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क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने वाली प्रक्रिया में बदलाव की ज़रूरत है?

भारत में खेती के क्षेत्र में ज़बरदस्त विविधता होती है लेकिन जब भारत सरकार कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की अनुशंसा पर न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण करती है, तब वह मूल्य पूरे देश के लिए एक जैसा ही होता है.

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(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

भारत में कृषि उपज की लागत का सही-सही निर्धारण होता है? जवाब है – बिलकुल नहीं! भारत में कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के द्वारा किया जाता है.

जनवरी 1965 में जब इसकी स्थापना हुई थी, तब इसे कृषि मूल्य आयोग के नाम से जाना जाता था. वर्ष 1985 में इसमें लागत निर्धारण का हिस्सा जुड़ा और इसे तभी से इसे कृषि लागत एवं मूल्य आयोग कहा जाता है.

वर्ष 2009 से न्यूनतम समर्थन मूल्य के निर्धारण में उत्पादन की लागत, मांग और आपूर्ति की स्थिति, आदान मूल्यों में परिवर्तन, मंडी मूल्यों का रुख, जीवन निर्वाह लागत पर प्रभाव और अन्तराष्ट्रीय बाज़ार के मूल्य को ध्यान में रखा जाता है.

हमें यह जिज्ञासा होना चाहिए कि न्यूनतम समर्थन मूल्यों के निर्धारण में किसान और खेतिहर मजदूर का क्या स्थान होता है?

कृषि एवं किसान मंत्रालय ने राज्य सभा में यह वक्तव्य दिया है कि खेती के उत्पादन की लागत के निर्धारण में केवल नकद या जिंस से सम्बंधित खर्चे ही शामिल नहीं होते हैं, बल्कि इसमें भूमि और परिवार के श्रम के साथ-साथ स्वयं की संपत्तियों का अध्यारोपित मूल्य भी शामिल होता है. क्या सचमुच?

मसला यह है कि भारत में खेती के क्षेत्र में जबरदस्त विविधता होती है. जलवायु, भौगोलिक स्थिति, मिट्टी का प्रकार और सांस्कृतिक व्यवहार. ये सब कृषि के तौर तरीकों को गहरे तक प्रभावित करते हैं लेकिन जब भारत सरकार कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की अनुशंसा पर न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण करती है, तब वह मूल्य पूरे देश के लिए एक जैसा ही होता है.

आयोग पूरे देश की विविधता को इकठ्ठा करके एक औसत निकाल लेता है और न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कर देता है. आयोग के अपने खुद के ही आंकलन बताते हैं कि देश में उत्पादन की परिचालन लागत (इसमें श्रम, बीज, उर्वरक, मशीन, सिंचाई, कीटनाशी, बीज, ब्याज और अन्य खर्चे शामिल हैं) और खर्चे भिन्न-भिन्न होते हैं, फिर भी न्यूनतम समर्थन मूल्य एक जैसा क्यों?

इसमें मानव श्रम के हिस्से को खास नज़रिए से देखने की जरूरत है क्योंकि कृषि की लागत कम करने के लिए सरकार की नीति है कि खेती से मानव श्रम को बाहर निकाला जाए.

पिछले ढाई दशकों में इस नीति ने खेती को बहुत कमज़ोर किया है. इन सालों में लगभग 11.1 प्रतिशत लोग खेती से बाहर तो हुए हैं, किन्तु उनके रोज़गार कहीं दूसरे क्षेत्र में भी सुनिश्चित हो पा रहे हों, यह दिखाई नहीं देता.

न्यूनतम समर्थन मूल्य और उत्पादन की परिचालन लागत को मानव श्रम के नज़रिए से देखना जरूरी है. कृषि लागत और मूल्य आयोग ने ही वर्ष 2014-15 के सन्दर्भ में रबी और खरीफ की फसलों की परिचालन लागत का अध्ययन किया, इससे पता चलता है कि कई कारकों के चलते अलग-अलग राज्यों में उत्पादन की बुनियादी लागत में बहुत ज्यादा अंतर आता है.

हम कुछ उदाहरण देखते हैं –

चना – बिहार में एक हेक्टेयर में चने की खेती में 18,584 रुपये की परिचालन लागत आती है, जबकि आंध्रप्रदेश में 30,266 रुपये, हरियाणा में 17,867 रुपये, महाराष्ट्र में 25,655 रुपये और कर्नाटक में 20,686 रुपये लागत आती है.

इस लागत में अंतर आने एक बड़ा कारण मजदूरी पर होने वाला खर्च शामिल है. हमें यह ध्यान रखना होगा कि खेती से सिर्फ किसान ही नहीं कृषि मजदूर भी जुड़ा होता है.

बिहार में कुल परिचालन लागत में 44.3 प्रतिशत (8,234.6 रुपये), आंध्रप्रदेश में 44.2 प्रतिशत (13,381.3 रुपये) हरियाणा में 65.6 प्रतिशत (11,722 रुपये), मध्यप्रदेश में 33.4 प्रतिशत (6,966 रुपये), राजस्थान में 48 प्रतिशत (7,896 रुपये) हिस्सा मजदूरी व्यय का होता है.

