नॉर्थ ईस्ट

मणिपुर: सियासी खींचतान जारी, सीबीआई ने पूर्व मुख्यमंत्री इबोबी सिंह को समन भेजा

पूर्वोत्तर के भाजपा नेता मणिपुर में एनपीपी विधायकों के इस्तीफ़े के बाद गठबंधन टूटने से ख़तरे में आई भाजपा नीत एन. बीरेन सिंह सरकार को बचाने की हरसंभव क़वायद करते नज़र आ रहे हैं. नाराज़ एनपीपी विधायकों को केंद्रीय नेतृत्व से मिलवाने दिल्ली लाया गया है.

Okram Ibobi Singh ANI

कांग्रेस नेता और मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह. (फोटो साभार: एएनआई)

नई दिल्ली/इम्फाल: 23 जून (भाषा) सीबीआई ने कांग्रेस नेता और मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह को 2009 से 2017 के बीच कथित तौर पर 332 करोड़ रुपये की हेराफेरी के सिलसिले में बुधवार को पूछताछ के लिए समन किया है.

अधिकारियों ने बताया कि यह मामला उस समय का है, जब सिंह मणिपुर डेवलपमेंट सोसाइटी (एमडीएस) के अध्यक्ष थे.

उन्होंने कहा कि सीबीआई का एक दल उनसे और अन्य लोगों से पूछताछ के लिए इंफाल पहुंच चुका है. इन लोगों से बुधवार को एजेंसी के दफ्तर में पूछताछ होगी.

सीबीआई ने पिछले साल 20 नवंबर को इस मामले की जांच प्रदेश की भाजपा सरकार के अनुरोध पर शुरू की थी.

अधिकारियों के मुताबिक ऐसा आरोप है कि सिंह ने जून 2009 से जुलाई 2017 के बीच सोसाइटी का अध्यक्ष रहने के दौरान अन्य लोगों के साथ मिलकर विकास कार्यों के लिए मिले 518 करोड़ रुपयों में से करीब 332 करोड़ रुपये की हेराफेरी की.

सिंह के अलावा सीबीआई ने एमडीएस के तीन पूर्व अध्यक्षों- डीएस पूनिया, पीसी लॉमुकंगा, ओ नाबाकिशोर सिंह को भी मामले में आरोपी बनाया है. ये तीनों पूर्व आईएएस अधिकारी हैं.

एफआईआर में सोसाइटी के पूर्व परियोजना निदेशक वाई. निंगथेम सिंह और उसके प्रशासनिक अधिकारी एस रंजीत सिंह का भी नाम है.

अन्य आरोपियों को भी पूछताछ के लिए जल्द बुलाया जाएगा.

एनपीपी के बागी विधायकों को दिल्ली लाया गया

इस बीच प्रदेश में राजनीतिक खींचतान बढ़ती नजर आ रही है. स्थितियों को संभालने के लिए पड़ोसी राज्य मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा और नॉर्थ ईस्‍ट डेमोक्रेटिक अलाएंस (नेडा) के संयोजक और असम के मंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा मणिपुर पहुंचे थे.

इसके बाद इस्तीफा देने वाले नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के चारों  विधायकों को गुवाहाटी ले जाया गया था.

आज तक की रिपोर्ट के अनुसार अब इन सभी को केंद्रीय नेतृत्व से मिलवाने दिल्ली लाया गया है. बताया जा रहा है कि शर्मा के साथ हुई पहले दौर की बातचीत के बाद भी वे राज्य में नेतृत्व बदलाव की मांग पर अड़े रहे.

ज्ञात हो कि बीते हफ्ते मणिपुर के उपमुख्यमंत्री वाई. जॉयकुमार सिंह समेत ने एनपीपी के चार मंत्रियों ने भाजपा नीत सरकार से इस्तीफा दे दिया था.

चूंकि एनपीपी के राज्य में चार ही विधायक थे, तो इस्तीफे के बाद भाजपा के साथ गठबंधन भी टूटा और एन. बीरेन सरकार मुश्किल में आ गयी थी.

इनके साथ इस्तीफ़ा देने वालों में तीन भाजपा विधायक, एक ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के और एक निर्दलीय विधायक भी थे, जिसमें से भाजपा विधायकों ने बाद में कांग्रेस की सदस्यता ले ली थी.

