भारत

व्यवस्था ‘नत्था’ से किसानी छुड़ाकर मज़दूरी कराना चाहती है

‘पीपली लाइव’ किसान और मीडिया के चित्रण के जरिये भूमंडलीकरण की प्रक्रिया और उसके दुष्परिणामों की गहरी पड़ताल करता है. सिनेमा का व्यंग्यात्मक रुख राज्य और समाज के रवैये की भी पोल खोलता है.

pipli live

(साभार: IMDb)

भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने एक तरफ़ विकसित और शक्तिशाली देशों के किसानों के पक्ष में लामबंदी की है और विकासशील एवं अविकसित देशों को ऐसी नीतियां बनाने के लिये विवश किया है जिससे इन देशों के किसान का जीना दूभर हो जाये और भूमंडलीकृत बाजार में ये घुटने टेक दें.

विकसित देशों के कृषि उत्पादों का मार्ग प्रशस्त हो जाये. भारत भी उन्हीं देशों में है और पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह किसानों ने यहां आत्महत्या की है और तेजी से इस पेशे से लोगों का पलायन हो रहा है वह बताती है कि ‘कृषि प्रधान देश’ की संज्ञा को निरर्थक करने की नीतिगत नवउदारवादी मुहिम चल पड़ी है.

भूमंडलीकरण एक तरफ किसानों के जीवन को दयनीय बनाते जा रहा है वहीं सूचना प्रसारण के माध्यमों, जिसमें मीडिया भी शामिल है, को बहुत सबल किया है. इस सबलता से दैनिक जीवन में इन माध्यमों का दखल बढा है.

ये माध्यम भी अपने इस दखल को समझ रहे हैं और इसीलिये केवल सूचना के प्रसारण की बजाए सूचना गढ़ भी रहे हैं.

‘पीपली लाईव’ मूलतः मीडिया के इसी चरित्र को किसानों की समस्याओं के आलोक में व्यंग्यात्मक नजरिये से दिखाने की कोशिश करता है.

‘पीपली लाइव’ भूमंडलीकरण की प्रक्रिया और उसके प्रभावों पर एक अद्भुत कटाक्ष है. कहानी शुरू होती है, सड़क पर जिस पर नत्था और उसका भाई गांव की तरफ जा रहे होते हैं और कहानी का अंत होता है नई दिल्ली में किसी निर्माण स्थल पर जहां सड़क ही बन रही है.

नत्था के चेहरे पर हारे हुए व्यक्ति का भाव है जो जीवित है किंतु सामाजिक रूप से मरा हुआ है. यह भूमंडलीकरण की विडंबना भी है जिसमें शक्ति सरंचना से बाहर के अंतिम आदमी के लिये मृत्यु और पलायन जीवन का क्रूर और कटु यथार्थ बन गया है या यूं कहिये कि बना दिया गया है.

भूमंडलीकरण ने सामाजिक और सांस्कृतिक सरंचना को अपनी चपेट में ले लिया है. समाज एक सूचना नेटवर्क में बदल गया है जिसमें राज्य के स्तर की राजनीति और नेताओं की गतिविधियों से लेकर केन्द्रीय नीतियां या तो खबरों की मध्यस्थता से चल रही हैं, या खुद एक खबर बनकर रह जाती हैं.

फिल्म की शुरुआत में ही हमें एक सरकारी नीति का पता खबर के तौर पर मिलता है और साथ ही यह सूचना भी कि भूमंडलीकरण के दौर में किसान और कृषि सबसे अधिक उपेक्षित क्षेत्रों में से हैं.

सरकारें औद्योगीकरण से इतना प्रभावित होती हैं कि किसान उनके लिये केवल तुष्टीकरण की राजनीति का हिस्सा बनकर रह गया है जिसके लिये नीतियों की घोषणा कर सरकारें केवल वोट बैंक की राजनीति कर रही है.

फिल्म में नत्था को आत्महत्या करने से रोकने के लिये मुख्यमंत्री अधिकारी को कोई लाभ देने के लिये निर्देशित करता है. लेकिन नत्त्था सारी योजनाओं को दायरे से बाहर है. जमीन पर वह गरीबी रेखा से नीचे है लेकिन कागज में नहीं है और योजनाएं कागज पर चलती हैं.

