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कोरोना वायरस: दिल्ली के गंगाराम अस्पताल के ख़िलाफ़ केस में सभी कार्रवाइयों पर हाईकोर्ट की रोक

एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि अस्पताल दिशा-निर्देशों के अनुरूप कोविड-19 मरीज़ों के नमूने लेने के लिए आरटी-पीसीआर ऐप का इस्तेमाल नहीं कर रहा है, जबकि प्रयोगशालाओं के लिए यह अनिवार्य है.

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(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने कोविड-19 के नियमों के कथित उल्लंघन के मामले में सर गंगा राम अस्पताल के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को लेकर जांच और अन्य कार्रवाइयों पर सोमवार को रोक लगा दी.

जस्टिस सी. हरि शंकर ने कहा कि वह प्रथम दृष्टया इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि जांच सार्वजनिक हित और सहूलियत के आधार पर किए गए और अस्पताल के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी के बाद शुरू की गई जांच पर याचिका के पूर्ण निपटान तक रोक लगाई जानी चाहिए.

अदालत ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये दिए गए अपने आदेश में कहा, ‘इसलिए पुलिस की जांच सहित प्राथमिकी दर्ज कराए जाने के बाद शुरू की गई सभी कार्रवाइयों पर याचिका के निपटान तक रोक लगी रहेगी.’

उन्होंने अस्पताल की याचिका पर अंतरिम आदेश जारी करते हुए पांच जून को राजिंदर नगर पुलिस थाने में आईपीसी की धारा 188 के तहत दर्ज प्राथमिकी से जुड़ी सभी जांच और कार्रवाइयों पर रोक लगा दी.

याचिका में अंतरिम राहत के तौर पर जांच और आगे की कार्यवाही पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया था. प्राथमिकी को पूरी तरह रद्द किए जाने पर 11 अगस्त को सुनवाई होगी.

प्राथमिकी के मुताबिक, शिकायतकर्ता दिल्ली स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने आरोप लगाया है कि अस्पताल दिशा-निर्देशों के अनुरूप कोविड-19 मरीजों के नमूने लेने के लिए आरटी-पीसीआर ऐप का इस्तेमाल नहीं कर रहा है, जबकि प्रयोगशालाओं के लिए यह अनिवार्य है.

शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि अस्पताल की ओर से महामारी रोग कानून-1897 के तहत जारी कोविड-19 नियमों का भी उल्लंघन किया गया है.

प्राथमिकी के मुताबिक, सीडीएमओ सह मिशन निदेशक मध्य ने उल्लेख किया है कि तीन जून तक सर गंगाराम अस्पताल आरटी-पीसीआर ऐप का इस्तेमाल नहीं कर रहा था जो महामारी रोग कोविड-19 नियमन-2020 अधिनियम का साफ तौर पर उल्लंघन है.

उल्लेखनीय है कि जांच प्रक्रिया को सुचारू तरीके से करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने समर्पित आरटी-पीसीआर मोबाइल ऐप लॉन्च किया है, जिसमें प्रयोगशालाओं को नमूना लेने के साथ जानकारी भरनी होती है.

इन्हीं निर्देशों के तहत दिल्ली सरकार ने भी सभी प्रयोगशालाओं व नमूने एकत्र करने वाले केंद्रों के लिए भी इस ऐप को डाउनलोड करना अनिवार्य किया है.

याचिका में अस्पताल ने कहा, ‘आदेश की अवज्ञा मात्र भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-188 के तहत अपराध के लिए पर्याप्त नहीं है लेकिन रुकावट पैदा करना, पीड़ा देना या किसी व्यक्ति को चोट पहुंचाना या किसी की जान, स्वास्थ्य, सुरक्षा को खतरे में डालना या दंगा फैलाना या बलवा करना धारा-188 के तहत इसे अपराध बनाता है. प्राथमिकी इन सभी प्रभावों के बारे में चुप्पी साधे हुए है और इसलिए यह रद्द करने योग्य है.’

याचिका के मुताबिक, दिल्ली सरकार ने अस्पताल को तीन नोटिस जारी किए और पूरी प्रक्रिया किसी छिपे हुए उद्देश्य की पूर्ति के लिए दुर्भावना से प्रेरित लगती है.

अधिवक्ता गुंजन सिन्हा जैन के जरिये दायर याचिका में कहा गया कि एक ओर दिल्ली सरकार अपने नोटिस में कहती है कि अस्पताल बिना लक्षण वाले मरीजों के नमूनों को एकत्र कर जांच कर रहा है और दूसरी ओर यह कहती है कि ऐप आधारित नमूने का संग्रह नहीं हो रहा है.

याचिका में कहा, ‘दोनों ही तर्क विरोधाभासी हैं क्योंकि यह तथ्य वे जानते हैं कि बिना लक्षण वाले मरीजों के नमूने आगे की जांच के लिए एकत्र किए जा रहे हैं और यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि प्रतिवादी को याचिकाकर्ता द्वारा जमा कराए गए आंकड़ों की जानकारी है.’

याचिकाकर्ता ने कहा कि एक ओर दिल्ली सरकार ने अस्पताल कोविड-19 अस्पताल घोषित कर 80 प्रतिशत बिस्तरों को संक्रमित मरीजों के लिए आरक्षित कर दिया और दूसरी ओर उसे कोविड-19 की जांच करने से रोक दिया.