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ऐश डैम में दरार के मामले में एनजीटी ने एनटीपीसी विंध्याचल पर लगाया 10 करोड़ रुपये का जुर्माना

अक्टूबर 2019 में एनटीपीसी विंध्याचल का ऐश डैम टूटने के बाद क़रीब 35 लाख मीट्रिक टन से ज़्यादा राख  रिहंद जलाशय में गिरी थी. यह जलाशय सिंगरौली और सोनभद्र ज़िलों के पीने योग्य पानी का एकमात्र स्रोत है. एनजीटी में दायर याचिका में एनटीपीसी पर लापरवाही का आरोप लगाया गया था.

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सिंगरौली में एनटीपीसी विंध्याचल सुपर थर्मल पावर स्टेशन को उसके फ्लाई ऐश डाइक (ऐश डैम/ राख के लिए बनाया गया बांध) में दरार से गोविंद वल्लभ पंत सागर ‘रिहंद जलाशय’ में राख गिरने से हुए नुकसान पर अंतरिम मुआवजे के तौर पर 10 करोड़ रुपये देने के निर्देश दिए हैं.

एनजीटी ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि फ्लाई ऐश (थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली राख) का निस्तारण पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के तहत वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सांविधिक तौर पर अधिसूचित तरीके से हो, जिसमें 100 प्रतिशत उपयोग की आवश्यकता है.

अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे की याचिका पर अधिकरण ने यह निर्देश दिए.

दुबे ने याचिका में 6 अक्टूबर, 2019 को हुई उस घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि एनटीपीसी विद्युत परियोजना के लापरवाही भरे कृत्य के कारण राख के बांध में दरार आई, जिससे 35 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा फ्लाई ऐश गोविंद वल्लभ पंत सागर रिहंद जलाशय में गिरी.

एनजीटी के अध्यक्ष जस्टिस आदर्श कुमार गोयल ने कहा कि खदानों में राख का निस्तारण और परित्यक्त खानों में राख को पुन: भरने का काम सीपीसीबी के दिशानिर्देश के मुताबिक किया जा सकता है या धनबाद स्थित भारतीय खान ब्यूरो से भी इस विषय पर परामर्श लिया जा सकता है.

अधिकरण ने एक समिति द्वारा दायर रिपोर्ट को बरकरार रखा और संयंत्र के उस दावे को खारिज कर दिया कि समिति की रिपोर्ट त्रुटिपूर्ण और निराधार है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, संयंत्र ने कहा था कि दरार को 30 घंटों के भीतर ठीक कर दिया गया था इसलिए 10 करोड़ रुपये का मुआवजा उचित नहीं है.

अधिकरण ने कहा, ‘एनटीपीसी, विंध्याचल समिति की अनुशंसा के मुताबिक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास अंतरिम मुआवजे के तौर पर 10 करोड़ रुपया जमा करा सकता है, जिसमें से पहले जमा राशि वह काट ले. संयंत्र के चारों तरफ आरसीसी की एक दीवार भी बनाई जा सकती है.’

इसके अलावा एनजीटी ने अनपरा थर्मल पावर प्लांट और लैंको-अनपरा पावर प्लांटों को भी निर्देश दिया कि वे रिहंद जलाशय में फ्लाई ऐश डाइक के ओवरफ्लो को रोकें.

इससे पहले एनजीटी ने मध्य प्रदेश के सिंगरौली और उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में थर्मल पावर प्लांटों को रिहंद जलाशय और अन्य जल स्रोतों को डंपिंग फ्लाई ऐश डाइक, जहरीले अवशेषों और औद्योगिक कचरे से बचाने के निर्देश दिए थे.

रिहंद जलाशय सिंगरौली और सोनभद्र जिलों के लोगों के लिए पीने योग्य पानी का एकमात्र स्रोत है. फ्लाई ऐश डाइक में दरार से जलाशय का पानी दूषित हो गया था और पीने लायक नहीं रहा.

इसके अलावा फ्लाई ऐश की वजह से कृषि भूमि नष्ट हो गया था, कई मवेशी भी लापता हो गए.

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी अपनी याचिका में कहा है कि प्रारांभिक जांच से पता चलता है कि पर्यावरण को भारी नुकसान हुआ है. साथ ही 35 लाख मीट्रिक टन फ्लाई ऐश रिहंद जलाशय में जमा हो गया है.

याचिका में कहा है कि सिंगरौली क्षेत्र की हवा, पानी और मिट्टी में पारा की मात्रा निर्धारित सीमा से कहीं अधिक है.

याचिका में कहा गया है कि प्रदूषण का प्रतिकूल प्रभाव वहां रहने वाले लोगों के रक्त, बाल, नाखून, पैर, हाथ और शरीर में दिखाई देता है.

बिजली सयंत्रों पर आरोप लगाया है कि न्यायाधिकरण के निर्देशों के बावजूद बिजली संयंत्रों ने कोई निवारक उपाय नहीं किए गए हैं, जो पर्यावरण, स्थानीय लोगों, मवेशियों, खेतों, मौजूदा फसलों और पानी को गंभीर नुकसान पहुंचा रही है.

याचिका में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारों से सिंगरौली और सोनभद्र जिलों के निवासियों की सुरक्षा के लिए आवश्यक और तत्काल कदम उठाने और फ्लाई ऐश, बॉटम ऐश, टॉक्सिक के निर्वहन से प्रभावित स्थानीय लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए भी निर्देश देने की मांग की गई थी.

बीते अप्रैल में सिंगरौली में रिलायंस पावर प्लांट का ऐश डैम टूटने से दो लोगों की मौत हो गई है जबकि चार अन्य लापता हो गए थे. बीते एक साल में हुआ यह इस तरह का तीसरा हादसा था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)