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पूरा पारिश्रमिक न देने वाले निजी प्रतिष्ठानों के ख़िलाफ़ न हो दंडात्मक कार्रवाई: सुप्रीम कोर्ट

लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों को तनख़्वाह देने के मुद्दे को सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उद्योगों और श्रमिकों को एक-दूसरे की ज़रूरत है और पारिश्रमिक का मुद्दा साथ बैठकर सुलझाना चाहिए. साथ ही शीर्ष अदालत ने गृह मंत्रालय से कर्मचारियों को लॉकडाउन में पारिश्रमिक देने संबंधी उसके सर्कुलर की वैधता पर हलफनामा दाखिल करने को कहा है.

Ghaziabad: Migrant labourers made to sit under a flyover on the Hapur Road at a safe social distance by the district administration, during complete lockdown in the view coronavirus pandemic, in Ghaziabad, Thursday, March 26, 2020. (PTI Photo/Arun Sharma)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया कि कोरोना महामारी की वजह से लागू लॉकडाउन के दौरान अपने श्रमिकों को पूर्ण पारिश्रमिक नहीं देने वाली निजी कंपनियों के खिलाफ जुलाई के अंतिम सप्ताह तक कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए.

जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने कहा कि उद्योगों और श्रमिकों को एक-दूसरे की जरूरत है और उन्हें पारिश्रमिक के भुगतान का मुद्दा एक साथ बैठकर सुलझाना चाहिए.

पीठ ने वीडियो कांफ्रेन्सिंग के माध्यम से निजी प्रतिष्ठानों की याचिका पर अपना आदेश सुनाते हुए राज्य सरकारों से कहा कि वे इस तरह के समाधान की प्रक्रिया की सुविधा मुहैया कराएं और इस बारे में संबंधित श्रमायुक्त के यहां अपनी रिपोर्ट पेश करें.

इस बीच, न्यायालय ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के 29 मार्च के सर्कुलर की वैधता के बारे में चार सप्ताह के भीतर एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. इसी सर्कुलर में कहा गया था कि लॉकडाउन के दौरान निजी प्रतिष्ठान अपने कर्मचारियों को पूरा पारिश्रमिक देंगे.

न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा कि वे श्रम विभाग के मार्फत उसका आदेश प्रेषित करके समझौता प्रक्रिया शुरू करें. पीठ ने इस सर्कुलर की वैधता को चुनौती देने वाली तमाम कंपनियों की याचिकाओं को अब जुलाई के अंतिम सप्ताह में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया है.

गृह मंत्रालय ने 29 मार्च को एक सर्कुलर जारी कर सभी कंपनियों और नियोक्ताओं को निर्देश दिया था कि वे अपने यहां कार्यरत सभी श्रमिकों और कर्मचारियों को बगैर किसी कटौती के लॉकडाउन की अवधि में पूरे पारिश्रमिक का भुगतान करें.

श्रम एवं रोजगार सचिव ने भी सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखा था जिसमें नियोक्ताओं को यह सलाह देने के लिए कहा गया था कि कोविड-19 महामारी के मद्देनज़र वे अपने कर्मचारियों को न हटाएं और न ही उनका पारिश्रमिक कम करें.

इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा था कि लॉकडाउन के बाद से कामगारों के पलायन के मद्देनज़र ही सरकार ने अधिसूचना जारी की थी ताकि श्रमिकों को पारिश्रमिक का भुगतान करके कार्यस्थल पर ही उनके रुके रहने को सुनिश्चित किया जा सके.

गृह मंत्रालय के 29 मार्च के सर्कुलर को सही ठहराते हुए वेणुगोपाल ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन कानून के प्रावधानों का भी हवाला दिया था.

केंद्र ने भी एक हलफनामा दाखिल कर 29 मार्च के निर्देशों को सही ठहराते हुए कहा था कि अपने कर्मचारियों और श्रमिकों को पूरा भुगतान करने में असमर्थ निजी प्रतिष्ठानों को अपनी ऑडिट की गई बैंलेंस शीट और खाते न्यायालय में पेश करने का आदेश दिया जाना चाहिए.

गृह मंत्रालय ने न्यायालय से कहा था कि 29 मार्च का निर्देश लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों और श्रमिकों, विशेषकर संविदा और दिहाड़ी कामगारों की वित्तीय परेशानियों को कम करने के इरादे से एक अस्थाई उपाय था. इन निर्देशों को 18 मई से वापस ले लिया गया है.

इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सरकार से जानना चाहा था कि क्या औद्योगिक विवाद कानून के कुछ प्रावधानों को लागू नहीं किए जाने के तथ्य के मद्देनज़र केंद्र के पास कर्मचारियों को शत-प्रतिशत भुगतान नहीं करने वाली इकाइयों पर मुकदमा चलाने का अधिकार है.

न्यायालय ने चार जून को इस मामले की सुनवाई पूरी करते हुए कहा था कि वर्तमान परिस्थितियों में नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच बातचीत से इन 54 दिनों के वेतन के भुगतान का समाधान खोजने की आवश्यकता है.

बता दें कि इससे पहले भी 15 मई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कोविड-19 महामारी की वजह से देश में लागू लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों को पूरा वेतन देने में असमर्थ कंपनियों और नियोक्ताओं के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए.

शीर्ष अदालत ने कहा था कि ऐसी छोटी-छोटी कंपनियां हो सकती हैं जिनकी आमदनी नहीं हो और वे पूरा पारिश्रमिक देने में असमर्थ हों.