इस क्षण में उसे ‘लालबहादुर’(चापाकल) मिलता है जिसके उपयोग के लिये भी उसके पास धन नहीं है. विपक्षी नेता उसे टेलीवजन प्रदान करता है क्योंकि उसने बिरादरी का नाम ऊंचा किया है.

भाई ठाकुर आत्महत्या से रोकने के लिये बल प्रयोग करता है तो केंद्रीय सरकार इस घटना से लाभ लेने के लिये नत्था कार्ड योजनाओं की घोषणा करती है जिसे लागू नहीं ही होना है.

मीडिया टीआरपी के मद्देनजर नत्था के मरने की सूचना को मसालेदार खबर में तब्दील कर देती है और फिर उस क्षेत्र की राजनीति इसी खबर के सहारे चलने लगती है.

नत्था के आत्महत्या की खबर सरकारों को संवेदनशील बनाने की बजाए और आगामी चुनावों के लिये आगाह कर देती है. मीडिया सूचना का राजनीतिकरण करके नत्था के घर को और उसके आस-पास के क्षेत्र को उत्सव स्थल में बदल देता है वो क्षेत्र एक छोटे बाजार में बदल जाता है जो वैश्वीकरण की सबसे बडी ईकाई है. फ़िल्म के अन्त में तमाशा खत्म होते ही बाजार खत्म हो जाता है.

‘पीपली लाइव’ में कथा के कई स्तर हैं जो अपनी योजना में समकालीन शक्ति सरंचना के आवरण को हटाकर उसके यथार्थ को सामने लाता है. कहानी का एक स्तर है जिसमें बुधिया और नत्था जमीन बचाने के लिये संघर्ष करते हैं और आत्महत्या का विकल्प उन्हें बेहतर मिलता है.

इस पूरे परिदृश्य को किसान और उसकी जमीन को बचाने की जुगत से देखना चाहिये. नत्था के मरने की घोषणा इसलिये महत्त्वपूर्ण हो जाती क्योंकि उपचुनाव का समय है और यह समय ही उसे एक व्यापक परिदृश्य में खींच लेता है.

कहानी का दूसरा स्तर राजनीति है जो आत्महत्या की घटना के सामने आने पर अपनी पूरी रंगत और फंक्शनिंग में नंगे रूप में सामने आती है. भाई ठाकुर का चुनाव लड़ना, स्थानीय प्रशासन की मिली भगत और उसका भ्रष्ट रूप, विपक्षी नेता पप्पू लाल की अवसरवादिता भी सामने आती है.

क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति का द्वंद्व भी सामने आया है. प्रदेश के मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा इस चुनाव में दांव पर लगी है और केंद्रीय कृषि मंत्री भी इस मौके को भुनाने के ताक में है.

नौकरशाही का एक बुजुर्ग अपने अनुभव के साथ शांत है उसे पता है कि समस्या का हल कैसे होगा. एक नया नौकरशाह विचलित है लेकिन उसे भी एक दिन इस व्यवस्था में पकना है.

फिल्म के अंत में सभी राजनीतिक शक्तियां एक होने लगती है, भाई ठाकुर अकेला पड़ जाता है. इस पूरे घटनाक्रम में नत्था की आत्महत्या की खबर गौण हो जाती है. सभी राजनीतिक दांव पेंच इस अवसर का लाभ उठाने में लगाये जाने लगते हैं.

कहानी का तीसरा स्तर मीडिया की कार्यप्रणाली और उसके भीतरी खेल को उजागर करता है. कैसे वह राजनीतिक और सत्ता के पक्ष में बहती है. इसी में अंग्रेजी और हिंदी मीडिया के स्तर का अंतर, आपसी भेंड़ चाल और प्रतिस्पर्धा, टीआरपी के लिये बेचैनी, खबरों के लिये जोड़तोड़ इत्यादि सामने आता है.

पीपली लाइव में साफ़ दिखता है कि मीडिया में जो जरूरी चीज नहीं है वह है संवेदनशीलता. पीपली के जीवन को मीडिया तमाशे में बदल देता है. नत्था के व्यक्तिगत जीवन को मुश्किल में डाल देता है लेकिन कभी भी समस्या की तह में नहीं जाता, यह जानने की कोशिश भी नहीं करता कि आखिर नत्था ही मरा है या कोई और मीडिया निरंतर भागने की जल्दीबाजी में है वह ठहरना नहीं चाहता.

