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गुरुदत्त एक अनसुलझा क्रॉसवर्ड है, जिसमें कोई न कोई शब्द पूरा होने से रह ही जाता है

जन्मदिन विशेष: गुरुदत्त फिल्म इंडस्ट्री का एक ऐसा सूरज थे, जो बहुत कम वक़्त के लिए अपनी रौशनी लुटाकर बुझ गया पर सिल्वर स्क्रीन को कुछ यूं छू कर गया कि सब सुनहरा हो गया.

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फोटो साभार: cinestaan.com

‘बापू , मैं भी आज़ादी के आंदोलन में शामिल होना चाहती हूं. मेरा एक छोटा-सा बच्चा है, परिवार है..पर मैं देश के लिए कुछ करना चाहती हूं.’

ख़त बापू को मिला. जवाब में लिखा, ‘नहीं..नहीं.. तुम घर-परिवार मत छोड़ो. अपने बच्चे की अच्छे से परवरिश करो.. अच्छा इंसान बनाओ ताकि वो देश की सेवा कर सके.’

ख़त मैंगलोर से आया था, लिखने वाली थीं वसंती पादुकोण. इस ख़त में जिस बच्चे का ज़िक्र है वो वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण थे.

मां ने अच्छी परवरिश की और भारतीय सिनेमा को दी एक अद्भुत तकनीक, एक जीता-जागता कैमरा. एकदम क्लोज़ शॉट लेता हुआ, जिसके लैंस 75 और 100 mm के हैं.

सामने वाले की आंखों के भावों को लगातार टोहता हुआ, छूता हुआ… उन्हें रुपहले परदे पर उतारता हुआ. उन्होंने सिल्वर स्क्रीन को दिया सबसे गोल्डन ख्व़ाब. उन्होंने दिया तारीकी और उजाले का अनूठा शोमैन गुरुदत्त.

9 जुलाई साल 1925 को एक ब्राह्मण परिवार में पिता शिवशंकर पादुकोण और मां वासंती पादुकोण के आशियाने में ये वासंती फूल खिला. ताज़ादम, रौह-ए-रौशनी से लबरेज़ एकदम साबुत लेकिन जाने क्यों और कब से वो खिर-खिर कर अपने ही भीतर भरने लगे?

39 साल की उम्र में ही अपनी ऊर्जा फ़िल्मी रिकॉर्ड्स के खांचों में भरकर चले गए. मां यही कहती रही कि ब्याह के बाद एक ज्योतिषी ने कहा था साल के भीतर ही बेटा होगा, बहुत नाम कमाएगा पर उसने ये तो नहीं कहा था वो इतनी जल्दी ज़िंदगी नाम से ऊब जायेगा.

ये ऊब उनके अंदर भरी कहां से थी आख़िर? बचपन में तो वे बेहद शरीर (शरारती) थे, खूब जिद्दी, जो ठान लेते वो ही करके मानते. गुस्सा भी खूब करते और सवाल भी.

उनके बचपन में तो कलकत्ता (आज का कोलकाता) शहर भोवानीपोर की गलियां हैं. क्या ये गलियां इतनी उलझी हुईं थीं? सिनेमा हॉल एरिया कहलाए जाने वाले भोवानीपोर से सिनेमा शब्द उनकी ज़िंदगी में आया होगा. ज़मीन के उसी खित्ते से पूरा बंगाल ऊतकों में धीमे-धीमे से समाया होगा. यूं ही तो नहीं कोई अपना नाम बदल लेता है… वसंत से गुरुदत्त हो जाता है.

गुरुदत्त एक अनसुलझा क्रॉसवर्ड है, जिसमें कोई न कोई शब्द बदलने से रह ही जाता है.

घर में तंगी थी, पर मुफ़लिसी के राग पर उनके क़दम ठिठके नहीं बल्कि थिरकने लगे. टेलीफ़ोन ऑपरेटर की नौकरी करते. वक़्त के बाकी हिज्जों को नृत्य से भर देते. अपने इस शौक़ से इक रोज़ अपने मामा केके बेनेगल को वाबस्ता कराया. उन्होंने जब कहा कि कुछ करके दिखाओ तो उनकी एक पेंटिंग को देखकर थीम डांस कर दिखाया. पेंटिंग में कलाकार के बदन पर एक सांप लिपटा हुआ था, डांस में उन्होंने उसे भी उकेर दिया. इस पर अंकल ने डपटा, ‘डांस का शौक़ मत पालो, पढ़ाई में ध्यान लगाओ.’

