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समर्पण को सहमतिपूर्ण यौन संबंध नहीं माना जा सकता: केरल हाईकोर्ट

साल 2009 में अनुसूचित जाति की नाबालिग लड़की से हुए बलात्कार के आरोप में निचली अदालत ने एक बुज़ुर्ग को दोषी ठहराया था. इस व्यक्ति ने इस फ़ैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए यह कहा कि उसने सहमति से यौन संबंध बनाए थे.

केरल हाईकोर्ट (फोटो: पीटीआई)

केरल हाईकोर्ट (फोटो: पीटीआई)

कोच्चिः केरल हाईकोर्ट ने एक नाबालिग से बलात्कार के मामले में बुजुर्ग आरोपी की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि समर्पण को यौन संबंध बनाने के लिए सहमति के तौर पर नहीं देखा जा सकता.

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि लैंगिक समानता के लिए प्रतिबद्ध भारत जैसे देश में ऐसे यौन संबंध जिसमें पीड़िता के अधिकारों का उल्लंघन नहीं हो, केवल उसे ही सहमतिपूर्ण यौन संबंध के रूप में स्वीकार किया जा सकता है.

जस्टिस पीबी सुरेश कुमार ने 67 साल के आरोपी शख्स द्वारा निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर 29 जून को यह फैसला सुनाया.

आरोपी को पथनमथिट्टा की सत्र अदालत ने 2009 में अनुसूचित जाति की नाबालिग लड़की से बलात्कार और गर्भधारण का दोषी करार दिया गया था.

दोषी ने अपनी याचिका में कहा कि पीड़िता द्वारा उपलब्ध कराए गए सबूतों से पता चलता है कि यौन संबंध आपसी सहमति से बने थे.

दोषी के वकील ने भी कहा कि पीड़िता ने यह स्वीकार किया है कि वह आरोपी (दोषी) के घर जाती थी और जब भी आरोपी की इच्छा होती थी, वह उसके साथ यौन संबंध बनाता था.

इस याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता ने स्पष्ट सबूत दिए हैं कि जब एक दिन वह टीवी देख रही थी तो आरोपी ने घर का दरवाजा बंद कर दिया और दूसरे कमरे में ले जाकर उसके साथ यौन संबंध बनाए.

अदालत ने कहा कि पीड़िता ने बताया कि उसने शोर मचाने की कोशिश की थी लेकिन आरोपी ने उसके मुंह पर हाथ रखकर उसे रोक लिया था.

अदालत ने कहा कि प्रथमदृष्टया यौन संबंध आपसी सहमति से नहीं बनाया गया. पीड़िता ने साफतौर पर कहा है कि उसने डर की वजह से इस घटना की जानकारी अपनी मां को नहीं दी.

इसी तरह पीड़िता ने इस घटना की जानकारी किसी को नहीं दी क्योंकि उसे डर था कि आरोपी उसकी मां और बहन के साथ कुछ कर देगा.

अदालत ने कहा, ‘दूसरे शब्दों में कहें तो जो साक्ष्य अदालत में पेश किए गए हैं उसके अनुसार, पीड़िता खुद को सामाजिक और मनोवैज्ञानिक खतरे में महसूस कर रही थी. मेरे अनुसार, इस तरह की स्थिति में आरोपी के समक्ष उसकी इच्छा के अनुरूप पीड़िता के समर्पण को सहमतिपूर्ण यौन संबंध नहीं माना जा सकता.’

अदालत ने कहा, ‘सामाजिक सच्चाई यह है कि महिला जिस तरह के यौन संबंध की इच्छा रखती है उसे कभी भी सहमतिपूर्ण नहीं कहा जा सकता क्योंकि जब सेक्शुअल इंटरएक्शन बराबरी का होता है तब सहमति की जरूरत नहीं होती है. जब यह असमान होता है उस स्थिति में सहमति उसे बराबरी का नहीं बना सकती.’

अदालत ने याचिका खारिज करते हुए अमेरिकी मनोचिकित्सक और शोधकर्ता जूडिथ एल. हर्मन द्वारा बलात्कार पीड़िताओं के ट्रॉमा पर लिखी गई उनकी किताब ट्रॉमा एंड रिकवरी के एक अंश का उल्लेख करते हुए कहा, ‘जब कोई महिला पूरी तरह शक्तिहीन होती है और किसी भी तरह के प्रतिरोध का कोई मतलब नहीं रह जाता, तब वह समर्पण की स्थिति तक पहुंचती है. ऐसे समय में आत्मरक्षा का ख्याल पूरी तरह बंद हो चुका होता है. ऐसी में वह निसहाय होकर वास्तिवक दुनिया में अपनी गतिविधियों से नहीं बल्कि अपनी चेतना को बदलकर इस तरह की स्थिति से बचती है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)