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यह याद रखना चाहिए सरकार का विरोध करना अपराध नहीं है

आज के नव उग्र-राष्ट्रवादी समय में यह याद करना फ़ायदेमंद होगा कि परिपक्व राष्ट्र युद्ध के समय भी साधारण व्यक्तियों या सुपरस्टारों को भी आधिकारिक ‘लकीर’ से अलग चलने की आज़ादी देता है.

A U.S. Marine tank launches flamethrower in action near Da Nang, Vietnam, 1965. REUTERS/Courtesy U.S. Army

1965 में वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिकी टैंक. (फोटो: रॉयटर्स/अमेरिकी सेना)

1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक के आरंभ में बंगाल एक अशांति भरे दौर से गुजरा. इन हलचलों ने बंगाल के शीर्ष फिल्मकारों को उस दौर की घटनाओं के इर्द-गिर्द फिल्म निर्माण की प्रेरणा दी.

सत्यजीत रे, जो आमतौर पर राजनीतिक पक्षधरता दिखाने के लिए नहीं जाने जाते थे और मृणाल सेन, जिन्होंने रे के विपरीत अपनी राजनीतिक पक्षधरता कभी किसी से नहीं छिपाई, दोनों ने उन अशांत वर्षों के कलकत्ता शहर को केंद्र में रख कर फिल्म त्रयी (ट्रायोलॉजीस) का निर्माण किया.

जहां, रे ने प्रतिद्वंद्वी, सीमाबद्ध और जनअरण्य जैसी अमर फिल्में बनाईं, वहीं सेन ने इंटरव्यू, कलकत्ता 71 और पदातिक जैसी यादगार फिल्मों का निर्माण किया.

अक्टूबर, 1970 में प्रतिद्वंद्वी के रिलीज होने के साथ रे ने यह दिखाया कि उनका रचनात्मक व्यक्तित्व भी उस समय पश्चिम बंगाल के सामने मुंह बाए खड़ी दो सबसे ब़ड़ी चुनौतियों- बढ़ती बेरोजगारी और युवाओं का नक्सवलाद या उग्रवादी राजनीति की ओर झुकाव को लेकर उदासीन नहीं था. 1971 में सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के अलावा दो और राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली यह फिल्म एक बड़ा राजनीतिक बयान थी.

इस फिल्म ने दिखाया कि भले ही भारतीय युवा राजनीतिक एक्टिविज्म में शामिल न हों और गुजर-बसर के रास्ते खोजने के चक्रव्यूह में फंसे हुए हों, फिर भी उनकी चिंताओं का दायरा पूरी दुनिया तक फैला था.

इस अर्थ में कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में चल रहे संघर्षों से वे जुड़ाव महसूस करते थे. भारतीय शहरी मध्यवर्गीय युवाओं के राजनीतिक स्वभाव को रेखांकित करने के लिए रे ने जो तरीका चुना, उससे बेहतर कोई और रास्ता नहीं हो सकता था.

इस फिल्म ने धृतिमान चटर्जी को उस दौर के एक ऐसे आम युवा के तौर पर पेश किया, जो अपने पिता की मृत्यु के बाद पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर होता है, जो एक अदद नौकरी पाने में नाकाम रहता है और आखिरकार उसके पास अपने सपनों और महत्वाकांक्षाओं की तिलांजलि देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है. आखिरकार वह हालात को जैसे का तैसा स्वीकार कर लेता है. फिल्म में उनका किरदार सिद्धार्थ नौकरी की खोज में लग जाता है.

इसमें तीन लोगों द्वारा अंग्रेजी में लिए गए एक इंटरव्यू का दृश्य काफी अर्थपूर्ण है. इंटरव्यू की सामान्य औपचाकिताओं और कई सवालों के बाद जो उसके सामान्य ज्ञान को परखने के अलावा और कुछ खास नहीं करते, उससे पूछा जाता है कि आपके हिसाब से पिछले एक दशक की सबसे प्रमुख घटना कौन सी थी?