लेकिन एक बार जब कोई थिरकन रूह तक पहुंच जाए. वो राह भी खोज ही लेती है. ये बलखाती हुई राह उनको अल्मोड़ा तक ले गयी, जहां उस दौर के मशहूर डांस डायरेक्टर उदय शंकर की डांस एकेडमी थी. उदय शंकर सितार वादक रविशंकर साहब के बड़े भाई थे. बहरहाल, गुरुदत रहे होंगे मात्र चौदह बरस के और अपनी उम्र से चौदह गुना आत्मविश्वास. उदयशंकर ने कहा, ‘दिखाओ कुछ.’ वही सांप वाला डांस दिखाया और बस! ट्रूप का हिस्सा बन गए.

क़िस्मत के तार भी एकदम सही जगह जाकर जुड़ते हैं, ऊपरवाला ज़रूर कोई बेहतरीन इलेक्ट्रीशियन है. उनके अंदर एक स्पार्क जगा जिसने उन्हें सीधे पहुंचा दिया लाइट्स कैमरा एक्शन की दुनिया में. वो दुनिया, जो मुंतज़िर थी उनकी.

कहीं न कहीं ‘कुछ कम ..कुछ कम’ की कोई धुन थी, जो अनवरत उनके ज़ेहन में थी. जिस्म में उसी लय का कंपन था. उनकी राह भले ही उन्हें ऊपर से नीचे ले जा रही थी, पहाड़ों से समंदर की तरफ़ (अल्मोड़ा से बंबई) मगर यहां उनका जीवन तरंग की तरह गति कर रहा था अभी वो उठान की ओर थे.

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साभार: facebook.com/Bollywoodirect

यहां तक उनके अंदर एक आत्म-विश्वास और उछाह का समंदर था. उनके बेहद क़रीबी रहे अबरार अल्वी के अनुसार जब गुरुदत्त की फिल्म बाज़ बुरी तरह से फ्लॉप हो गयी, उसके बारे में फ़िल्मी पत्रिकाओं में काफ़ी ख़राब रिव्यूज़ छपे. तब उनका डायरेक्शन कसौटी पर था. इसी कसौटी पर ख़ुद को परखने को गुरुदत्त ने नयी फिल्म शुरू की आर पार. इस नाम से तो लगता है कि वहां भी गुरुदत्त के मन में यही आर या पार वाली कोई बात थी.

अबरार अल्वी इस फिल्म को लिख रहे थे. उन्होंने इस फिल्म को एक भावनात्मक क्लाइमेक्स दिया. शूटिंग भी शुरू हो गयी, लेकिन गुरुदत्त इससे कहीं न कहीं संतुष्ट नहीं थे, इसलिए उन्होंने इसका क्लाइमेक्स बदल दिया. कुछ मार-धाड़ वाले सीन डाले गए. 18 दिन की और शूटिंग की गयी. इसके बावजूद सत्तर दिन में ये फिल्म बनकर तैयार हो गयी.

इमोशनल क्लाइमेक्स को किनारे कर दिया गया. बाद में ये जानने में आया कि इस फिल्म के निर्माता केके कपूर ने गुरुदत्त से तीन फिल्मों का अनुबंध किया हुआ था इसलिए वो जैसा चाहते थे फिल्म का अंत वैसा ही रखा गया. शुरूआती दिनों की आर्थिक कमज़ोरी के बाद यहां गुरुदत्त का एक टुकड़ा टूटा और उनमें ही समा गया. पर हौसले मज़बूत थे. फिर उन्होंने अबरार अल्वी के साथ अगली फिल्म शुरू की.

