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पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2020 का विरोध क्यों हो रहा है

विवादित पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2020 के ज़रिये व्यापार सुगमता के नाम पर मोदी सरकार पर्यावरण को गंभीर ख़तरा पहुंचाने का रास्ता खोल रही है और हमेशा से ही पर्यावरण को बचाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नागरिकों को ही फ़ैसला लेने के अधिकार से बाहर कर रही है.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने बीते 30 जून को मोदी सरकार की विवादित पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2020 पर जनता द्वारा टिप्पणी भेजने की समयसीमा को बढ़ाकर 11 अगस्त कर दिया. इससे पूर्व ये तारीख 30 जून 2020 थी.

द वायर  ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि लोगों द्वारा भेजे गए सुझावों के आधार पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारियों ने प्रस्ताव रखा था कि कोरोना महामारी को ध्यान में रखते हुए अधिसूचना पर सुझाव और आपत्तियां भेजने की आखिरी तारीख को 60 दिन बढ़ाकर 10 अगस्त 2020 किया जाना चाहिए.

हालांकि पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने एकतरफा फैसला लेते हुए इस मांग को खारिज कर दिया था और बिना कोई कारण बताए अधिसूचना पर राय देने की समयसीमा 30 जून 2020 तय की.

इसे लेकर पर्यावरण कार्यकर्ता विकांत तोंगड़ ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिस पर फैसला देते हुए कोर्ट ने ईआईए अधिसूचना, 2020 पर जनता द्वारा टिप्पणी भेजने की आखिरी तारीख बढ़ाकर 11 अगस्त 2020 कर दी.

इस कदम से ऐसे लोगों को काफी राहत पहुंची है जो लॉकडाउन के दौरान पोस्टल सुविधाएं चालू नहीं होने के कारण अपनी राय नहीं दे पाए थे.

द वायर  ने अपनी एक अन्य रिपोर्ट में बताया था कि बड़ी संख्या में लोग इसका विरोध कर रहे हैं और ईआईए अधिसूचना भारत के राजपत्र में प्रकाशित होने के सिर्फ 10 दिन के भीतर सरकार को 1190 पत्र सिर्फ ईमेल के जरिये प्राप्त हुए, जिसमें से 1144 पत्रों में इसका कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए पर्यावरण मंत्रालय से इसे वापस लेने की मांग की गई है.

कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों का कहना है कि ईआईए अधिसूचना, 2006 में बदलाव करने के लिए लाई गई ये नई  अधिसूचना पर्यावरण विरोधी और हमें समय में पीछे ले जाने वाली है.

आइए समझते हैं कि ईआईए अधिसूचना क्या है और आखिर क्यों इसका विरोध हो रहा है.

ईआईए अधिसूचना की शुरुआत

साल 1984 में मध्य प्रदेश के भोपाल में हुई गैस त्रासदी के बाद देश भर में जोर-शोर से ये मांग उठने लगी की भारत पर्यावरण सुरक्षा को लेकर एक कानून बनाए.

पर्यावरण पर स्टॉकहोम डेक्लरेशन (1972) पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत ने जल नियंत्रण (1974) और वायु प्रदूषण (1981) के संबंध में तो कानून बना दिया था, लेकिन पर्यावरण के संबंध में अब भी मजबूत कानून का इंतजार था.

भोपाल गैस त्रासदी जैसी भयावह घटना के बाद ये संभव हो पाया और देश ने 1986 में पर्यावरण संरक्षण के लिए एक कानून बनाया. इसी कानून के तहत साल 1994 में पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) नियमों का जन्म हुआ.

इसके जरिये कई प्रावधान निर्धारित किए गए ताकि प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों की निगरानी की जा सके.

ईआईए अधिसूचना आने के बाद विभिन्न परियोजनाओं को इससे गुजरना होता था और इसके तहत सभी शर्तों का पालन किए जाने की स्थिति में ही परियोजनाओं को कार्य शुरू करने की मंजूरी दी जाती थी.

हालांकि आगे चलकर इसमें कुछ बदलाव किए गए और साल 2006 में एक नई अधिसूचना जारी की गई जिसे हम ईआईए अधिसूचना, 2006 के नाम से जानते हैं. अब मोदी सरकार इसमें और बदलाव करना चाहती है, जिसके लिए एक नई अधिसूचना का ड्राफ्ट जारी किया गया है.

वैसे तो ईआईए अधिसूचना की परिकल्पना पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए की गई थी, हालांकि कार्यकर्ता और विशेषज्ञों की दलील है कि सरकार इसके जरिये कई पर्यावरण विरोधी गतिविधियों को कानूनी मान्यता प्रदान कर रही है.