चने की प्रति हेक्टेयर परिचालन लागत अलग-अलग राज्यों में 16,444 रुपये से लेकर 30,166 रुपये के बीच आ रही है.

गेहूं – यह एक महत्वपूर्ण उत्पाद है. इसके अध्ययन से पता चलता है कि खेती के मशीनीकरण के आखिर कहां असर किया है? पंजाब गेहूं के उत्पादन में अग्रणी राज्य है. वहां गेहूं उत्पादन की परिचालन लागत 23,717 रुपये प्रति हेक्टेयर है, इसमें से वह केवल 23 प्रतिशत (5,437 रुपये) ही मानव श्रम पर व्यय करता है, वह मानव श्रम से ज्यादा मशीनी श्रम पर खर्च करता है.

जबकि हिमाचल प्रदेश में परिचालन लागत 22,091 रुपये है, जिसमें से 50 प्रतिशत हिस्सा (10,956 रुपये) मानव श्रम का है. इसी तरह राजस्थान में गेहूं उत्पादन की परिचालन लागत पंजाब और हिमाचल प्रदेश की तुलना लगभग डेढ़ गुना ज्यादा है. और वहां लागत का 48 प्रतिशत (16,929 रुपये) हिस्सा मानव श्रम पर व्यय होता है.

इसी तरह मध्य प्रदेश 25,625 रुपये में से 33 प्रतिशत (8,469 रुपये), पश्चिम बंगाल 39,977 रुपये की परिचालन लागत में से 50 प्रतिशत (19,806 रुपये), बिहार 26,817 रुपये में से 36 प्रतिशत (9,562 रुपये) मानव श्रम पर व्यय करते हैं.

गेहूं की बुनियादी लागत 20,147 रुपये से 39,977 रुपये प्रति हेक्टेयर के बीच आई थी.

धान – अनाजों के समूह में चावल महत्वपूर्ण स्थान रखता है, इसलिए धान की फसल को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता है. हिमाचल प्रदेश में धान के उत्पादन की परिचालन लागत 26,323 रुपये प्रति हेक्टेयर है. इसमें से 72 प्रतिशत (19,048 रुपये) मानव श्रम पर व्यय होते हैं.

बिहार में 26,307 रुपये में से 58 प्रतिशत (15,281 रुपये), गुजरात में 41,447 रुपये में से 47 प्रतिशत (19,507 रुपये), पंजाब में 34,041 रुपये में से 43 प्रतिशत (14,718 रुपये), झारखंड में 23,875 में से 56 प्रतिशत (13342 रुपये), मध्य प्रदेश में 28,415 रुपये में से 44 प्रतिशत (12,449 रुपये) मानव श्रम पर व्यय होते हैं.

वर्ष 2014-15 में धान की परिचालन लागत अलग अलग राज्यों में 23,875 रुपये (झारखंड) से 54,417 रुपये (महाराष्ट्र) के अंतर तक पंहुचती है.

मक्का – अनाजों के परिवार में मक्का का बहुत महत्व है. ओड़ीसा में मक्का उत्पादन की परिचालन लागत 39,245 रुपये प्रति हेक्टेयर है, इसमें से 59 प्रतिशत हिस्सा (23,154 रुपये) मानव श्रम पर व्यय होता है.

हिमाचल प्रदेश में 21,913 रुपये में से 62 प्रतिशत, गुजरात में 35,581 रुपये में से 57 प्रतिशत, महाराष्ट्र 58,654 रुपये प्रति हेक्टेयर की लागत आती है, इसमें से 26,928 रुपये (58 प्रतिशत) और राजस्थान में 33,067 रुपये में से 58 प्रतिशत और मध्यप्रदेश में 24,518 रुपये में से 47 प्रतिशत खर्च मानव श्रम पर होता है.

मक्का की परिचालन लागत उत्तर प्रदेश में 19,648 रुपये प्रति हेक्टेयर से तमिलनाडु में 59,864 रुपये प्रति हेक्टेयर के बीच बतायी गयी.

गेहूं, धान, चना और मक्का की उत्पादन परिचालन लागत में इतनी विभिन्नता होने के बावजूद, सभी राज्यों के न्यूनतम समर्थन मूल्य एक समान ही तय किया गया, इससे किसानों को अपनी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पाया.

संविधान के मुताबिक कृषि राज्य सरकार के दायरे का विषय है, किन्तु वास्तविकता यह है कि विश्व व्यापार संगठन से लेकर न्यूनतम समर्थन मूल्य और कृषि व्यापार नीतियों तक को तय करने का अनाधिकृत काम केंद्र सरकार करती है, इससे राज्य सरकारों को कृषि की बेहतरी के काम करने से स्वतंत्र अवसर नहीं मिल पाये.

बड़े बदलाव तो हम छोड़ दें, विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री यह भी नहीं समझ पाये कि देश और समाज को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने में किसान और खेती की ही भूमिका होती है, बड़े धनपशुओं की नहीं!

(लेखक सामाजिक शोधकर्ता हैं.)