ठीक दस सेकंड की चुप्पी के बाद, जिस दौरान सिर्फ कमरे में नाच रहे पंखे की आवाज सन्नाटे को भंग कर रही होती है, इंटरव्यू देने वाला थोड़ी झिझक के साथ जवाब देता है, ‘वियतनाम युद्ध.’

इस पर इंटरव्यू बोर्ड का एक सदस्य जिसको देख कर उसके बॉस होने का अंदाजा लगाया जा सकता है, सवाल करता है, ‘तो आपके हिसाब से यह चांद पर इंसान के कदम रखने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण घटना है?’ इससे यह जाहिर होता है कि इस फिल्म में दिखाई गईं घटनाएं 1969 की जुलाई के बाद की हैं.

तब तक सिद्धार्थ ने आत्मविश्वास बटोर लिया है और इसलिए बगैर किसी भावुकता का इजहार किए वह जवाब देता है, ‘मुझे ऐसा लगता है.’ जब उसे अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए कहा जाता है, तब वह विस्तार से कहता है, ‘देखिए, ऐसा नहीं है कि हमें चांद पर कदम रखने की घटना का कोई पूर्वानुमान नहीं था या हम इसके लिए बिल्कुल ही तैयार नहीं थे. स्पेस टेक्नोलॉजी में जिस तरह तरक्की हुई है, उसे देखते हुए हमें पता था कि एक दिन ऐसा आएगा… मैं यह नहीं कहूंगा कि यह कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं थी, लेकिन यह (चांद पर कदम रखना) अप्रत्याशित नहीं था.’

जब एक दूसरा इंटरव्यू लेने वाला पूछता है कि क्या वियतनाम का युद्ध अप्रत्याशित था, तब सिनेमा का मुख्य किरदार तर्क देता है कि अपने आप में यह युद्ध अनुमानों से परे नहीं था. कल्पना से बाहर बात थी वियतनामी जनता का वह रूप जिसे इस युद्ध ने उजागर किया. ‘साधारण लोगों और किसानों ने प्रतिरोध की असाधारण शक्ति दिखाई… किसी को नहीं पता था कि इन साधारण लोगों में यह शक्ति थी. इसमें कोई तकनीक नहीं थी, था तो बस साधारण इंसानी साहस. और जब आप इसके बारे में सोचते हैं, तो चकित रह जाते हैं.’

एक लंबे सन्नाटे के बाद इंटरव्यू लेने वालों का मुखिया अपनी कुर्सी में पीछे की ओर आराम से धंसते हुए हिकारत से पूछता है: ‘क्या तुम कम्युनिस्ट हो?’

जब सिद्धार्थ यह कहता है कि वियतनाम और वहां की जनता का प्रशंसक होने के लिए कम्युनिस्ट होना जरूरी नहीं है, तो दूसरी तरफ बैठा व्यक्ति पलट कर कहता है, ‘यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है.’ कुछ क्षण के बाद एक रूखा आदेश आता है, ‘बहरहाल आप जा सकते हैं.’ यह बताने की जरूरत नहीं कि सिद्धार्थ को यह नौकरी नहीं मिलती.

अपने छोटे भाई के उलट, जो नक्सली विद्रोहियों में शामिल हो गया था, सिद्धार्थ उस आंदोलन का सदस्य नहीं था. लेकिन, इंटरव्यू के इस यादगार दृश्य के सहारे रे ने अपने पात्र को उस लक्ष्य के साथ एक तरह से जोड़ दिया और यह दिखा दिया कि उसकी सहानुभूति साहसी लोगों के साथ है.

नौकरी की तलाश कर रहा एक युवा इंटरव्यू के दौरान अपने जवाबों और हाव-भाव के सहारे अपने पक्ष पर कायम रहता है, जबकि अगर वह अपने पक्ष को थोड़ा सा बदल लेता तो उसके पास नौकरी हासिल करने की बेहतर संभावना थी. उस क्षण नौकरी देने वाला रोम-रोम से सरकार (स्टेट) का प्रतीक बन गया.