चूंकि मीडिया का दखल समकालीन जीवन में बढ़ा है इसलिये फिल्म भी मीडिया के ही बहाने यथार्थ को दिखना चाहता है. इससे मीडिया के असली चरित्र और सामाजिक यथार्थ को दिखाने का दोहरा उद्देश्य पूरा होता है.

पीपली लाइव में हाई प्रोफाइल अंग्रेजी पत्रकार नंदिता मलिक से स्थानीय पत्रकार राकेश सवाल करता है. फिल्म में यहीं वे सवाल है जहां भूमंडलीकरण और किसान के संबंध और सिनेमा के भीतर की केंद्रीय घटनाक्रम में मीडिया की भूमिका से आवरण हट जाता है.

नंदिता के पास राकेश के सवालों के जवाब नहीं है. खीझ है, अपनी स्टोरी की चिंता है. यही नंदिता मलिक जो टीआरपी को फेक बता चुकी हैं और डाटा कलेक्शन पर भी अपना संदेह व्यक्त करते हुए अपने बॉस से कहती है कि ‘वह ध्यान खींचने के लिये किसी की हत्या कर दे क्या?’ फिल्म में यह एक ऐसी जगह है जिसकी व्याख्या से हम फिल्म को समझ सकते है.

यही वह प्रवेशद्वार हैं जहां से ‘पीपली लाइव’ को समझना आसान हो जाता है. आइये इन सवालों से एक बार रू-ब-रू हो लें.

नंदिता जी ये नत्था हमारे लिये इतना जरूरी क्यों है?

नत्था यु टाकिंग अबाउट नत्था, ओके! एक किसान अगर कर्ज में दबकर सुसाइड कर रहा है और तुम्हे लगता है कि ये इम्पोर्टेंट नहीं है!

हां इम्पोर्टेंट तो है लेकिन इस गांव में और भी तो बहुत सारे किसान रहते हैं, उनका क्या? वो इम्पोर्टेंट नहीं है?

यु डोंट जस्ट अबांडन द स्टोरी मिडवे राकेश एंड मूव आन टु समथिंग एल्स नो यु गाट टू फ़ॉलो इट राइट टू इट्स कन्क्लुसन

नंदिता जी इस गांव में एक किसान रहता था होरी महतो उसकी जमीन की नीलामी हो गई थी तो ये जो बंजर जमीन होती है ना बंजर इसकी मिट्टी खोदकर के इंट के भठ्ठे पर बेच देता था वो और मेहनत में उसको कोई पंद्रह हां पंद्रह बीस रुपये मिल जाते थे

व्हाट्स योर प्वाइंट राकेश

उसी के खोदे हुए गढ्ढे में उसकी लाश मिली, लोग कह रहे हैं कि भूख से मर गया ये इंपोर्टेंट नहीं है!

फाइन! इफ़ इट मेक्स यू हैप्पी विल सेन्ड ए रिपोर्ट एंड वी डू एन एंटायर फ़ीचर आन ईट

लेकिन वो तो मर गया

लेट मी एक्स्प्लेन दिस टू यू…रिसर्च कहता है कि लोग सिर्फ़ नत्था में इंट्रस्टेड हैं, डु यु नो व्हाई ? बीकाज ही एज ओरोजिनल लाइफ़ सुसाइडर, डु यु हैव एनी आइडिया हाउ बिग इज दिस?

नत्था के मिलने से सारी प्रोब्लम का सोल्युशन हो जायेगा क्या?

नो..नो.. कोई सोल्युशन नहीं मिलने वाला है

कोई लोग डाक्टर बन जाते हैं कोई लोग इंजीनयर बन जाते हैं एंड वी आर जर्नलिस्ट .दिस इज जस्ट वी डु इफ यू कांट हैंडल इट देन यू आर इन रॉंग प्रोफ़ेशन

एक यथार्थ है जो सामने में उपस्थिति है लेकिन समस्त सरंचनाएं उस यथार्थ से भटकाने का उपक्रम कर रही है. वर्तमान आर्थिक नीतियां यही चाहती है कि व्यक्ति उपभोक्ता भर रह जाये. वह सामाजिक यथार्थों से अपना मुंह मोड़ ले. मीडिया का बहुलांश इस प्रक्रिया को तेज करने में मदद करता है.

