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विकास दुबे एनकाउंटर: क्या जांच समिति सदस्यों के पारिवारिक संबंधों के चलते निष्पक्ष जांच होगी?

विकास दुबे एनकाउंटर में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जांच समिति के अध्यक्ष जस्टिस बीएस चौहान के भाई भाजपा विधायक हैं और समधी भाजपा सांसद. वहीं समिति के अन्य सदस्य पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता कानपुर ज़ोन के आईजी के संबंधी हैं. ऐसी स्थिति में हितों के टकराव की संभावना के कयास लगाए जा रहे हैं.

विकास दुबे के कथित एनकाउंटर की जगह और पुलिस काफिले की दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी. (फोटो: पीटीआई)

विकास दुबे के कथित एनकाउंटर की जगह और पुलिस काफिले की दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: गैंगस्टर विकास दुबे के एनकाउंटर के संबंध में जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति के दो सदस्यों के पारिवारिक रिश्तों के कारण हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न होने और निष्पक्ष जांच न होने की संभावनाओं को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं.

समिति में शामिल सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस बीएस चौहान और उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक केएल गुप्ता के परिवार के सदस्यों के संबंध राज्य की सत्ता में काबिज भाजपा नेताओं और कानपुर पुलिस के अधिकारी के साथ जुड़े हुए हैं.

विकास दुबे के एनकाउंटर को लेकर गुप्ता के बयानों को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर मांग की गई थी केएल गुप्ता को समिति से हटाया जाए क्योंकि उन्होंने मुठभेड़ को लेकर कथित रूप से पुलिस की दलीलों का समर्थन किया था.

हालांकि कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और याचिका खारिज कर दी. अब गुप्ता और एक अन्य सदस्य जस्टिस चौहान से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं जो कि मामले में निष्पक्ष जांच होने की संभावनाओं पर सवाल खड़े करते हैं.

केएल गुप्ता कानपुर जोन के इंस्पेक्टर जनरल (आईजी) मोहित अग्रवाल के संबंधी हैं, जिनकी भूमिका विकास दुबे एनकाउंटर मामले में जांच के दौरान जरूर सवालों के घेरे में आएगी.

कानपुर के ही पुलिकर्मियों पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी तरीके से विकास दुबे का एनकाउंटर किया है.

जस्टिस चौहान के भाई और समधी भाजपा के नेता

इसके अलावा समिति के अध्यक्ष जस्टिस बीएस चौहान के कम से कम दो संबंधी राज्य में भाजापा से जुड़े विधायक हैं, जिसकी इस समय राज्य में सरकार है.

खास बात ये है कि जस्टिस चौहान और केएल गुप्ता के नामों की सिफारिश उत्तर प्रदेश सरकार ने ही की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने हुबहू स्वीकार कर लिया था.

जस्टिस चौहान के छोटे भाई वीरेंद्र सिंह मौजूदा समय में भाजपा से उत्तर प्रदेश विधान परिषद सदस्य हैं. सिंह ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत समाजवादी पार्टी से की थी और मुलायम सिंह तथा अखिलेश यादव दोनों के मुख्यमंत्री रहते विधायक बने थे.

हालांकि सिंह और उनके बेटे ने पिछले साल भाजपा का दामन थाम लिया. जस्टिस चौहान के भाई अब राज्य विधानमंडल के ऊपरी सदन में ट्रेजरी बेंच में हैं और योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल के अगले विस्तार की दौड़ में काफी आगे हैं.

इसके अलावा जस्टिस चौहान की बेटी राजस्थान के भाजपा सांसद सुखबीर जौनपुरिया के बेटे की पत्नी हैं. इस तरह जस्टिस चौहान एक भाजपा सांसद के समधी भी हैं.

जब द वायर  ने जस्टिस चौहान से पूछा कि उन्होंने अपने इन पारिवारिक रिश्तों की जानकारी सुप्रीम कोर्ट को दी थी, इस पर उन्होंने कहा, ‘अगर कोई सुप्रीम कोर्ट के सामने ये मामला उठाना चाहता है तो उसे पूरी आजादी है. इस पर सर्वोच्च न्यायालय जो फैसला लेगी वो मान्य होगा.’

खास बात ये है कि जस्टिस चौहान ने कहा कि उनके भाई ने भाजपा जॉइन नहीं की है. उन्होंने कहा, ‘मेरे भाई भाजपा से एमएलसी नहीं है, बल्कि वे समाजवादी पार्टी के साथ हैं.’

इसके बाद द वायर ने उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय से संपर्क किया जहां ये बताया गया कि वीरेंद्र  सिंह ने पिछले साल 31 मार्च 2019 को भाजपा में शामिल हुए थे.

भाजपा सांसद जौनपुरिया से संबंध के बारे में उन्होंने कहा, ‘मैं सुप्रीम कोर्ट जज था और सभी को पता है कि मेरी बेटी की शादी राजस्थान से भाजपा सांसद के बेटे के साथ हुई है. इसके बारे में मैं सुप्रीम कोर्ट को क्यों बताऊं?’

पूर्व डीजीपी ने किया हितों के टकराव से इनकार

वहीं जब पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता से कानपुर जोन आईजी मोहित अग्रवाल से रिश्ते के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘मोहित मेरी पत्नी की बहन का दामाद है. लेकिन इससे क्या ताल्लुक है? मुझे नहीं लगता की एक आईजी का किसी एनकाउंटर में सीधी भूमिका होती है. उसका काम केवल सुपरवाइज करना होता है इसलिए इसे हितों के टकराव का मामला बनाकर नहीं देखा जाना चाहिए. लेकिन यदि लोगों को ऐसी कोई आपत्ति है तो मैं आयोग से हट जाऊंगा.’