वियतनाम युद्ध की केंद्रीयता और इसने जिस तरह वियतनामी और अमेरिकी जनता के प्रतिरोध को जन्म दिया, उसके मद्देनजर और सिद्धार्थ के पक्ष को समझाने के लिए प्रतिद्वंद्वी के इस इंटरव्यू के दृश्य को याद करना जरूरी था. लगभग तीन दशकों तक चलने वाले वियतनाम युद्ध की घटनाओं की लड़ी में कई बेहद महत्वपूर्ण घटनाएं ठीक आधी सदी पहले 1967 में घटीं.

वियतनाम युद्ध और इसमें अमेरिकी हस्तक्षेप का रिश्ता दूसरे विश्वयुद्ध की विरासत और इसके कारण पश्चिमी लोकतंत्रों पर पड़े शीतयुद्ध के जख्म से था.

इसने अपने देश के खिलाफ इन देशों की जनता की भावनाओं का मुंह सिल दिया था. इसीलिए इसके खिलाफ प्रतिरोध काफी झिझक के साथ शुरू हुआ, लेकिन समय बीतने के साथ इसकी धमक युद्ध को टक्कर देने वाली थी.

इसमें कोई शक नहीं कि 1967 की शुरुआत अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन की छटपटाहट भरी व्यग्रता से हुई. जनवरी में ऑपरेशन सेडार फाल्स से युद्ध का ऐलान कर दिया गया.

अमेरिकी सेना ने सैगन से 25 मील दूर स्थित आयरन ट्राइंगल नामक क्षेत्र से वियत कॉन्ग (वियतनाम युद्ध के दौरान दक्षिणी वियतनाम और कंबोडिया में सक्रिय सैन्य दस्ता और आंदोलन) को बाहर खदेड़ने के लिए उस समय तक का सबसे बड़ा साझा हमला बोल दिया.

इसमें 16,000 अमेरिकी और 14,000 दक्षिण वियतनामी सैनिक शामिल थे. यह साल वियतनाम में अमेरिकी युद्ध के लिए काफी अहम साबित हुआ. अक्टूबर में मार्च टू पेंटागन और फिर खे-सान्ह की घेराबंदी, जो 1968 तक चली, राजनीतिक और सैन्य रूप से बेहद बेहद प्रभावशाली घटनाएं थीं.

1967 के मध्य तक जॉनसन संकटों से घिरते नजर आने लगे. उन्होंने एक ऐसी लड़ाई छेड़ दी थी, जिसे उनके पूर्ववर्तियों ने अमेरिका के कंधे पर लाद दिया था. युद्ध के मैदानों में अमेरिकियों की संख्या बढ़कर 500,000 तक पहुंच गई थी और युद्ध के प्रयासों को दोगुना करना प्रशासन की प्राथमिकता थी.

युद्ध में मर रहे अमेरिकी सैनिकों की फेहरिस्त भी लगातार लंबी होती जा रही थी. लेकिन जॉनसन के लिए सबसे ज्यादा चिंताजनक ये बात थी कि इतिहास में पहली बार बहुसंख्यक अमेरिकियों को यह लगने लगा था कि देश को एक गलत युद्ध में धकेल दिया गया है और उनके नेता ने गलती की है.

एक ऐसे देश में जो काफी समय से पर्सनल रेटिंग्स से निर्देशित होता रहा है, जॉनसन की स्वीकृति रेटिंग महज 28 प्रतिशत थी, जो उनके लिए एक बेहद खराब खबर थी.

लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि भारत के लिहाज से 1967 एक ऐसे साल के तौर पर सामने आता है, जिसमें वियतनाम युद्ध और इसका विरोध अमेरिकी जीवन के केंद्र में आ गए.

हालांकि, युद्ध में अमेरिकी भागीदारी के समर्थन में भी लोग थे, लेकिन इसके खिलाफ आंदोलन में नए-नए लोग शामिल होते गए और विरोध की तीव्रता और रफ्तार भी लगातार बढ़ती गई.