‘पीपली लाइव’ में मीडिया का चित्रण तीन स्तर पर हुआ है. अंग्रेजी मीडिया, हिंदी मीडिया, जो अंग्रेजी मीडिया का अनुयायी बनकर रह गया है और तीसरा स्तर है स्थानीय. जिसका एक ऐसा पत्रकार जो केवल उतेजना नहीं संवेदनशील और उपेक्षित सूचना को बाहर लाना चाहता है.

फिल्म के अंत में नत्था की जगह पर राकेश की मृत्यु असली खबर की संभावना की भी मत्यु है. राकेश गलत समय में गलत जगह पर है. मीडिया नत्था के आत्महत्या की घोषणा को एक उन्माद में बदल देता है. लेकिन यहां यह ध्यान देना चाहिये कि यह उन्माद पीपली की जनता में नहीं है वह तो आश्चर्यचकित और वीतरागी भाव से इसका साक्षी है.

जाहिर है मीडिया द्वारा पैदा किया यह उन्माद मध्यवर्गीय ड्राइंगरूम दर्शकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिये है. यथार्थ अपनी जगह पर मौजूद है लेकिन लोग वहीं यथार्थ देख पा रहे हैं या देखना चाह रहे हैं जो माध्यम दिखा रहा है.

बाकी उनकी आंख से ओझल है. माध्यम की दिलचस्पी कमाई में है समस्या के निदान में नहीं. उसके लिये बाकी सब व्यर्थ है.मीडिया के इस उन्माद में किस की जिज्ञासा यह नहीं है कि नत्था या उस जैसे लोग क्यों आत्महत्या कर रहे हैं, सब यह जानना चाहते हैं कि नत्था आत्महत्या कर रहा है कि नहीं?

‘क्यों’ के पीछे मीडिया नहीं जाता क्योंकि वह उस भूमंडलीकरण की प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाना चाहता जहां से वह निवेश हासिल कर रहा है. इस ‘क्यों’ का जवाब इसी गांव के किसान के पास है.

वह कहता है कि ‘अमेरिकी खाद डालो, अमेरीकी बीज डालो और बारिश का इंतजार करो इससे अच्छा है कि सब जमीने सरकार ले ले और पेंशन दे’. भूमंडलीकरण की व्यवस्था भी यह चाहती है कि किसान अपनी ही जमीन पर स्वयं खेती ना करे मजदूरी करे और वह उपजाये जो कॉरपोरेट चाहते हैं.

1936 में प्रकाशित हुए ‘गोदान’ उपन्यास के किसान से ‘पीपली लाइव’ के किसान की स्थिति बहुत भिन्न नहीं है. गोदान में प्रेमचंद किसानों को मजदूर बदलने की प्रक्रिया की शुरुआत को दिखा रहे हैं, बैंकों का उदय हो रहा है और भविष्य में वह साहुकारों का स्थान लेने के लिये तैयार है.

वह साहूकार जो किसानों को कर्जे और ब्याज की बोझ से दबाकर उस को उसी की जमीन पर मजदूर बना रहा है. प्रेमचंद ने गोदान में ही देख लिया था कि ‘गोबर’ का भविष्य क्या होगा.

‘पीपली लाइव’ में साहुकार और बैंक दोनों अपने क्रूरतम चरित्र में सामने है. क्योंकि इनको राज्य का भी सरंक्षण प्राप्त है. बैंक के कर्जे की चपेट में बुधिया भाइ ठाकुर से पैसा मांगने जाता है तो भाइ ठाकुर उसे बैंक से लेने की उलाहना देता है जाहिर है यह उसे पसंद नहीं कि बुधिया बैंक से कर्ज ले.

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो: पीटीआई)

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो: पीटीआई)

बुधिया कर्ज के बदले बेगार करने के लिये भी तैयार है. बैंक का खौफ़ इनके जीवन पर ऐसा है कि घर में आये मीडियाकर्मियों से से बुधिया की अम्मा पूछती है ‘बंक से आये हो…’ किसान साहुकार से बचने के लिये बैंक के पास जाते हैं और बैंक से बचने के लिये साहुकार के पास आते हैं.