गुरुदत्त को उर्दू से बहुत ज़्यादा लगाव था. घर में कोंकणी का प्रभाव था, बंगाल ने बंगाली में उनको पारंगत कर दिया, अंग्रेज़ी में वे लिखा ही करते थे (कई दफ़ा शॉर्ट स्टोरीज भी, जिनमें से चंद ‘द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया’ मैगज़ीन में प्रकाशित भी हुईं) तो जो एक भाषा छूट रही थी वो उर्दू ही थी.

सहायक निर्देशक राज खोसला के साथ उनका उर्दू का रिश्ता था ऐसा कहने में कोई गुरेज़ नहीं क्योंकि खोसला की पकड़ भाषा पर बहुत अच्छी थी. अबरार अल्वी के आने के बाद ये डोर नाज़ुक हो गयी.

शुरूआती दौर में प्रभात फिल्म कंपनी में डांस डायरेक्टर के तीन वर्ष के अनुबंध पर काम करते हुए उन्हें देवानंद जैसा अतरंगी यार मिला. दोनों ने एकदूसरे से वादा किया कि हम दोनों में से जो पहले क़ामयाब होगा वो दूसरे को काम देगा.

पहले बारी आई देव साहब की. उन्होंने अपने होम प्रोडक्शन नवकेतन के बैनर तले बाज़ी फिल्म बनायी. डायरेक्टर बने गुरुदत्त, साहिर लुधियानवी साहब ने भी फ़िल्मी दुनिया में अपनी पहचान इसी फिल्म से कायम की. यहीं उन्हें मिले बेहतरीन कैमरामैन वीके मूर्ति, जो आख़िरी तक उनके सिनेमाई ख़्वाबों को अपने कैमरा से शूट करते रहे. ब्लैक एंड व्हाईट में रौशनी के रंग भरते रहे.

कागज़ के फूल  फिल्म के गाने वक़्त ने किया क्या हसीं सितम को उन्होंने ही मास्टर पीस बनाया. कैफ़ी आज़मी के इन बोलों को जैसे रूह मिल गयी. लेकिन इसके बनने के पीछे की दास्तान भी अनूठी है. गुरुदत्त सोच रहे थे इसे कैसे शूट किया जाए. कुछ अलहदा होना चाहिए. एक शाम ढलता हुआ सूरज स्टूडियो के दरवाज़े से धूप बनकर अंदर झांक रहा था. एक स्पॉट बॉय अंधेरे से निकलकर उस धूप में आया फिर अंधेरे में चला गया. गुरुदत्त की आंखें चमक उठीं. चहककर बोले, ‘मूर्ति यही चाहिए..क्या तुम कर सकते हो?’ मूर्ति ने हमेशा की तरह हामी भर दी.

मगर मूर्ति नहीं चाहते थे कि इसे लाइट में शूट किया जाए. लाइट की बीम नीचे आकर फैल जाती है. यहां समानांतर रौशनी चाहिए थी और धूप के कोलोइड्स भी. बहुत सोचने के बाद रास्ता निकला कि कांच के चिलके से ये इफ़ेक्ट लाया जा सका. जब पूरी दुनिया 50 mm का लेंस शूट के लिए काम में लेती थी, गुरुदत्त ने वीके मूर्ति के साथ मिलकर 75 mm के लेंस से शूट किया. कभी-कभी तो पूरे फ्रेम में कलाकार का सिर्फ चेहरा ही नज़र आता था. उनके कैमरे का एप्रोच हमेशा मानवीय रहा, कहानियां भी इंसानी संवेदनाओं के इर्द-गिर्द मंडराती हुई.

बहरहाल, बाज़ी  फिल्म ने ही उनके दिल में मुहब्बत का भी रेडियम लगा दिया. ज़िंदगी के अंधेरे कोने भी जगमगा उठे. गायिका गीता से उन्होंने शादी की. लेकिन ये चमक जल्द ही बुझ भी गयी. गुरुदत्त स्टूडियो में वक़्त बिताते. गीता घर छोड़ गयीं. गुरुदत्त कहानियों में उलझे रहे और गीता उनकी कहानी से बेदख़ल हो गयीं. गीता उन पर नज़र रखतीं, पीछा करतीं. एक बार गुरुदत्त साहब और अबरार अल्वी कागज़ के फूल की शूटिंग से पहले लंदन  जाने वाले थे कि गीता दत अबरार अल्वी के घर पहुंचीं और अल्वी साहब से वहीदा रहमान और गुरुदत्त के बारे में सवालात करने लगीं. वो नर्वस थीं, रो रही थीं. अल्वी साहब ने उन्हें समझाया कि गुरुदत्त सिर्फ़ फ़िल्म और काम से मुहब्बत करता है, बेफ़िक्र रहो लेकिन गीता दत्त समझीं नहीं.

