भारत

बिहार चुनाव: कांग्रेस, वाम, राजद और नागरिक संगठनों का साथ आना वक़्त की ज़रूरत है

देश के आम नागरिक, गैर-दलीय राजनीतिक कार्यकर्ता, कांग्रेस सहित सामाजिक न्याय के पक्षधर क्षेत्रीय दल और वाम दल सभी चाहते हैं कि मिलकर संघर्ष किया जाए. वे इस बात के लिए तैयार हैं कि भाजपा की विखंडनकारी और तानाशाही प्रवृतियों के ख़िलाफ़ यह लड़ाई चुनावी मोर्चे के साथ राष्ट्र-निर्माण के लिए भी हो.

राजद के तेजस्वी यादव, लेफ्ट के कन्हैया कुमार और कांग्रेस के मदन मोहन झा. (फोटो: पीटीआई/रॉयटर्स/ट्विटर)

राजद के तेजस्वी यादव, लेफ्ट के कन्हैया कुमार और कांग्रेस के मदन मोहन झा. (फोटो: पीटीआई/रॉयटर्स/ट्विटर)

बिहार में लॉकडाउन शुरू होने से कुछ ही दिन पहले कुछ वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने- कभी दो-तीन लोग एक साथ और कभी अकेले भी- तीनों कम्युनिस्ट पार्टियों (सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई एमएल) के महासचिवों तथा कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के वरिष्ठ नेताओं से आगामी  विधानसभाचुनाव से संबद्ध मुद्दों को ध्यान में रखते हुए कुछ मुलाकातें कीं.

इन कार्यकर्ताओं ने अपने संगठनों की ओर से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत हैसियत से यह बातचीत की. इन चर्चाओं का मुख्य उद्देश्य इन दलों के नेताओं को पार्टी और चुनावी राजनीति से हटकर काम कर रहे राजनीतिक संगठनों की व्यापक साझा चिंता से अवगत कराना था.

यह चिंता आगामी बिहार विधानसभा चुनावों में इन राजनीतिक दलों के बीच फौरी एकता को लेकर थी.

ये सभी कार्यकर्ता समूह शिद्दत से यह महसूस करते हैं कि राष्ट्र-निर्माण के परस्पर विपरीत आख्यानों के द्वंद के इस दौर में गैर-भाजपा दल कुछ खास नहीं कर रहे हैं और अपनी आपसी एकता के प्रयासों के प्रति भी सुस्त हैं.

इन वरिष्ठ नेताओं से बातचीत के बाद, सामाजिक कार्यकर्ताओं के ये तीन साझे निष्कर्ष थे –

(1) आरएसएस- भाजपा सत्ताधीशों के चरित्र के बारे में इन दलों का आकलन मोटे तौर पर एक जैसा ही था.

(2) इनमें से कोई भी राजनीतिक दल अंतर्दलीय वाम लोकतांत्रिक गठबंधन के लिए तुरंत कोई साहसिक, समयबद्ध पहल करने नहीं जा रहा है.

(3) ये सभी दल अपने-अपने दायरों में सिमटे हैं और आरएसएस-भाजपा की लगातार बढ़ती जा रही चुनौती का मुकाबला करने की इन्हें कोई जल्दी नहीं लगती.

ये बात समझ से परे है कि एक तरफ तो इनमें से ज़्यादातर नेता एनडीए के बारे में एकदम स्पष्ट नकारात्मक राय रखते हैं लेकिन दूसरी तरफ, इसका मुकाबला करने को आपस में एकता कायम करने की उन्हें कोई जल्दी नहीं महसूस होती.

क्या ये उम्मीद करना एकदम अव्यावहारिक है कि इन दलों के नेता मौजूदा राजनीतिक स्थिति को संपूर्णता में देखें और एक व्यापक वाम लोकतांत्रिक मोर्चे में अपने-अपने दलों की भूमिका की बात सोचें?

एक वाम दल के नेता ने ये महत्वपूर्ण की बात कही कि विभिन्न दलों के बीच सिद्धांतों एवं कार्यक्रम-आधारित व्यावहारिक एकता होनी चाहिए, आखिरी दौर में मात्र सीटों के बंटवारे से बात नहीं बनेगी.

ऐसी व्यावहारिक एकता के लिए, सामाजिक विकास में शानदार उपलब्धियों वाला केरल का उदाहरण एक पुख्ता संदर्भ-बिंदु है.

आधुनिक केरल के निर्माण में, अनेक ऐतिहासिक कारकों की भूमिका तो थी ही लेकिन 1970 के दशक में सीपीआई-कांग्रेस गठबंधन की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही जिसके तहत राज्य में पहली बार पूर्ण कार्यकाल संपन्न करने वाली सरकार बनी.

