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केंद्र सरकार की कोविड-19 नीति में आदिवासियों की स्थिति क्या है?

कोरोना वायरस महामारी के चलते केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई नीतियों का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट रूप से दिखता है कि आदिवासियों और वन निवासियों के अधिकारों और उनकी ज़रूरतों की अनदेखी की गई है.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

भारत सरकार की कोविड – 19 नीति का विश्लेषण करें, तो यह बात साफ है कि सरकार द्वारा आदिवासियों और वन निवासियों के हकों से जुड़े जो फैसले लिए गए है वे इस वर्ग के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ हैं और जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए नहीं लिए गए हैं.

इसके कारण आदिवासी और वन निवासीआत्मनिर्भरहोने के बजाय संकट के दौर से गुजर रहे है.  स्वशासन के लिए कड़ा संघर्ष करने के बाद पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 जिसे आम तौर पर पेसा कहते हैं और वन अधिकार कानून, 2006 में वन संसाधनों का मालिकाना हक आदिवासियों और वन निवासियों को मिला है.

इन दोनों कानूनों में दिए गए अधिकारों को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है. पेसा की धारा 4 () (ii) में ग्राम सभा को लघु वन उपजों का मालिकाना हक प्राप्त है.

वहीं, वन अधिकार कानून, 2006 में आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के खिलाफ हुए ऐतिहासिक अन्याय को मिटाने के लिए जंगल पर उनके अधिकारों को मान्यता दी गई है जिनमें व्यक्तिगत, सामुदायिक और सामुदायिक वन संसाधनों पर अधिकार शामिल है.

इन अधिकारों में लघु वन उपजों का मालिकाना हक भी शामिल है (धारा 3 ()).

तालाबंदी और अधिकारों का हनन

आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं उसमें आदिवासियों और वन निवासियों को लघु वन उपजों इकट्ठा करने की स्वच्छंदता होनी चाहिए.

इसके अलावा, ग्राम सभा का बाजार से (बिना वन विभाग की बैसाखी के) सीधा जुड़ाव होना भी बेहद जरूरी है ताकि महामारी के इस दौर में इन समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो सके.

इसलिए भारत सरकार के लघु वन उपज से जुड़ी कोविड नीति का विश्लेषण करना बेहद जरूरी है.

भारत में कोविड नीति की शुरुआत मार्च, 2020 में देश भर में तालाबंदी से हुई. बताया जाता है कि तालाबंदी का मकसद वायरस को फैलने से रोकना था.

तालाबंदी के दौरान 15 अप्रैल, 2020 को गृह मंत्रालय द्वारा निकाले गए आदेश में कुछ गतिविधियों को तालाबंदी से आजाद रखा गया जैसे खेतीबाड़ी से जुड़े काम, स्वास्थ्य सेवाएं, खनिजों का दोहन, वृक्षारोपण आदि.

लघु वन उपजों को इस श्रेणी में 16 अप्रैल, 2020 को जोड़ा गया. गौर करने वाली बात यह है कि लघु वन उपजों का सबसे ज्यादा संकलन मार्च से मई के बीच होता है, इनमें से महुआ, तेंदू पत्ता, बांस, चिरौंजी आदि बहुत महत्वपूर्ण है.

चूंकि लघु वन उपज को इकट्ठा करने की इजाज़त मार्च में नहीं दी गई, इस कारण आदिवासी उस दौरान वन उपज इकट्ठा ही नहीं कर पाए.  

मध्य प्रदेश के शहदोल और ढ़िड़ोरी जिले में रहने वाले बैगा समुदाय तथा उड़ीसा के रायगढ़ा कालाहांडी जिले स्थित नियामगिरी पर्वत श्रृंखला में रहने वाले डोंगरिया कोंध तालाबंदी के कारण लघु वन उपज इकट्ठा नहीं कर पाए और अगर कर भी पाए तो उसे बाजार तक नहीं पहुंचा सके.

चूंकि वे पहाड़ी इलाकों में खेती करते है जहां सिंचाई की कोई सुविधा नहीं है इसलिए खेती की उपज कुछ महीनों के लिए ही भोजन की जरूरत पूरी कर पाती है.

लगभग 72 बैगा परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं होने के कारण उनको सरकारी अनाज भी नहीं मिला है. ऐसे में भुखमरी के हालात पैदा हो सकते है.

झारखंड में भी कई इलाकों में ऐसा ही हाल है. लोग औनेपौने भाव पर स्थानीय व्यापारियों को अपनी उपज बेचने को मजबूर हैं.

वहीं, स्थानीय कार्यकर्ताओं से यह जानकारी मिली है कि छत्तीसगढ़ राज्य के बलौदा बाजार जिले में कसडोल ब्लाक स्थित अर्जनी और कुकरीकोना गांवों में छत्तीसगढ़ सरकार के लघु वन उपज को इकट्ठा करने के आदेश के बावजूद वन विभाग ने वनों के आसपास पक्की दीवार बना दी है और बड़े गड्ढे खोद दिए, जिसके कारण लोग वनों से उपज इकट्ठा करने नहीं जा पा रहे है.

और, छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार जिले के महाराजी गांव में महिलाओं के दो स्वयं सहायता समूहों ने वन विभाग के अधिकारियों के कहने पर अपनी जेब से 50-50 हजार रूपये लगा कर 15-15 टन चिरौंजी के बीज गांव वालों से खरीदे.

उनके समूहों के बैंक खातों में 2 लाख रूपये की राशि केंद्र सरकार द्वारा वन धन योजना के तहत दी जानी थी जो अभी तक नहीं पहुंची है.

अतः स्थानीय समुदायों को परेशानियों का सामना सिर्फ इसलिए करना पड़ रहा है क्योंकि कोविड नीति उनकी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नहीं बनाई गई. 

न्यूनतम समर्थन मूल्य नदारद

न्यूनतम समर्थन मूल्य का लागू  होना भी एक बड़ी समस्या रही. अनुसूचित जनजाति मंत्रालय (MoTA -मोटा) ने 1 मई को 44 लघु वन उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य संशोधित कर कई वन उपजों के मूल्य बढ़ाए.

बाद में 23 और लघु वन उपजों के मूल्य बढ़ाए गए. पर इसमें कुछ महत्वपूर्ण वन उपजों के समर्थन मूल्य  के बराबर या नहीं बढ़ाए गए जैसे- सबसे ज्यादा बिकने वाले महुआ का फल और तेंदू पत्ता.

महामारी के वक्त इनका सही मूल्य लगाना बेहद जरूरी है ताकि वन समुदायों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ की जा सके, लेकिन, कई जगहों पर लोगों तक अभी भी न्यूनतम समर्थन मूल्य के बढ़ने की जानकारी नहीं पहुंची है.

और अगर है भी तो समुदायों के पास भंडारण की सुविधा और बाजार तक जुड़ाव नहीं होने के कारण वे घाटे का सौदा कर अपनी उपज को कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं ताकि उन्हे कुछ पैसे मिलें और वे अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा कर सकें. 

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

वन धन केंद्र का सुनहरा सरकारी सपना 

वन धन केंद्रों के संबंध में मोटा ने 9 जून, 2020 की प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि 17 राज्यों के वन धन केंद्रों में 50 करोड़ का लघु वन उपज खरीदा गया.

इसके अलावा, पूरे देश में 21 राज्यों में 1,126 वन धन केंद्र बनाए गए हैं और 3.6 लाख आदिवासी उसके लाभार्थी हैं. 22 राज्यों में वन धन केंद्र सुचारु रूप से चल रहे हैं.

पर अगर इस डेटा का विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट नहीं है कि कौन से राज्यों में कितने वन धन केंद्र कब बनाए गए, कितने चालू हैं और उनके संचालन में ग्राम सभा और समुदाय की क्या भूमिका रही है.

मीडिया और स्थानीय समुदायों के अनुसार ज्यादातर लोगों को वन धन केंद्रों के संचालित होने की कोई जानकारी नहीं है. इससे जमीनी स्तर पर वन धन केंद्रों के क्रियान्वयन को लेकर सवाल खड़ा होता है. 

वन धन योजना की वैधता को लेकर भी बड़ा सवाल खड़ा होता है. इस योजना के तहत वन धन केंद्र आजीविका एसएचजी (SHG), जॉइंट मैनेजमेंट कमेटी (जेएफएम) और बड़े काॅपरेटिव समूहों से मिलाकर स्थापित किए जाएंगे.

इस पूरी प्रक्रिया में वन विभाग को भी शामिल किया गया है. जेएफएम वन विभाग द्वारा बनाई जाने वाली कमेटी होती है, जिस पर समुदाय और ग्राम सभा का नहीं बल्कि वन विभाग का नियंत्रण होता है.

इस योजना का विश्लेषण करें तो लघु वन उपज के भंडारण, खरीदबिक्री और दाम तय करने की प्रक्रिया में कहीं भी ग्राम सभा या वन प्रबंधन समिति का जिक्र नहीं किया गया है.

जिन ढांचों को प्रक्रिया में शामिल किया गया है उनको पेसा या वन अधिकार कानून में लघु वन उपज का मालिकाना हक और खरीदबिक्री के संबंध में निर्णय लेने का हक नहीं दिया गया है.

वहीं, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में वन विभाग को वन धन योजना का नोडल एजेंसी बनाया गया है, जबकि अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग को बनाया जाना चाहिए था.

इसलिए कहा जा रहा है कि यह योजना संवैधानिक अधिकारों को ताक पर रखकर बनाई गई है. इस नीति के और भी दूरगामी बुरे परिणाम निकलेंगे.

एक तो यह योजना आदिवासियों और वन निवासियों को केवल मजदूर की तरह देखती है, उनको खरीदबिक्री की प्रक्रियाओं में निर्णय लेने से वंचित करती है.

दूसरा, यह योजना ग्राम सभा के सामूहिक वन संसाधन के संरक्षण और उसके इस्तेमाल की शक्तियां पर चोट करती है. 

