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इंटरनेट सेवाओं पर बदला जम्मू कश्मीर प्रशासन का रुख, कहा- 4जी बहाल करने में समस्या नहीं

जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल जीसी मुर्मू ने कहा, ‘4जी समस्या नहीं बनेगा. मैं इस बात से भयभीत नहीं हैं कि लोग इसका कैसे इस्तेमाल करेंगे. पाकिस्तान अपना प्रोपगेंडा करेगा चाहे 2जी हो या 4जी.’

(फोटो: पीटीआई)

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श्रीनगर: केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से कहा है कि 4जी इंटरनेट सेवाओं को बहार किए जाने से उसे कोई आपत्तिि नहीं है और तेज रफ्तार की इंटरनेट कनेक्टिविटी कोई समस्या नहीं पैदा करेगी.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, शुक्रवार को उपराज्यपाल जीसी मुर्मू ने कहा, ‘हम इसके लिए प्रतिनिधित्व तैयार कर रहे हैं… मुझे ऐसा लगता है कि 4जी समस्या नहीं बनेगा. मैं इस बात से भयभीत नहीं हूं कि लोग इसका कैसे इस्तेमाल करेंगे. पाकिस्तान अपना प्रोपगेंडा करेगा चाहे 2जी हो या 4जी. यह हमेशा होगा लेकिन मुझे नहीं लगता है कि यह कोई मुद्दा है.’

जम्मू कश्मीर प्रशासन का यह रुख दो महीने पहले मई में व्यक्त किए गए उसके रुख से उलट है.

बीते गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा था कि 4जी सेवाओं को बहाल करने के लिए उसने एक विशेष समिति का गठन किया है जिसने अब तक दो बार 15 मई और 10 जून को बैठक की है और इस नतीजे पर पहुंची है कि फिलहाल 4जी सेवाओं सहित इंटरनेट सेवाओं पर लगे प्रतिबंध पर कोई राहत नहीं दी जाएगी.

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट जम्मू कश्मीर में 4जी इंटरनेट बैन पर विशेष कमेटी नहीं बनाने के आरोप में केंद्र के खिलाफ दायर की गई अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रहा था और उसने कहा था कि सरकार एक हफ्ते के भीतर इस पर जवाब दायर करे.

मालूम हो कि 11 मई को सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर में 4जी इंटरनेट पर लगाए गए प्रतिबंधों को खारिज करने से मना कर दिया था.

इसकी जगह पर कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि वे एक विशेष समिति बनाएं जो याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाई गई मांग पर विचार करेगा.

कोर्ट के इस कदम को लोगों के मौलिक अधिकारों के हनन के रूप में देखा गया था, जहां कोर्ट ने केंद्र के फैसलों के खिलाफ दायर की गई याचिका का समाधान करने के लिये केंद्र को ही समिति बनाने के लिए कहा है.

इस विशेष समिति में केंद्रीय गृह सचिव, दूरसंचार विभाग के सचिव और जम्मू कश्मीर के मुख्य सचिव सदस्य हैं.

11 मई को जम्मू कश्मीर प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स की याचिका को खारिज करने की मांग की थी.

जम्मू कश्मीर प्रशासन ने तर्क दिया था कि तेज रफ्तार इंटरनेट से फेक न्यूज और अफवाहें फैलेंगी और इससे बड़ी ऑडियो और वीडियो फाइलों का ट्रांसफर आसान हो जाएगा. आतंकी इसका इस्तेमाल उकसाने और हमले की योजना बनाने के लिए कर सकते हैं.

वहीं जम्मू कश्मीर सूचना विभाग की ‘मीडिया नीति- 2020’ से जुड़े एक अन्य सवाल के जवाब में उपराज्यपाल मुर्मू ने कहा, ‘मैं इसे देखूंगा, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है. इसके लिए प्रांसगिक आईपीसी, सीआरपीसी और अन्य कानून हैं.’

बता दें कि केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन ने इस महीने की शुरुआत में ‘मीडिया नीति- 2020’ को मंजूरी दी थी.

इस नीति के तहत जम्मू कश्मीर सरकार ने अधिकारियों को अधिकृत किया है कि वे प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और अन्य मीडिया में ‘फर्जी सूचना’ की विषय वस्तु पर निर्णय करेंगे और पत्रकारों तथा मीडिया संगठनों के खिलाफ आगे की कार्रवाई करेंगे.

नई नीति के अनुसार, ‘सरकार समाचार पत्रों और अन्य मीडिया चैनलों में प्रकाशित सामग्री की निगरानी करेगी और यह तय करेगी कि कौन-सी खबर ‘फेक, एंटी सोशल  या एंटी-नेशनल रिपोर्टिंग’ है. ऐसे कामों में  शामिल पाए जाने पर समाचार संगठनों को सरकारी विज्ञापन नहीं दिए जाएंगे, साथ ही उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी.’

इस नीति पर भारतीय प्रेस परिषद वहां के प्रशासन से जवाब मांगा था और कहा कि इसके प्रावधान प्रेस के स्वतंत्र कार्यों को प्रभावित करने वाले हैं.

मुर्मू ने कहा कि प्राथमिक तौर पर इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया को जगह देने के लिए नीति की समीक्षा की गई थी.

उन्होंने कहा, ‘विज्ञापन केवल प्रिंट और स्थानीय मीडिया को दिए जाते थे. लोग इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के लिए कुछ नहीं कर रहे थे.’

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नीति में अन्य चीजें सामान्य थीं. उन्होंने कहा, ‘अगर आप भारत सरकार और अन्य राज्यों को देखेंगे तो मान्यता नीति सर्कुलेशन, रीडरशिप व अन्य चीजों पर निर्भर करती है. इस नीति में भी उन्हीं को अपनाया गया है…कुछ भी भेदभावपूर्ण नहीं है.’

उपराज्यपाल ने कहा कि सूचना विभाग में यह तय करने की क्षमता नहीं थी कि कोई खबर राष्ट्रविरोधी है.

उन्होंने कहा, ‘वास्तव में इसकी जांच केवल एजेंसियां कर सकती हैं. हम इसे भी हटा सकते हैं (संशोधित मीडिया नीति से). वे (सूचना विभाग) केवल मान्यता देने को लेकर जांच कर सकते हैं लेकिन तथ्यों की नहीं. यदि ऐसी कोई परिस्थिति बनती है तो वे एजेंसियों से इसकी जांच करा सकते हैं. यह केवल कानून तय कर सकता है कि देशविरोधी क्या है… सुप्रीम कोर्ट ने इस पर समय-समय पर फैसले दिए हैं.’

मुर्मू ने कहा, ‘मैं पहले ही सूचना विभाग को इन सभी चीजों की दोबारा जांच के लिए कह दिया है.’