इस साल के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि द न्यूयॉर्क टाइम्स समेत कई मीडिया संस्थान जनवरी 2017 से मार्च 2018 तक विशेष पन्नों का प्रकाशन कर रहे हैं, जिनमें लेखों और संस्मरणों को शामिल किया जा रहा है.

ऐसा अमेरिकी इतिहास के उस अध्याय को याद करने के लिए किया जा रहा है, जब अमेरिकी जनता की चेतना ने युद्ध के खिलाफ एक वैश्विक जागरूकता पैदा की और वैश्विक प्रतिरोध की एक नई लहर को जन्म देने में अपनी भूमिका निभाई.

उस समय भी कुछ लोगों को तब आपत्ति हुई थी, जब मार्टिन लूथर किंग जूनियर, प्रदर्शनकारियों में शामिल हुए थे. एकता के इस प्रदर्शन के कारण वही थे, जो कारण इंटरव्यू में सिद्धार्थ ने बताए थे.

जून, 1967 में जब अखबारों ने यह खबर दी कि धरती के महानतम मुक्केबाज मोहम्मद अली को एक जज ने (अमेरिकी सेना में शामिल होने के) ड्राफ्ट को अस्वीकार करने के लिए पांच साल की जेल की सजा सुनाई है और उनसे उनका वर्ल्ड हैवीवेट खिताब छीन लिया गया है, तो दुनिया की हैरत का ठिकाना नहीं रहा था.

अमेरिकी सरकार द्वारा मोहम्मद अली को सेना में शामिल करने की कोशिशों की कहानी बार-बार सुनाई जानी चाहिए. अली ने अपनी देशभक्ति को सिर्फ सेना में भर्ती होने और वियतनामियों से युद्ध लड़ने की इच्छा से तौले जाने से इनकार कर दिया.

इससे पहले सुलेख (राइटिंग) और हिज्जे (स्पेलिंग) की परीक्षा में पास नहीं होने के कारण उन्हें सेना में शामिल होने के अयोग्य करार दिया गया था. वैसे यह पता नहीं है कि ऐसा उन्होंने जान-बूझकर किया था या नहीं!

जब सरकार जरूरी भर्तियां करने में नाकाम रही, तो सेना ने भर्ती की न्यूनतम शर्तों में ढील दे दी. यानी अब मुहम्मद अली को सेना में शामिल किया जा सकता था.

लेकिन कुछ दिनों पहले ही कैसियस क्ले से मुहम्मद अली बनने वाले व्यक्ति ने यह कहते हुए सेना में अपनी सेवाएं देने से इनकार कर दिया कि वे एक ‘अंतःकरण से विरोधी’ (कॉन्शिएंशस ऑब्जेक्टर- वैसे व्यक्ति, जो विचार, अंतःकरण और धर्म की स्वतंत्रता के नाम पर सैन्य सेवा देने से इनकार करते हैं.) हैं.

अली ने यह तर्क दिया कि यु़द्ध इस्लाम की शिक्षाओं के खिलाफ है. उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां हैं, मेरी वियत कॉन्ग (वियतनाम युद्ध के दौरान दक्षिणी वियतनाम और कंबोडिया में सक्रिय सैन्य दस्ता और आंदोलन) से कोई लड़ाई नहीं है.

इसमें कोई शक नहीं है कि सेना में शामिल होने से इनकार करने वालों में वे सबसे महत्वपूर्ण और चर्चित व्यक्ति थे.

अली ने उनके साथ खड़े होने का फैसला किया, जिनकी संख्या इस तथ्य के बावजूद बढ़ रही थी कि सरकार के उग्र राष्ट्रवादी समर्थक उन्हें गद्दार कह कर पुकार रहे थे. लेकिन एक मुक्केबाज जैसे गैर-राजनीतिक व्यक्ति द्वारा युद्ध का विरोध अंतरराष्ट्रीयवाद या शांति आंदोलन को समर्थन नहीं था.