वहीं एनपीपी विधायकों ने भी कांग्रेस को समर्थन देने की बात कही थी. इसके बाद कांग्रेस ने इन सभी नौ विधायकों को अपने पक्ष में लेते हुए सेक्युलर प्रोग्रेसिव फ्रंट नाम से एक गठबंधन बनाया है.

60 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस के पास 29 सीटें हैं, वहीं भाजपा  नेतृत्व वाली एनडीए के पास 22. इससे पहले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मोइरंगथेम ओकेंद्र ने कहा कि पार्टी को उम्मीद है कि एनपीपी के चार नेता भाजपा के दबाव में नहीं झुकेंगे और राज्य में एसपीएफ सरकार की बनेगी.

वहीं एनपीपी की मणिपुर इकाई के अध्यक्ष थांगमिन्लियन किपगेन ने सोमवार को कहा था कि अगर गठबंधन के नेतृत्व का रवैया सहयोगियों के प्रति बदल जाए, तो इस संकट का समाधान हो सकता है.

किपगेन 18 जून को राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला से मुलाकात करने वाले एसपीएफ प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे. उन्होंने भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए जल्द ही एक विशेष विधानसभा सत्र बुलाने का आग्रह किया था.

मालूम हो कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल एक कांग्रेस विधायक को हाल ही में मणिपुर विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया गया था, जिससे विधानसभा में 59 सदस्य रह गए.

सात कांग्रेसी विधायक, जो पहले भाजपा में शामिल हो गए थे, को स्पीकर ट्रिब्यूनल और मणिपुर के उच्च न्यायालय में भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दलबदल-विरोधी मामलों का सामना करना पड़ रहा है.

2017 में मणिपुर में विधानसभा चुनाव हुए थे, तब 60 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 21 सीटें जीती थीं और 28 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई थी.

हालांकि इसके फौरन बाद ही एक कांग्रेस विधायक भाजपा में शामिल हो गए. फिर भाजपा को एक टीएमसी विधायक के साथ चार एनपीपी और नगालैंड में भाजपा की सहयोगी नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) के चार विधायकों का साथ मिला, जिसके बाद उत्तर-पूर्व के किसी राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार बनी.

बीते सप्ताह के घटनाक्रम के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ओर पूर्व मुख्यमंत्री इबोबी सिंह ने दावा किया था कि कांग्रेस के पास 30 विधायकों का समर्थन है, जिसमें 20 खुद उनके हैं.

उनका कहना था कि चुनाव के बाद दल-बदलने वाले कांग्रेस के एक विधायक के अलावा सात ऐसे विधायक भी थे, जिन्होंने कांग्रेस में रहते हुए एन. बीरेन को समर्थन दिया था.

इबोबी सिंह ने एक अखबार से बात करते हुए कहा, ‘विधानसभा में आधिकारिक तौर पर तो वे कांग्रेस के विधायक हैं. मामला अदालत में है- या तो वे अयोग्य साबित होंगे या वे कांग्रेस के विधायक हैं. दोनों ही मामलों में वे भाजपा के विधायक तो नहीं ही कहलाएंगे.’

उन्होंने आगे कहा कि नए विधायकों के समर्थन के बाद कांग्रेस राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश करेगी. उधर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एस. टिकेंद्र सिंह ने विश्वास जताया है कि यदि विधानसभा में फ्लोर टेस्ट होता है तो पार्टी आसानी से जीत जाएगी.

राज्यसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार लिसेम्बा संजाओबा की जीत के बाद पार्टी का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में हैं.

60 सदस्यीय विधानसभा में फिलहाल सदस्यों की संख्या 59 है. भाजपा के अनुसार उनके पास 23 विधायकों का समर्थन है, जिसमें 18 भाजपा, चार नगा पीपुल्स फ्रंट और एक एलजेपी विधायक शामिल हैं.

वहीं कांग्रेस का दावा है कि एसपीएफ को 29 विधायकों का समर्थन प्राप्त है, जिसमें कांग्रेस के 20, एनपीपी के चार, भाजपा से शामिल हुए तीन विधायक, एक टीएमसी और एक निर्दलीय विधायक शामिल हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)