साथ ही, जमीन से शिखर तक एक विकेंद्रीकृत योजना मॉडल, केरल शास्त्र साहित्य परिषद (केएसएसपी) जैसे सशक्त सामाजिक संगठन, सरकार की पहल पर बनी राज्य भर में सक्रिय गैर-सरकारी संस्था- कुटुंबश्री, और स्थानीय पंचायतों के साथ सहयोग- ये ऐसे ठोस उदाहरण हैं जिनसे बिहार जैसे राज्य बहुत कुछ सीख सकते हैं.

बिहार में वाम दलों को सामाजिक न्याय की ताकतों के साथ समुचित गठबंधन का इंतजार किए बिना ऐसे जमीनी नागरिक संगठनों, जिनको भाजपा आसानी से फुसला न सके, के साथ मिलकर एक संयुक्त जन-घोषणापत्र बनाना चाहिए.

भाजपा के ‘सप्तर्षि’ यानी बूथ-स्तरीय सात कार्यकर्ताओं की टीम का मुकाबला तीन चरणों की इस रणनीति से किया जा सकता है –

1. प्रतिबद्ध गैर-एनडीए ताकतों के बीच मोटे तौर पर सीटों का बंटवारा

2. जमीनी जन-संगठनों एवं स्वयंसेवी संगठनों से तुरंत संपर्क कायम करना

3. समय रहते एक विश्वसनीय घोषणा-पत्र तैयार करना, जिसका इस्तेमाल जन-शिक्षण और जन-जागरण के लिए किया जा सके.

केरल के बाद संभवतः बिहार में ही सबसे बड़ा राजनीतिक चेतना-संपन्न नागरिक समाज है. लेकिन कुछ ऐतिहासिक कारणों से बिहार कांग्रेस और इन जन-संगठनों के बीच जीवंत और घनिष्ठ संबंध नहीं है.

राजनीतिक दलों को यह एहसास होना चाहिए कि बिहार के जन-संगठनों का मूल आधार 1974-1977 का जन आंदोलन रहा है और बिहार आंदोलन तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अपनाए गए संवैधानिक मूल्यों के आधारभूत स्रोत समान हैं.

इस समय बड़ी संख्या में जमीनी स्तर पर काम कर रहे ऐसे संगठन और व्यक्ति हैं जो भाजपा और आरएसएस के देश-समाज को तोड़ने वाले विचार के विरुद्ध राष्ट्र-निर्माण के विचार को फिर से सबल बनाने के लिए योगदान दे पाने का मंच तलाश रहे हैं.

आम जन के ये प्रयास सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए प्रतिबद्ध तो हैं जिसकी बात आरजेडी और अन्य दल कर रहे हैं, लेकिन ये जन-संगठन कहीं अधिक व्यापक, समग्र और सामाजिक परिवर्तनकारी एजेंडे के लिए काम करना चाहते हैं.

जेपी आंदोलन की धरोहर के अलावा बिहार में अपनी ही अंतर्निहित प्रेरणा से पहल कर रहे ऐसे अनेक नए युवा प्रयास हैं जिनकी बिहार के हित-अहित को लेकर अपनी धारणाएं हैं. ये सभी एनडीए की समाज को बांटने वाली नीतियों के विरोधी हैं.

वो इस बात को भली-भांति समझते हैं कि भाजपा के कोई नैतिक मूल्य तो हैं नहीं, और वह चोरी-छिपे ऐसे व्यक्तियों और दलों को समर्थन देने लगेगी ताकि एनडीए-विरोधी वोट बंट जाए. लेकिन इन व्यक्तियों और संगठनों से किसी विपक्षी दल ने भी आगे बढ़ कर समर्थन नहीं मांगा है.

जैसा पहले कहा गया कि ये व्यक्ति और समूह अपनी ही अंतरात्मा से प्रेरित होकर अपना योगदान कर रहे हैं. यदि इन्हें जोड़ा जाए तो ये समूह स्थानीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन के ‘बेहतर’ उम्मीदवारों के लिए काम कर सकते हैं.

इनमें से अधिकतर समूहों ने कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान प्रवासी कामगारों की मदद के लिए काम किया और इन लोगों के प्रति एनडीए सरकारों की संवेदनहीनता से ये बहुत व्यथित हैं.

लेकिन ये इस बात से भी असंतुष्ट हैं कि इन प्रवासियों के साथ हुए अन्याय के मुद्दे पर नीतीश कुमार की नीतियों के खिलाफ बिहार में विपक्षी दलों ने जोरदार तरीके से विरोध क्यों नहीं किया.

जेपी आंदोलन के नेताओं ने 5 जून 2020 को व्यक्तिगत रूप से विरोध मार्च निकाला जिसमें 225 से ज्यादा लोग शामिल हुए और आयोजकों में से प्रमुख दिनेश सिंह के अनुसार करीब इतने ही लोग भारी बरसात की वजह से मार्च में शामिल नहीं हो सके.