उनका पक्ष एक तरफ अमेरिका की इस दुखद वास्तविकता की देन था कि अमेरिका अपने अश्वेत लोगों के साथ दोयम दर्जे के नागरिकों की तरह बर्ताव करता था और दूसरी तरफ इस हकीकत की भी देन था कि ‘किसी वियत कॉन्ग ने कभी मुझे नीग्रो नहीं कहा.’

अली को अपनी इस पक्षधरता की काफी कीमत चुकानी पड़ी. उनके बॉक्सिंग लाइसेंस को रद्द कर दिया गया और उन्हें कई सालों तक बॉक्सिंग रिंग से बाहर रहना पड़ा.

उन्होंने इस वक्त का इस्तेमाल सामाजिक मेलजोल के लिए किया. वे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में एक लोकप्रिय युद्ध-विरोधी वक्ता के तौर पर उभरे.

अली ने युद्ध का विरोध किया, लेकिन युद्ध के कई अमेरिकी विरोधियों के उलट, अली ने विरोधी कैंप का पक्ष नहीं लिया.

युद्ध में शामिल होने वाले एक पुराने सैनिक ने लिखा है, ‘हमारी भावनाएं काफी मिली-जुली थीं. लेकिन आखिरकार हमें यह अच्छा नहीं लगा कि उन्होंने सेना में शामिल होने से इनकार कर दिया. हमें उनके युद्ध-विरोधी भाषण पसंद नहीं आए. लेकिन हम इस बात को भी लेकर पूरी आश्वस्त नहीं थे कि वे गलत थे.’’

उन वर्षों के दौरान न बॉक्सिंग के इस सितारे की सार्वजनिक आलोचना की गई, न ही किसी ने ऊपर हवाला दिए गए सैनिक या उन अनगिनत पूर्व सैनिकों से ही सवाल पूछा जो सेवा में रहते हुए ही संदेहों से भर गए थे. आखिरकार 1971 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट अली को दोषमुक्त कर दिया. इसके बाद अली ने फिर करिअर की शुरुआत की.

यह रुकावट उन्हें एक बार फिर इस खेल के शिखर तक पहुंचने से नहीं रोक पाई. पिछले साल जून में जब 32 वर्षों तक पार्किंसन बीमारी से लड़ते रहने के बाद अली की मृत्यु हुई, तब अली को एक ऐसे शहीद के तौर पर याद किया गया, जिन्होंने ‘राष्ट्रीय’ युद्ध नहीं लड़ा था, बल्कि उन लक्ष्यों के लिए लड़ाई लड़ी थी, जिनमें वे यकीन करते थे.

अगर करीब 50 साल पहले सत्यजीत रे की एक फिल्म का एक काल्पनिक पात्र अपने समझौता न करने वाले व्यवहार के लिए फिल्मकारों और दर्शकों के द्वारा सराहा जा सकता था, तो आज के नव उग्र-राष्ट्रवादी समय में यह याद करना फायदेमंद होगा कि परिपक्व राष्ट्र युद्ध के समय भी साधारण व्यक्तियों या सुपरस्टारों को भी आधिकारिक ‘लकीर’ से अलग चलने की आजादी देता है.

अली के विरोध की 50वीं वर्षगांठ हमें यह याद दिलाती है कि परिवक्व राष्ट्र और इसका नेतृत्व उन लोगों को भी स्वीकार करता है, जो राष्ट्रभक्ति का भोंपू नहीं बजाते या सरकार द्वारा लिखी पटकथा के अनुसार ही अभिनय नहीं करते.

अली की याद हमें उन खिलाड़ियों की पहचान करने की क्षमता दे सकती है, जो सरकार की लकीर के दूसरी तरफ होने को गुनाह-ए-अज़ीम मानकर लोगों की आलोचना करने पर उतर आते हैं. 50 सालों के बाद यह कहानी हमें बताती है कि सरकार का विरोध करना कोई अपराध नहीं है.

नीलांजन मुखोपाध्याय लेखक और पत्रकार हैं. उन्होंने ‘नरेंद्र मोदी: द मैन, द टाइम्स’ और ‘सिख्स : द अनटोल्ड एगनी ऑफ 1984’ जैसी किताबें लिखी हैं.

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