उदाहरण के तौर पर इस अधिसूचना का एक सबसे महत्वपूर्ण भाग ये है कि परियोजनाओं को मंजूरी लेने से पहले इसकी वजह से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन रिपोर्ट पेश करनी होती है. लेकिन बार-बार ऐसा होता आया है और अब यह एक आम चलन बनने जैसा प्रतीत होता है, कि कंपनियां इसे लेकर फर्जी रिपोर्ट बनवा लेती हैं और उत्तरदायी ठहराए जाने से बच निकलती हैं.

सरकारी विभागों की क्षमता में भी काफी कमी है जिसके कारण वे इन नियमों का अनुपालन कराने में असफल रहते हैं. इसके अलावा साल दर साल इस अधिसूचना में संशोधन करके विभिन्न परियोजनाओं या उद्योगों को इसके दायरे से बाहर किया जाता रहा है.

हालांकि कंपनियों/उद्योगों का एक दूसरा धड़ा भी है जो ये कहता है कि ऐसे नियमों की वजह से उद्योग लगाने में देरी होती है और लालफीताशाही बढ़ जाती है.

मालूम हो कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में ये एक बड़ा मुद्दा बना था कि पर्यावरण मंत्रालय में बहुत सारी परियोजनाएं अटकी पड़ी हैं और उन्हें पर्यावरण को बचाने के नाम पर मंजूरी नहीं दी जा रही है.

इसे लेकर उस समय प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग सरकार पर हमला करते हुए कहा था कि पर्यावरण मंत्रालय से तब तक फाइल नहीं हिलती है जब तक कि ‘जयंती टैक्स’ नहीं दे दिया जाता है.

तत्कालीन कांग्रेस नेता जयंती नटराजन उस समय पर्यावरण मंत्री थीं और दिसंबर 2013 में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया था.

मोदी ने कहा था उनकी सरकार आते ही इन परियोजनाओं को तेजी से मंजूरी दी जाएगी. बाजारोन्मुखी और किसी कीमत पर तथाकथित विकास चाहने वाले लोगों का तर्क है कि बेवजह पर्यावरण का नाम देकर परियोजनाओं को लंबित रखना सही नहीं है.

वहीं विशेषज्ञों का कहना है कोई परियोजना इसलिए नहीं रोकी जाती कि लोग या विभाग विकास की राह में रोड़ा डालना चाहते हैं, बल्कि उसे इसलिए रोका जाता है क्योंकि वे पर्यावरण संबंधी जरूरी शर्तों को पूरा नहीं कर पाते हैं.

ईआईए अधिसूचना, 2020 के साथ क्या समस्याएं हैं

किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में सरकार को ऐसे कानूनों पर जनता की राय लेनी होती है, जिससे बड़ी संख्या में लोगों के प्रभावित होने की संभावना होती है और कानून के प्रावधानों में उन्हें भागीदार बनाना होना होता है.

पर्यावरण को लेकर ये नई अधिसूचना लोगों के इस अधिकार को छीनतर है और पर्यावरण को बचाने में लोगों की भूमिका का दायरा बहुत कम करती है. वहीं दूसरी तरफ इसमें सरकार की फैसले लेने की विवेकाधीन शक्तियों को और बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है.

राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा से जुड़ीं परियोजनाओं को वैसे ही रणनीतिक माना जाता है, हालांकि सरकार अब इस अधिसूचना के जरिये अन्य परियोजनाओं के लिए भी ‘रणनीतिक’ शब्द को परिभाषित कर रही है.

अधिसूचना को लेकर साल 2020 के मसौदे के मुताबिक ऐसी परियोजनाओं के बारे में कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी, जो इस श्रेणी में आती हैं.

इसका खतरा ये है कि अब कई सारी परियोजनाओं के लिए रास्ता खुल जाएगा. उद्योग ऐसी परियोजनाओं को ‘रणनीतिक’ बताकर आसानी से मंजूरी ले लेंगे और उन्हें इसकी वजह भी बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

इसके अलावा नई अधिसूचना विभिन्न परियोजनाओं की एक बहुत लंबी सूची पेश करती है जिसे जनता के साथ विचार-विमर्श के दायरे से बाहर रखा गया है.

उदाहरण के तौर पर देश की सीमा पर स्थित क्षेत्रों में रोड या पाइपलाइन जैसी परियोजनाओं के लिए सार्वजनिक सुनवाई (पब्लिक हीयरिंग) की जरूरत नहीं होगी.

