होगा.

इनमें 22 तो पूर्व मंत्री हैं. जबकि 11 दावेदार ऐसे हैं जो कई बार के विधायक हैं और पहली बार मंत्री बनने का सपना देख रहे हैं. संभावना तो ये भी है कि इन 21 पदों में में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए विधायकों को एक-दो पद और मिल जाएं.

हालांकि राकेश दीक्षित बताते हैं कि भाजपा के पास ऐसे 70 नामों की सूची पहुंची है जो मंत्री बनने की कतार में हैं. यदि इसे सही मानें तो भाजपा के लिए मंत्रिमंडल का गठन करना और भी अधिक टेढ़ी खीर साबित होगा.

इसलिए विवेक तन्खा कहते हैं, ‘जो बात पहले भाजपा हमारी सरकार के लिए कहती थी कि मंत्रिमंडल विस्तार करने पर वह गिर जाएगी, आज वही बात मैं भाजपा के लिए कहता हूं कि मंत्रिमंडल विस्तार उनकी सरकार को संकट में डाल देगा.’

हालांकि, भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल इन सभी बातों को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं, ‘भाजपा किसी राजनीतिक कारण से नहीं बल्कि कोरोना के कारण हुए लॉकडाउन के चलते मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर पाई है. आने वाले समय में मुख्यमंत्री केंद्रीय और राज्य के नेतृत्व के साथ विचार-विमर्श करके मंत्रिमंडल विस्तार कर देंगे. हमारे यहां न पांच मंत्री बनाने में संकट था, न 25 में होगा.’

विवेक तन्खा उनके इन दावों से इत्तेफाक नहीं रखते. उनका कहना है, ‘वे मंत्रिमंडल विस्तार कोरोना के चलते नहीं टाल रहे हैं बल्कि हकीकत तो यह है कि वे अपने अंदरूनी मतभेद हल नहीं कर पा रहे हैं. कांग्रेस छोड़कर पहुंचे विधायकों को मंत्रिमंडल में जगह देंगे तो इनके अपने विधायकों को ज्यादा मौके नहीं मिलेंगे. जिससे पार्टी के अंदर नाराजगी बढ़ेगी, अशांति फैलेगी और राज्यसभा चुनावों पर तो विपरीत असर पड़ेगा ही, साथ ही 24 सीटों पर होने वाले उपचुनावों में भी पार्टी के अंदर पनपा असंतोष और गुटबाजी उन्हें नुकसान पहुंचाएंगे. बस इसलिए अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते वे संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी कर रहे हैं.’

इस बात से राकेश दीक्षित भी इत्तेफाक रखते हैं. वे कहते हैं, ‘एक तरफ उपचुनाव अभी हो नहीं रहे, दूसरी तरफ सिंधिया का दबाव है. सिंधिया के दबाव से भाजपा में भी असंतोष है क्योंकि उनके समर्थकों के आने से कइयों का राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ गया है. विधायक देख रहे हैं कि सब कुछ हाथ से जा रहा है. अत: हाईकमान के भरोसे में न रहकर वे बगावती तेवर दिखा रहे हैं इसलिए भाजपा हाईकमान भी इतना ज्यादा मजबूत नहीं रहा. ऊपर से 29 पदों पर 70 दावेदारी हैं. किस-किसको बनाएंगे? जो न बना वो नाराज.’

मुख्यमंत्री, भाजपा और पार्टी नेतृत्व पर उठ रहे इन सवालों के बचाव में रजनीश कहते हैं, ‘भाजपा में कोई गुटबाजी नहीं है. सिंधिया जी के आने से सिंधिया गुट बन गया हो, ऐसा नहीं है. सिंधिया और उनके साथ आए नेता अब भाजपा के ही हैं. मंत्रिमंडल विस्तार में गुटबाजी जैसा कुछ नहीं है. हम कोई पहली दफा मंत्रिमंडल विस्तार नहीं कर रहे, अपने 15 सालों के शासन में हमने मंत्रिमंडल विस्तार की दृष्टि से पहले भी कई बड़े निर्णय लिए हैं. 15 में से 13 साल शिवराज ही मुख्यमंत्री थे.’

मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते शिवराज सिंह चौहान. (फोटो साभार: फेसबुक/ChouhanShivraj)

मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते शिवराज सिंह चौहान. (फोटो साभार: फेसबुक/ChouhanShivraj)

हालांकि, यह पूछे जाने पर कि कब संवैधानिक प्रावधानों के तहत प्रदेश में मंत्रिमंडल बनेगा, क्या राज्यसभा चुनावों के बाद उम्मीद है, वे कहते हैं, ‘उम्मीद की बात करें तो यह विशुद्ध रूप से मुख्यमंत्री का अधिकार है. जहां तक राज्यसभा के बाद की बात है तो मुख्यमंत्री के सामने सभी परिस्थितियां हैं, अब केंद्रीय और राज्यीय नेतृत्व के साथ विचार-विमर्थ करके वे जो भी फैसला लें.’