बैंक की चपेट में ये जमीन से हाथ धो बैठते है और साहुकार की चपेट में बेगारी, शोषण और जलालत के चक्र में उलझ जाते हैं. किसानों को जीवित रखने की योजनाएं बेअसर है और मरने का मुआवजा आकर्षक.

बुधिया और नत्था को आत्महत्या के विकल्प उसे साहुकार सुझाता है, बैंक ने पृष्ठभूमि तैयार कर ही दी है मीडिया किसान की आत्महत्या की परिस्थिति को तमाशे में बदल देता है. लेकिन इस सारी प्रक्रिया में नत्था अपनी परिणति को नहीं रोक पाता अंततः वह मजदूर बनने को विवश होता है.

भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने किसानों के लिये यही नियति निर्धारित की है. आखिर ‘विकास’ के लिये बड़ी बड़ी सरंचनाओं के निर्माण के लिये मजदूर कहां से आयेंगे. यह अनायास नहीं कि फिल्म में ‘होरी महतो’ और ‘धनिया’ नाम के किरदार है.

नत्था की पत्नी धनिया के तेवर भी गोदान की धनिया जैसे ही है. वह अपनी स्थिति की जटिलता से वाकिफ है. अपने पति के बड़े भाई बुधिया की चालाकी से भी. वह चुपचाप सहन नहीं करती बल्कि मुखर होकर विरोध करती है. सिनेमा में कैमरा जब भी धनिया पर ठहरता है उसकी आंखों के बढ़ते सूनेपन को महसूस किया जा सकता है.

नत्था के प्रति उसके प्रेम की अभिव्यंजना फिल्म में कहीं मुखर नहीं है लेकिन उसके विद्रोही तेवर में ही वह प्रेम और भय छुपा है जो नत्था की मृत्यु की आशंका से उपजा है.

नत्था अपने मरने के पीछे उसके लिये सूनापन ही छोड़ जायेगा, वह इस बात से भी आहत है कि निर्णय प्रक्रिया में भी उसको शामिल नहीं किया गया. एक तरह से इस किरदार में आत्महत्या करने वालों किसानों के पीछे छूट गई विधवाओं की जिंदगी की झलक आसानी से देखी जा सकती है.

‘होरी महतो’ पीपली लाइव का एक गौण पात्र है लेकिन उसकी योजना में गहरे निहितार्थ छिपे है. बैंक कर्जे में उसकी जमीन छीन गई है. मिट्टी पर हल चलाने की जगह वह मिट्टी खोद कर अपनी जीविका चलाता है और एक दिन इसी मिट्टी में उसकी मृत्यु हो जाती है.

यह मौत राकेश के अलावा किसी को विचलित नहीं करती. होरी महतो की मौत तब भी सुर्खियां नहीं बन पाती जब उसी गांव में मीडिया का ताम झाम मौजूद है. वह एक ऐसे यथार्थ की उपस्थिति है जिसकी तरफ कोई देखना नहीं चाहता क्योंकि उसको बाजार में बेचा जा नहीं सकता और स्थानीय लोगों के लिये सामान्य घटना.

क्या यह स्वाभाविक मौत है? बिलकुल नहीं. ‘गोदान’ के होरी महतो की तरह यह होरी महतो भी पूंजीवादी, बाजारवादी, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था का शिकार है. जिसकी मृत्यु को स्वाभाविक बना देना एक षड्यंत्र ही है.

‘पीपली लाइव’ किसान और मीडिया के चित्रण के जरिये भूमंडलीकरण की प्रक्रिया और उसके दुष्परिणामों की गहरी पड़ताल करता है. सिनेमा का व्यंग्यात्मक रुख राज्य और समाज के रवैये की भी पोल खोलता है.

‘पीपली लाइव’ साफ तौर पर दिखाता है कि राज्य सत्ता सीधे तौर पर भूमंडलीकरण और पूंजीवादी ताकतों के हाथ की एजेंसी है और मीडिया इसमें मुख्य मददगार है.

(स्मृति सुमन दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं)