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क्या खेती करने में बुद्धि का इस्तेमाल नहीं होता?

खेती से जुड़े किसी भी काम को अकुशल श्रम माना जाता है. क्या मिट्टी की पहचान के साथ फसल तय करने में बुद्धि का इस्तेमाल नहीं होता? बीज अंकुरित होगा या नहीं, यह जांचना गैर-तकनीकी काम है? कौन से उर्वरक-खाद डालना है, कब डालना है, क्या यह विशेषज्ञता का काम नहीं है?

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(फोटो: पीटीआई)

किसानों को अपनी उपज का सही दाम न मिलने का सबसे बड़ा कारण न्यूनतम मजदूरी/वेतन का दुर्भावनापूर्ण और भेदभावकारी निर्धारण है.

एक तरफ तो खेती मौसम और बाज़ार के उतार-चढ़ावों के कारण आज सबसे अनिश्चित कार्य बन गया है, तो वहीं दूसरी ओर देश में सबसे कम (न्यूनतम से भी कम) पारिश्रमिक कृषि क्षेत्र में काम करने वालों को दिया जा रहा है.

कदम-कदम पर नीतियां किसानों और श्रमिकों के हितों-हकों के ख़िलाफ़ हैं. यह महज़ कल्पना नहीं, राजनीतिक-आर्थिक सच्चाई है. जरा इस तथ्य पर गौर कीजिये कि खेती से जुड़े किसी भी काम को अकुशल श्रम माना जाता है, यही अपने आप में एक बेहद किसान विरोधी और असंवेदनशील नजरिया है.

इस पर भी उनके श्रम को और ज्यादा कमतर आंका जाता है. मसलन अभी की स्थिति यह है कि मध्य प्रदेश में किसी भी क्षेत्र में अकुशल श्रम के लिए न्यूनतम मूल वेतन (मजदूरी) 274 रुपये प्रतिदिन तय किया गया है.  इसमें वेतन 250 रुपये और अन्य भत्तों के 24 रुपये शामिल हैं, खेती करने वाले का क्या?

खेती करने वाले को भी अकुशल श्रमिक ही माना गया है, किन्तु उसे अकुशल श्रमिक से भी कम मानदेय का प्रावधान किया गया है, इनके लिए कुल 200 रुपये की मजदूरी तय की गई है, जिसमें से 178.33 रुपये उनका वेतन होता है.

इसके दूसरी तरफ अर्धकुशल मजदूरी के लिए कुल 307 रुपये और कुशल मजदूरी के लिए 360 रुपये का प्रावधान किया गया है.

मध्य प्रदेश के श्रम विभाग की न्यूनतम वेतन की अधिसूचना में दी गई परिभाषाओं को एक बार सभ्यता के पैमानों पर परखना जरूरी है. इस अधिसूचना के अनुसार-

कुशल कर्मचारी से अभिप्रेत है जो दक्षतापूर्वक कार्य कर सके, काफी स्वतंत्रता से निर्णय, बुद्धि का प्रयोग कर सकें तथा जिम्मेदारी से अपने कर्तव्य का पालन कर सकें. उसे उस व्यवसाय शिल्प या उद्योग का, जिसमें वह नियोजित किया गया हो, पूर्ण एवं विस्तृत ज्ञान होना चाहिए.

अर्धकुशल कर्मचारी से अभिप्रेत है, जो सामान्यतः रोज़मर्रा एक निश्चित स्वरूप का काम करता हो, जिसमें कि उसमें उतनी निर्णय, बुद्धि, कुशलता तथा निपुणता की अपेक्षा न की जाती हो, किन्तु उसमें सापेक्षित रूप से ऐसे छोटे काम, जो उसे सौंपे जाएं, उचित रूप से करने की अपेक्षा की जाती हो और उसमें महत्वपूर्ण निर्णय दूसरे व्यक्तियों द्वारा लिए जाते हों. इस प्रकार उसका कार्य बंधे बंधाये रोज़मर्रा के कार्य के करने तक ही सीमित है.

अकुशल कर्मचारी से अभिप्रेत है जो, ऐसे सरल कार्य करता है, जिसमें स्वतंत्र निर्णय या पूर्ण अनुभव की बहुत कम या बिलकुल आवश्यकता नहीं पड़ती, यद्यपि व्यावसायिक परिस्थितियों से परिचित होना आवश्यक होता है. इस प्रकार शारीरिक श्रम के अलावा उसे विभिन्न वस्तुओं, माल तथा सेवाओं से परिचित होना चाहिए.

उच्च कुशल कर्मचारी वह है जो तकनीकी एवं विशिष्ट स्वरूप का कार्य करने में पूर्ण रूप से दक्ष हो, काफी स्वतंत्रता से निर्णय, बुद्धि का प्रयोग कर जिम्मेदारी से अपने कर्तव्य का पालन कर सके एवं तकनीकी डिग्री एवं डिप्लोमाधारी हो, उसे व्यवसाय, तकनीकी शिल्प या उद्योग के, जिसमें वह नियोजित किया गया हो, पूर्ण एवं विशिष्ट ज्ञान होना अपेक्षित है.

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(फोटो: पीटीआई)

आपके लिए कुछ सवाल यह है कि जरा सोचिये किसान को अकुशल कर्मकार क्यों माना जाना चाहिए? क्या मिट्टी की पहचान के साथ फसल तय करने में बुद्धि का इस्तेमाल नहीं होता है?

बीज अंकुरित होगा या नहीं, यह जांचना गैर-तकनीकी काम है? खेत में निराई और गुड़ाई करना, केवल शारीरिक श्रम है, क्या इसमें बुद्धि का इस्तेमाल नहीं होता है?

कौन से उर्वरक-खाद डालना है, कब डालना है; क्या यह विशेषज्ञता का काम नहीं है? पांच या सोलह फसलों से एकसाथ उपज कैसे ली जाए और जैविक सामग्री से खाद कैसे बनायी जाए; क्या यह गैर-तकनीकी और बिना बुद्धि के किये जाने वाले काम हैं? बैल को हल से बांधना और गाय का दूध निकालना बिना बुद्धि का काम है?

कृषि उपज के न्यूनतम समर्थन मूल्य के निर्धारण में मानव श्रम का हिस्सा सबसे ज्यादा (अलग-अलग राज्यों में 32 से 60 प्रतिशत तक) होता है, किन्तु उसका आकलन कृषि में नियोजन के लिए तय की जा रही न्यूनतम वेतन (कृषि क्षेत्र के लिए न्यूनतम मजदूरी) के आधार पर किया जाता है.

इससे खेती में जुटने वाले किसानों और मजदूरों, दोनों को ही अपने श्रम का उचित पारिश्रमिक नहीं मिल पाता है. अपने आप में यह अन्यायकारी और अपमानजनक व्यवस्था है.

मेरा जवाब यह है कि श्रम और खेती की नीति बनाने वाले वस्तुतः श्रम और श्रमिक के प्रति भेदभावपूर्ण नजरिया रखते हैं. उन्हें लगता है कि केवल मशीन चलाना या कम्प्यूटर पर गिट-पिट करना ही तकनीकी और विशेषज्ञता का काम है; खेती का काम बिना बुद्धि, बिना समझ और बिना विशेषज्ञता के किये जाना वाला काम है.

दुखद तथ्य यह है कि किसान और खेती से खुद जुड़े होने का दावा करने वाले मंत्री और मुख्यमंत्रियों ने भी कभी यह छोटी सी पहल नहीं की कि खेती का काम करने वाले लोगों को कुशल श्रमिक/श्रम का दर्ज़ा दिलवाते.

वे यह देखकर भी चुप रहे कि किसान को न्यूनतम से भी न्यूनतम मजदूरी का हकदार माना गया है. खेती का उद्धार तो दूर का सपना है; वास्तव में हम किसान और खेतिहर मजदूर से गरिमामय व्यवहार करना भी नहीं सीख पाये.

ऐसा महसूस होता है कि पिछले 50 सालों में (वर्ष 1964-65 से) नीतिगत कोशिशों से खेती में काम करने वालों के लिए बदहाली की स्थिति पैदा की जा रही है, ताकि वे खेती का काम छोड़ दें.

बहरहाल इस अवधि में भारत सरकार और राज्य सरकारों ने खेती के संरक्षण के लिए बहुत से क़दमों का विज्ञापनों के जरिये खूब प्रचार-प्रसार किया है; किन्तु इसके उलट ऐसा क्यों हुआ कि देश में वर्ष 2001 से 2015 के बीच हर रोज खेती से जुड़े 44 लोगों ने आत्महत्या की.

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(फोटो: रॉयटर्स)

वर्ष 2001 से 2011 के बीच भारत में हर महीने 70,833 किसानों ने और 10 दस सालों में 85 लाख किसानों ने खेती का काम छोड़ा है. 21 मार्च 2017 को कृषि राज्य मंत्री ने राज्य सभा में बताया कि एनएसएसओ के द्वारा किये गए किसानों की स्थिति के मूल्यांकन सर्वेक्षण के मुताबिक 27 प्रतिशत किसान खेती को पसंद नहीं करते हैं क्योंकि यह लाभप्रद नहीं है.

40 प्रतिशत किसानों ने कहा कि यदि उनके पास विकल्प हों तो वे कुछ अन्य करिअर की खोज कर सकते हैं.

सरकार की नीति है कि खेती को नुकसान देने वाला काम बनाया जाए, ताकि वे जमीन छोड़ें और एग्रो बिजनेस (यानी उद्योगपति आलू उगाए, खुद चिप्स बनाए, बनी-बनाई आलू टिक्की को पैक करे और खुद की विक्रय श्रृखंला के जरिये फुटकर में बेंचे. इससे वह हर स्तर पर मुनाफा कमा पाता है.) को बढ़ावा दे.

दूसरा वित्तीय नीति से सम्बंधित तर्क यह है कि किसान जब ऊंची लागत लगाकर उत्पादन करता है, तो सरकार को उसे ज्यादा रियायत और मदद देना पड़ती है. बेहतर है कि किसान को सरकारी मदद के बजाय कृषि बीमा और फसल बीमा से जोड़ दिया जाए.

इससे सरकार पर बोझ नहीं आएगा; लेकिन बीमा व्यवस्था वस्तुतः खेती को संरक्षण देने की मंशा से बाज़ार में नहीं आई है. इसका लाभ बीमा कंपनी को ही मिलता है.

यह ध्यान रखना होगा कि कृषि और किसान को बाजार में धकेला गया तो हमारी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में टूटन भी होगी और उपभोक्ता को भी गहरे आघात झेलने होंगे.

(लेखक सामाजिक शोधकर्ता और अशोका फेलो हैं.)

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