गुप्ता ने बताया कि उन्होंने किसी से कहा नहीं था कि उन्हें आयोग में शामिल होना है. उन्होंने कहा, ‘मुझे गृह विभाग से फोन आया और कहा गया कि मुख्यमंत्री चाहते हैं कि मैं आयोग में शामिल होऊं. मैंने अपना पूरा जीवन जी लिया है और इससे मेरी प्रतिष्ठा में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी कि मैं न्यायिक जांच समिति में हूं.’

ये पूछे जाने पर कि क्या वे पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए बिना और निष्पक्ष होकर जांच करेंगे क्योंकि उन्होंने एनकाउंटर को लेकर पुलिस का समर्थन किया था, गुप्ता ने कहा, ‘मैंने बस इतना कहा था कि आपको पुलिस के पक्ष को सिरे से खारिज नहीं करना चाहिए.’

उन्होंने आगे कहा, ‘और मैंने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस की दलीलों की मजिस्ट्रियल जांच होगी, इसलिए मीडिया को तुरंत निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए और पुलिस द्वारा कहे गए हर शब्द को खारिज नहीं करना चाहिए. आखिरकार, आप और मैं मुठभेड़ के समय मौजूद नहीं थे, इसलिए आपको पुलिस की बातों पर थोड़ा भरोसा करना पड़ेगा. मुझ पर अनावश्यक रूप से पूर्वाग्रही होने का आरोप लगाया जा रहा है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘मैंने उस स्टेशन ऑफिसर की भी निंदा की थी जिसने छापे के बारे में विकास दुबे को खबर दी थी. ऐसे लोगों को गोली मार दी जानी चाहिए.’

गौरतलब है कि केएल गुप्ता ने ‘गोली मारने’ की बात ऐसे समय पर भी कही है जब वे न्यायिक समिति में शामिल हैं और इस जांच की जिम्मेदारी दी गई है कि गैंगस्टर विकास दुबे का एनकाउंटर सही था या फर्जी.

गुप्ता अपने डीजीपी कार्यकाल के दौरान भी सवालों के घेरे में आए थे. 17 अगस्त 1998 की इंडिया टुडे मैगजीन की एक रिपोर्ट बताती है कि कि उस समय उत्तर प्रदेश के डीजीपी पद पर रहते हुए ने कहा था कि एनकाउंटर में सिर्फ खूंखार अपराधी ही मारे जाते हैं.

उन्होंने कहा था कि यदि किसी निर्दोष की इसमें मौत हुई होती तो न्यायपालिक इसकी जांच करती. गुप्ता ने कहा था कि करीब 200 एनकाउंटर में खूंखार अपराधी जैसे कि अरविंद पांडे, सूरजपाल यादव, जरनैल सिंह की तरह के लोग मारे गए थे.

हालांकि गुप्ता ने इन एनकाउंटर पर सवाल उठने की बातों को खारिज करते हुए कहा, ‘इन एनकाउंटर को लेकर मेरी चौतरफा सराहना हुई थी. तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने मेरी सराहना की थी. आप पुरानी खबरें उठाकर देख लीजिए, कोई विवाद नहीं था.’

हाईकोर्ट जज रहते हुए जस्टिस चौहान पर लगे थे हितों के टकराव के आरोप

यह पहला मौका नहीं है जब जस्टिस चौहान पर हितों के टकराव को लेकर सवाल खड़े हुए हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज बनाए जाने से पहले चौहान नोएडा प्रशासन के वकील थे. हालांकि जज रहते हुए उन्होंने नोएडा से जुड़े मामलों पर भी सुनवाई की.

जमीन विवाद से जुड़े एक मामले को लेकर उन्होंने सीबीआई जांच तक के आदेश दिए थे. साल 2005 में मुलायम सिंह सरकार ने कुछ विशेष प्लॉट का आवंटन किया था.

आरोप था कि चौहान के भाई वीरेंद्र सिंह ने इन प्लॉट्स के लिए आवेदन दिया था, लेकिन उन्हें नहीं मिला.

बाद में इस योजना को लेकर कई सवाल खड़े हुए और आरोप लगाया गया कि मुलायम सिंह-अमर सिंह ने मिलकर अपने चहेतों को ये प्लॉट बांटा है, जिसके बादे इसे खारिज कर दिया था.

द वायर ने जस्टिस चौहान से पूछा कि क्या मामले के उनके न्यायिक निर्णय में कोई हितों का टकराव था.

इस पर जस्टिस चौहान ने कहा, ‘मुझे कोई हितों का टकराव नहीं लगा. मेरे भाई याचिकाकर्ता नहीं थे. उनकी पत्नी ने याचिका दी थी, लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूं कि प्लॉट के रद्द होने के बाद जब किसी ने जनहित याचिका दायर की थी तब सुप्रीम कोर्ट के सामने पूरा मामला उठाया गया था.’

उन्होंने आगे बताया, ‘सुप्रीम कोर्ट ने आदेश को बरकरार रखा था जिसके माध्यम से हाईकोर्ट के एक जज के रूप में मैंने आवंटन मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया था. ध्यान दीजिए कि तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार में कैबिनेट मंत्री होने के बावजूद मेरे भाई वह प्लॉट नहीं मिल सका था जो उनकी को आवंटित किया गया था.’

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)