विभिन्न देशों की सीमा से 100 किमी. की हवाई दूरी वाले क्षेत्र को ‘बॉर्डर क्षेत्र’ के रूप में परिभाषित किया गया है. इसके कारण उत्तर-पूर्व का अच्छा खासा क्षेत्र इस परिभाषा के दायरे में आ जाएगा, जहां पर देश की सबसे घनी जैव विविधता है.

इसके अलावा सभी अंतरदेशीय जलमार्ग परियोजनाओं और राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण को ईआईए अधिसूचना के तहत मंजूरी लेने के दायरे से बाहर रखा गया है.

इन दोनों परियोजनाओं को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा काफी बढ़ावा दिया गया है. इसमें उन सड़कों को भी शामिल किया गया है जो जंगलों और नदियों से गुजरती हैं. खास बात ये है कि ये परियोजनाएं अभी भी सवालों के घेरे में हैं.

द वायर  ने अपनी दो (भाग-1 और भाग-2) इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट के जरिये बताया था कि अंतरदेशीय जलमार्ग से जुड़े कानून को बनाते वक्त कई स्तरों पर मंत्रालयों, विशेषज्ञों और यहां तक कि राज्य सरकारों को भी दरकिनार किया गया था. इसे लेकर भारत सरकार के विभागों ने ही चिंता जाहिर की थी कि इस तरह का निर्माण पर्यावरण और भारत सरकार के खजाने के लिए सही नहीं है.

ईआईए अधिसूचना, 2020 ने एक सबसे चिंताजनक और पर्यावरण विरोधी प्रावधान ये शामिल किया गया है कि अब उन कंपनियों या उद्योगों को भी क्लीयरेंस प्राप्त करने का मौका दिया जाएगा जो इससे पहले पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करती आ रही हैं. इसे ‘पोस्ट-फैक्टो प्रोजेक्ट क्लीयरेंस’ कहते हैं.

इससे पहले मोदी सरकार मार्च 2017 में भी इस तरह की मंजूरी देने के लिए अधिसूचना लेकर आई थी और उसी को यहां दोहराया जा रहा है.

प्रावधानों के मुताबिक ईआईए अधिसूचना लागू होने के बाद यदि किसी कंपनी ने पर्यावरण मंजूरी नहीं ली है तो वो 2,000-10,000 रुपये प्रतिदिन के आधार पर फाइन जमा कर के मंजूरी ले सकती है.

अब जरा इस मामूली फाइन की तुलना प्रतिदिन उल्लंघन करने वाले किसी केमिकल उद्योग या कोयला खनन या अवैध बालू खनन से कीजिए. एक दिन में एक ट्रक अवैध कोयला या बालू की कीमत क्या होगी और सरकार एक दिन का कितना हर्जाना वसूल रही है.

खास बात ये है कि सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरण के मामलों में इस तरह के प्रावधान को पहले ही खारिज कर दिया है.

एक अप्रैल को अपने एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘पोस्ट फैक्टो पर्यावरण मंजूरी’ कानून के खिलाफ है. पीठ ने कहा था कि यह एहतियाती सिद्धांत के साथ-साथ सतत विकास की आवश्यकता के भी खिलाफ है.

इस अधिसूचना के मसौदे में ये कहा गया है कि सरकार इस तरह के उल्लंघनों का संज्ञान लेगी. हालांकि ऐसे पर्यावरणीय उल्लंघन या तो सरकार या फिर खुद कंपनी द्वारा ही रिपोर्ट किए जा सकते हैं. यहां पर जनता द्वारा किसी भी उल्लंघन की शिकायत करने का कोई विकल्प नहीं है.

ये अपने आप में कितना हास्यास्पद है कि सरकार उम्मीद कर रही है कि पर्यावरण का उल्लंघन करने वाली कंपनी खुद सरकार को ये बताएगी कि वो उल्लंघन कर रही है या कानून तोड़ रही है.

सरकार के ये सारे प्रावधान पर्यावरण संरक्षण के लिए बने मूल कानून के साथ ही गंभीर विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न करते हैं.

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा तीन के तहत ईआईए अधिसूचना जारी की गई है और इसमें कहा गया है कि ऐसा प्रावधान पर्यावरण को बचाने और उसकी बेहतरी के लिए है.

हालांकि सरकार व्यापार सुगमता के नाम पर पर्यावरण को गंभीर खतरा पहुंचाने का रास्ता खोल रही है और हमेशा से ही पर्यावरण को बचाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले स्थानीय नागरिकों को ही फैसले लेने के दायरे से बाहर कर रही है.