इन सबके बाद गुरुदत्त थोड़े और टूट गए. टूटकर शराब के प्याले में गिरे और आधे किसी अनजान प्यास में. उनकी दुनिया बदल रही थी इधर भारत आज़ाद हो चुका था. ज़र्रा-ज़र्रा हिन्दुस्तान ने अपने को समेटना शुरू किया तो उधर गुरुदत्त ने क़तरा-क़तरा बिखरना. तब एक फ़िल्म बनाई प्यासा, जो आज तक एक माइलस्टोन है. इसके बाद आई कागज़ के फूल… तीन घंटे की फिल्म रिलीज़ हुई लेकिन तीन घंटे की डिब्बा बंद ही रही. परफेक्शन के प्रयास में 6 घंटे की फिल्म बन गयी थी. इस फिल्म को दर्शकों ने नकार दिया.

इसके बाद तो गुरुदत्त भीतर से भुरभुरे हो गए, जाने कब भरभरा कर गिर जाएं. अपनी पूरी जान इस फिल्म में लगा चुके थे. इसके बाद उन्होंने कोई फिल्म निर्देशित नहीं की. उन्हें लगा लोग उन्हें देखना नहीं चाहते. कलाकार एक नन्हा बच्चा होता है, सराहना उसके लिए सबसे प्यारा और कीमती खिलौना. गुरुदत्त से वो छिन गया. वक़्त के उस ज़ेहनी युद्ध के दौर में गुरुदत्त अकेले रहा करते थे, हालांकि अबरार अल्वी उनका हरदम ख्याल रखते.

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10 अक्टूबर 1964 का दिन था. गुरुदत्त ने अपने तीनों बच्चों और छोटे भाई के साथ खूब शॉपिंग की, देर तक पतंग उड़ाई फिर शाम को सबको रवाना कर दिया. देर रात तक अबरार अल्वी उनसे फिल्म बहारें फिर भी आएंगी  पर चर्चा करते रहे. गुरुदत्त अचानक से उठे और बोले, ‘यार अबरार, इफ़ यू डोंट माइंड आई वुड लाइक टू रिटायर…’ इतना कहकर कमरे में चले गए.

सुबह गुरुदत्त सिरहाने रखे एक आधे पढ़े नॉवेल के साथ पूरे बेजान मिले.

गुरुदत्त  इंसान के बजाय चाहत के नग़मे जैसे थे, कभी सर्द आहें भी थे, खुशियों का अपार संसार भी, तो गर्द में डूबे हुए भी. आंखों में एक अनजान-सी कशिश थी, उन्हीं आंखों में इस संसार के लिए बेगानापन भी था.

गुरुदत्त, जैसे अपने जिस्म में भरा पारा हो, बेशक़ीमती द्रव्य. जिस्म टूटा, पारा मोतियों में बिखर गया, जिन्हें बटोरना भी मुश्किल, माला में पिरोना भी.

सच भी है, हमें शख्सियत को पूरे में देखना चाहिए, उसके क़तरे भर में नहीं. गुरुदत्त एक महान कलाकार थे. टूटते नहीं तो ज़िंदगी और वो दोनों एकदूसरे को बेहतर सौगातें देते. कहने को तो बस बाकी यही है, जो कैफ़ी आज़मी ने उनकी रुखसती पर कहा…

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई, तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

माना कि उजालों ने तुम्हे दाग़ दिए थे, बे-रात ढले शम्अ बुझाता नहीं कोई

 

(लेखिकाआकाशवाणी जयपुर में न्यूज़ रीडर हैं)