काम्पा: आदिवासियों और वन निवासियों की आजीविका पर खतरा 

इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि जो सरकार लघु वन उपजों को समर्थित मूल्यों पर खरीदने में सक्षम नहीं है, वह काम्पा (CAMPA) के अंतर्गत 6,000 करोड़ का बजट वृक्षारोपण के लिए आवंटित कर रही है ताकि आदिवासियों के लिए रोजगार पैदा हो.

लेकिन, काम्पा का पैसा आदिवासियों की हड़पी हुई जमीन पर खनिजों के दोहन से आता है. कई राज्यों (उड़ीसा, मध्य प्रदेश, झारखंड, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) में वन विभाग द्वारा असंवैधानिक तरीके से ग्राम सभा की सहमति के बिना सामुदायिक और दावा की गई भूमि पर जबरन वृक्षारोपण किया जाता रहा है.

काम्पा से रोजगार पैदा नहीं होंगे बल्कि जीविका के स्रोत बर्बाद होंगे. अतः इस पैसे का इस्तेमाल वृक्षारोपण के लिए  कर, ग्राम सभाओं को गांव में विकास कार्य के लिए आवंटित कर देना चाहिए. 

संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी का महिलाओं पर प्रभाव

ग्राम सभा के लघु वन उपजों पर मालिकाना हक की शक्तियों को नकारना और वन विभाग जैसे ढांचे (जो अन्याय का स्रोत रहे हैं) उनके हाथों में उसके संग्रह और बिक्री की जिम्मेदारियां सौंपना संवैधानिक अधिकारों का घोर उल्लंघन है.

व्यवस्था के इस दोहरेपन के कारण जो समस्याएं पैदा होती है उसका खामियाजा महिलाओं को खास तौर पर भुगतना पड़ता है.

आदिवासी महिलाओं के समय का लगभग तीन चौथाई हिस्सा वन उपजों को इकट्ठा करने, उसे उपयोग लायक बनाने, उसका सुरक्षित भंडारण करने और सामग्री बनाने में जाता है.

ऐसे में जब संवैधानिक ढांचों को नजरअंदाज कर वन उपजों को बाजार तक पहुंचाया जाता है तो इसका सीधा प्रभाव महिलाओं के ऊपर पड़ता है.

श्रम और उपज का मूल्य खुद तय करने की स्वायत्तता खत्म हो जाती है और यह उन्हें और उनके परिवार को आर्थिक तंगी, भूख और कुपोषण की तरफ धकेलता है.

क्या हो सकते हैं आदिवासी महिलाओं की अगुआई में वैकल्पिक तरीके   

निराश करने वाली सरकारी नीतियों के बावजूद आदिवासी इलाकों से ही कई प्रेरणादायक उदाहरण निकलकर आते रहे हैं.

इस संकट के समय में भी समुदाय अपनी भोजनपोषण की जरूरतों की पूर्ति आसानी से कर सकता है अगर ग्राम सभा और महिलाओं की अगुवाई में सामुदायिक वन संसाधनों का प्रबंधन किया जाए.

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली और मेलघाट टाईगर रिजर्व स्थित राहू गांव में महिलाओं की अगुआई में ग्राम सभाओं द्वारा वनों का योजनाबद्ध तरीके से संरक्षण, बिना वन विभाग के संलिप्तता के खुद ही ट्रांजिट परमिट बनवाकर लघु वन उपजों को बाजार तक ले जाना और बेचना, उपज और श्रम का उचित मूल्य बिठाना, लघु वन उपजों से होने वाले मुनाफे को गांव के विकास में लगाना और लोगों में बांटना उनकी अहम उप्लब्धियां रही हैं.

इन कहानियों से यही समझ आता है कि जहां भी ग्राम सभाओं और महिलाओं की अगुआई में सामुदायिक वन संसाधन के प्रबंधन के संवैधानिक अधिकार का प्रयोग किया गया है, वहां वन क्षेत्रों में आदिवासियों और वन निवासियों की स्थिति मजबूत हुई है.

इसलिए सरकार द्वारा सामूहिक वन अधिकारों को बड़े पैमाने पर मान्यता देने की जरूरत है. अभी तक देश में केवल 3 प्रतिशत की दर से सामूहिक वन अधिकार को मान्यता दी गई है.

इस वक्त आदिवासी इलाकों में पलायन करने वाले मजदूर लाखों की संख्या में वापस लौट रहे हैं. उनकी बुनियादी जरूरतों को तभी पूरा किया जा सकता है जब समुदायों लोगों को सामुदायिक और व्यक्तिगत वन अधिकार दिए जाएंगे. अतः अगर सरकार द्वारा बड़े स्तर पर अधिकारों को मान्यता देना बेहद जरूरी है. 

(पूजा वकील हैं और एनएलयू, दिल्ली में गेस्ट लेक्चरर के बतौर पढ़ाती हैं. संघमित्रा दुबे स्वतंत्र शोधकर्ता हैं, जो लंबे समय से वन अधिकार कानून पर काम कर रही हैं.)