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अदालत की अवमानना अधिनियम के ख़िलाफ़ एन. राम, प्रशांत भूषण और अरुण शौरी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे

अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2 (सी) (i) को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होने के साथ अस्पष्ट, व्यक्तिपरक और स्पष्ट  तौर पर मनमाना है.

अरुण शौरी, एन. राम और प्रशांत भूषण. (फोटो: द वायर/पीटीआई)

अरुण शौरी, एन. राम और प्रशांत भूषण. (फोटो: द वायर/पीटीआई)

नई दिल्लीः द हिंदू के पूर्व संपादक एन. राम, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की एक उपधारा की संवैधानिकता को चुनौती दी है.

यह उपधारा अदालत की निंदा करने या अदालत की गरिमा को कम करने के आधार पर आपराधिक अवमानना के अपराध से संबंधित है.

इस याचिका में अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2 (सी) (i) को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होने के साथ अस्पष्ट, व्यक्तिपरक और साफ तौर पर मनमाना है.

जहां भूषण सुप्रीम कोर्ट में अवमानना के दो मामलों का सामना कर रहे हैं, वहीं शौरी और एन. राम भी पहले अवमानना के मामलों का सामना कर चुके हैं.

भूषण के खिलाफ एक मामला उनके द्वारा हाल में किए गए दो ट्वीट से संबंधित है, जबकि दूसरा मामला साल 2009 से संबंधित है और आठ सालों बाद उस पर 4 अगस्त को सुनवाई होगी.

लाइव लॉ के अनुसार, एन. राम को कोल्लम शराब हादसा मामले में अदालत की कार्यवाही के प्रकाशन के कारण केरल हाईकोर्ट में आपराधिक अवमानना कई कार्यवाही का सामना करना पड़ा था. यह मामला बाद में बंद हो गया था.

वहीं, शौरी को एक संपादकीय में जस्टिस कुलदीप सिंह आयोग पर टिप्पणी के लिए अवमानना का सामना करना पड़ा था. लाइव लॉ के अनुसार, साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रकाशन पर अवमानना की कार्यवाही नहीं बनती है.

यह याचिका वरिष्ठ वकील कामिनी जायसवाल के माध्यम से दाखिल की गई है.

याचिकाकर्ताओं का दावा है कि अधिनियम की धारा 2 (सी) (i) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रभाव को कम करता है और संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत ‘अदालत को अपमानित करना’ के अपराध को ‘अदालत की अवमानना’ की श्रेणी में शामिल नहीं माना जा सकता है.

उन्होंने कहा, ‘अगर इस उपधारा को अनुच्छेद 19 (2) में अवमानना की धारा के तहत मंजूरी दी गई थी, तो यह असम्मानजनक होगा और इसलिए अनुचित होगा.’

उन्होंने आगे कहा कि न्यायालय को अपमानित करने का अपराध औपनिवेशिक मान्यताओं और कानूनों में निहित है, जिसका लोकतांत्रिक संवैधानिकता के लिए प्रतिबद्ध कानूनी आदेशों में कोई स्थान नहीं है.

याचिका में आगे कहा गया, ‘अधिरोपित उपधारा असंवैधानिक है क्योंकि यह संविधान के प्रस्तावनात्मक मूल्यों और बुनियादी विशेषता के साथ असंगत है. यह अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन करता है, असंवैधानिक और गलत तरीके से अस्पष्ट है और साफ तौर से मनमाना है.’

याचिका में प्रावधान को अत्याधिक व्यक्तिपरक के रूप में वर्णित किया गया है, जिसमें बहुत ही अलग-अलग तरीके से पढ़ा जा सकता है. इस प्रकार, अपराध की अस्पष्टता अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है, जो समान व्यवहार और मनमानी को रोकने की मांग करती है.

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