इस सबके इतर प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता रवि सक्सेना का कहना है कि भाजपा उपचुनाव तक मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं करेगी. वे कहते हैं, ‘वे राज्यसभा चुनाव के बाद भी विस्तार नहीं करेंगे. सिंधिया को राज्यसभा भेजकर इतिश्री कर लेंगे और विस्तार उपचुनाव तक टालेंगे ताकि पार्टी एकजुट बनी रहे जिससे उपचुनाव में बहुमत जीत ले. उसके बाद तो वे अपनी मनमर्जी करने के लिए स्वतंत्र होंगे.’

बहरहाल, राज्यसभा चुनाव को परे रखकर भी देखें तो मंत्रिमंडल विस्तार शिवराज के लिए आसान नहीं होने वाला है, क्योंकि कांग्रेस विधायकों के भाजपा में आने के बाद जातीय, गुटीय और क्षेत्रीय संतुलन बनाना उनके लिए मुश्किल होगा.

उदाहरण के लिए वर्तमान मंत्रिमंडल पर नजर डालें तो छह अंचलों में विभाजित प्रदेश के 5 अंचलों से सभी मंत्री ताल्लुक रखते हैं. यानी कि मुख्यमंत्री के अतिरिक्त प्रत्येक अंचल से एक मंत्री बनाया गया है. वहीं, इन मंत्रियों में एक महिला, एक आदिवासी, एक ब्राह्मण, एक ओबीसी और एक दलित है.

आगे भी ऐसा ही संतुलन शिवराज को बनाकर चलना होगा और यही संतुलन बनाना उनके लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. हमारे आकलन के मुताबिक, कुल 33 भाजपा विधायकों और आठ कांग्रेस के बागी विधायकों की दावेदारी मिलाकर 29 पदों पर कम से कम 41 दावेदार तो सामने हैं ही.

इनके अलावा भी और दावेदार हो सकते हैं. इनमें 8 कांग्रेस विधायकों का मंत्री बनना तय है. जिनमें 4 चंबल से हैं (इन्हें मंत्री बनाना शिवराज और भाजपा की विवशता होगी क्योंकि चंबल की 16 सीटों पर उपचुनाव हैं), एक मध्यांचल से, एक विंध्य से और एक मालवा-निमाड़ से हैं.

इनके मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद मंत्रिमंडल में 13 मंत्री हो जाते हैं जिनमें 5 मंत्री चंबल से हो जाएंगे और महाकौशल छोड़कर बाकी अंचलों से दो-दो मंत्री हो जाएंगे. इनके अलावा चंबल से अरविंद भदौरिया का भी मंत्री बनना तय है जिन्होंने कांग्रेस की सरकार गिरवाने में सक्रिय भूमिका निभाई थी.

इसी तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया की बुआ और पूर्व मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया का भी नाम तय हैं. बचे 19 पदों में भी पूर्व मंत्री विश्वास सारंग, भूपेंद्र सिंह, संजय पाठक और विजय शाह वे नाम हैं जो कांग्रेस सरकार गिराने में अहम कड़ी बने या विपक्ष में बैठकर कमलनाथ सरकार से सीधा टकराव लेते रहे.

इन चारों को भी मंत्री बनाया गया तो बचे 15 पदों पर भाजपा को सभी जातीय, क्षेत्रीय और गुटीय संतुलन बैठाने पड़ेंगे. सबसे बड़ा अंचल होने के नाते मालवा-निमाड़ और महाकौशल को भी मंत्रिमंडल में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना होगा, जो आसान नहीं होगा. और वो भी तब जब ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि मंत्रिमंडल गठन में शिवराज की चल नहीं रही है.

इन कयासों को बल इसलिए भी मिल रहा है क्योंकि वर्तमान 5 मंत्रियों में उनका चहेता कोई नहीं है. इसके उलट उन कमल पटेल को मंत्री बनाया गया है जिन्होंने एक वक्त रेत खनन के मुद्दे पर शिवराज सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला था और नतीजतन साइडलाइन कर दिए गए थे.

भोपाल के एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं, ‘पांचों मंत्रियों के नामों पर मुहर केंद्र से लगी थी. कोरोना महामारी को ध्यान में रखकर शिवराज के अनुभव को देखते हुए केंद्रीय नेतृत्व उन्हें मुख्यमंत्री तो बना दिया, लेकिन उनकी चल नहीं रही है. एक कारण यह भी है जिसके चलते टकराव के हालात बन रहे हैं और मंत्रिमंडल विस्तार में रोड़े अटक रहे हैं.’

गौरतलब है कि जब कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और अगले कुछ दिन मंत्रिमंडल का गठन नहीं कर पाए थे तो भाजपा लगातार इस देरी के चलते उन पर हमलावर बनी हुई थी. लेकिन, अब स्वयं भाजपा ने पहले तो मंत्रिमंडल के गठन में देरी की और अब विस्तार पर महीनों से चुप्पी साधे है. इसलिए रवि सक्सेना कहते हैं कि भाजपा की कथनी और करनी में बहुत अंतर है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)