इन समूहों का एक बड़ा वर्ग ये शिद्दत से महसूस करता है कि कांग्रेस को नागरिक समूहों सहित विपक्षी राजनीति के विभिन्न घटकों को एक सूत्र में पिरोने की पहल करनी चाहिए.

इन नागरिक समूहों में ज़्यादातर को चुनाव में टिकट पाने की आकांक्षा नहीं है. वे चुनावी राजनीति में अपनी सीमाएं समझते हैं. लेकिन वे चाहते हैं कि राष्ट्र-निर्माण और लोकतंत्र की रक्षा की मुहिम के सहयात्री के रूप में अपनी मान्यता चाहते हैं.

चुनावों में इन संगठनों और व्यक्तियों के अप्रत्यक्ष प्रभाव को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए. ये सरकारी प्रचार-कथा के प्रतिरोध में नए आख्यान गढ़ते हैं.

उदाहरण के तौर पर, नंदीग्राम-सिंगूर के ‘संघर्ष’ में विभिन्न आंदोलनकारी समूहों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अनेक प्रेक्षकों का मानना है कि इससे तृणमूल कांग्रेस को सत्ता हासिल करने में मदद मिली.

जिग्नेश मेवाणी, हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकुर के भाजपा-विरोधी अभियान ने पिछले गुजरात विधान सभा चुनावों में भाजपा की बढ़त कम करने में महत्वपूर्ण योगदान किया.

व्यापक आधार वाला गठबंधन बनाने का एक सकारात्मक पहलू ये है कि बिहार में कई अन्य राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश की तुलना में चुनौतियां कम हैं.

बिहार में वाम दलों के एक-दूसरे के पूरक सामाजिक आधार हैं. राज्य में राजनीतिक चेतना का स्तर भी काफी ऊंचा है और राजनीतिक बिरादरी के लिए लोगों में ठीक-ठाक सद्भावना भी है.

एक गैर-एनडीए गठबंधन अपनी उपलब्धियों के रूप में, केरल मॉडल और कोविड-19 के दौर से निबटने में पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ सरकारों के अच्छे काम को प्रदर्शित कर सकता है.

सभी वाम दल और कांग्रेस पार्टी इन राज्यों में इन दलों द्वारा किए गए अच्छे काम का कुछ श्रेय तो ले ही सकते हैं. ऐतिहासिक दृष्टि से वंचित सामाजिक वर्गों की आवाज बुलंद करने में आरजेडी की भूमिका को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है.

इन दलों के नेतृत्व को लोगों तक विश्वसनीय तरीके से यह संदेश पहुंचाना होगा कि वे समतामूलक, समावेशी, विकासशील और लोकतांत्रिक बिहार बनाने के लिए एकजुट हुए हैं.

आप पूछ सकते हैं कि मैंने यह लेख क्यों लिखा? क्या मैं यह उम्मीद कर रहा हूं कि इन दलों के प्रमुख नेता गठबंधन बनाने की प्रक्रिया तेज कर देंगे?

नहीं, ऐसा तुरंत हो जाने की मेरे कोई अपेक्षा नहीं है. सभी संगठनों के स्वरूप का अपना इतिहास और विकास-प्रक्रिया होती है और गठबंधन सहज में नहीं हो जाते.

कुछ नेता, अगर इस लेख को पढ़ भी लें तो इसे बचकाना या बड़बोला कह कर खारिज भी कर सकते हैं. लेकिन यह लेख मात्र पार्टियों के नेताओं के लिए नहीं लिखा गया है.

यह इस बात को दर्ज करने के लिए लिखा गया है कि इस देश के आम सजग नागरिक, गैर-दलीय राजनीतिक कार्यकर्ता, कांग्रेस के आम कार्यकर्ता सहित सामाजिक न्याय के पक्षधर क्षेत्रीय दल और वाम दलों के आम कार्यकर्ता- सभी चाहते हैं कि मिल-जुलकर संघर्ष किया जाए.

वे इस बात के लिए तैयार हैं कि भाजपा की विखंडनकारी और तानाशाही प्रवृतियों के खिलाफ यह संघर्ष चुनावी मोर्चे के साथ-साथ राष्ट्र-निर्माण के लिए भी हो.

अब यह इन पार्टियों के राष्ट्रीय नेतृत्व की ज़िम्मेदारी है कि वह एक व्यापक गठबंधन की राह में आ रही बाधाओं को दूर करें और व्यापक आधार वाली जन-एकता के जरिए राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के तौर-तरीकों के बारे में आम सहमति कायम करें.

(लेखक गांधीवादी-समाजवादी कार्यकर्ता हैं.)

(यह लेख मूल रूप से न्यूज़ प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित हुआ है. अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)