भारत

प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ अवमानना की कार्यवाही आलोचना का गला दबाने की कोशिश: नागरिक कार्यकर्ता

पूर्व जजों, नौकरशाहों, राजनयिकों, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि प्रशांत भूषण लगातार समाज के कमज़ोर वर्गो के अधिकारों के लिए संघर्ष करते आ रहे हैं. उन्होंने अपना जीवन उन सभी को क़ानूनी मदद उपलब्ध कराने में लगा दिया, जो सहजता से न्याय पाने में सक्षम नहीं थे.

प्रशांत भूषण. (फाइल फोटो: पीटीआई)

प्रशांत भूषण. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन लोकुर और लेखक अरुंधति राय सहित 130 से ज्यादा प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उच्चतम न्यायालय से जाने-माने वकील प्रशांत भूषण के खिलाफ शुरू की गई अदालत की अवमानना की कार्यवाही पर फिर से विचार करने का अनुरोध किया है.

शीर्ष अदालत ने प्रशांत भूषण के दो ट्वीट्स पर स्वत: संज्ञान लिया है और उनके खिलाफ अवमानना कार्रवाई शुरू करते हुए नोटिस जारी किया है.

कोर्ट ने कहा कि उनके बयानों से प्रथमदृष्टया ‘न्याय के प्रशासन की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है.’ न्यायालय ने इस मामले में अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल से सहयोग करने का भी अनुरोध किया था.

जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने प्रशांत भूषण को नोटिस जारी करते हुए उनसे इस संबंध में विस्तृत जवाब देने को कहा है. मामले की अगली सुनवाई पांच अगस्त को होगी.

सुप्रीम कोर्ट ने भूषण के खिलाफ साल 2009 से लंबित पड़े एक अन्य अवमानना मामले की भी कार्यवाही शुरू कर दी है.

प्रशांत भूषण न्यायपालिका से जुड़े मसले लगातार उठाते रहे हैं और हाल ही में उन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान दूसरे राज्यों से पलायन कर रहे कामगारों के मामले में शीर्ष अदालत के रवैये की तीखी आलोचना की थी.

भूषण के साथ एकजुटता प्रदर्शित करते हुए कुछ पूर्व न्यायाधीशों, पूर्व नौकरशाहों, पूर्व राजनयिकों के साथ ही चुनिन्दा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने बयान जारी किया है जिसमें कहा गया है कि भूषण के खिलाफ शुरू की गई अवमानना की कार्यवाही इस तरह की आलोचना का गला दबाने का प्रयास लगता है.

बयान में कहा गया है कि न्याय और निष्पक्षता के हित तथा शीर्ष अदालत की गरिमा बनाए रखने के लिए हम न्यायालय से अनुरोध करते हैं कि वह प्रशांत भूषण के खिलफ स्वत: ही अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के फैसले पर फिर से विचार करे.

इस बयान पर जस्टिस लोकुर और राय के साथ ही पूर्व नौसेना अध्यक्ष एडमिरल रामदास, कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी. राजा, सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और पत्रकार पी. साईनाथ ने भी हस्ताक्षर किए हैं.

बयान में कहा गया है कि प्रशांत भूषण लगातार समाज के कमजोर वर्गो के अधिकारों के लिए संघर्ष करते आ रहे हैं और उन्होंने अपना जीवन उन लोगों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने में लगा दिया जो सहजता से न्याय प्राप्त करने में सक्षम नहीं थे.

बयान में कहा गया, ‘पिछले कुछ वर्षों में लोगों के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन और सरकारी ज्यादतियों पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने में खास रुचि नहीं दिखाई है, जिस पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं. ये सवाल समाज के सभी वर्गों- मीडिया, शिक्षाविदों, नागरिक समाज संगठनों, कानूनी बिरादरी के सदस्यों और यहां तक कि स्वयं सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों द्वारा उठाए गए हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हाल ही में लॉकडाउन के दौरान प्रवासी संकट को रोकने के लिए समय पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा हस्तक्षेप नहीं किए जाने के कारण इसकी काफी आलोचना हुई. कोरोना महामारी के पांच महीने बीतने के बावजूद अभी कोर्ट की सामान्य सुनवाई नहीं शुरु हो पाई है दिसे लेकर काफी चिंता है.’

नागरिक समाज के लोगों द्वारा जारी बयान में कहा गया कि हम चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट भूषण के खिलाफ अवमानना कार्रवाई करने के बजाय इन मामलों पर ध्यान दे और जनहित के मुद्दों को सुनें.

कार्यकर्ताओं ने कहा, ‘सर्वोच्च न्यायालय जैसा देश का महत्वपूर्ण संस्थान प्रतिशोध या आपराधिक अवमानना की कार्रवाई के डर के बिना सार्वजनिक चर्चा के लिए खुला होना चाहिए.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)