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बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रो. जीएन साईबाबा की पैरोल याचिका ख़ारिज की

माओवादियों के साथ संबंध रखने के मामले नागपुर जेल में आजीवन कारावास की सज़ा काट रहे जीएन साईबाबा अपनी मां के अंतिम संस्कार के रस्मों में हिस्सा लेने के लिए पैरोल पर छुट्टी देने का आवेदन दिया था.

GN Saibaba PTI

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. जीएन साईबाबा. (फोटो: पीटीआई)

नागपुर: नागपुर केंद्रीय जेल के अधिकारियों ने मंगलवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा के पैरोल के आवेदन को खारिज कर दिया. उन्होंने अपनी मां के अंतिम संस्कार के रस्मों में हिस्सा लेने के लिए पैरोल पर छुट्टी देने का आवेदन दिया था.

साईबाबा नक्सलवादियों के साथ संबंध रखने का दोषी पाए जाने के बाद नागपुर जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं.

उनकी 74 वर्षीय मां की मौत एक अगस्त को हैदराबाद में हो गई थी. वह कैंसर से पीड़ित थीं.

बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने बीते 28 जुलाई को साईबाबा की जमानत याचिका खारिज कर दी थी. उन्होंने अपने स्वास्थ्य के आधार पर और कैंसर से पीड़ित अपनी मां से मिलने के लिए जमानत देने का आग्रह किया था.

साईबाबा के जमानत याचिका खारिज होने के चार दिन बाद उनकी मां का निधन हो गया था.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक साईबाबा के वकील आकाश सोर्डे ने कहा, ‘कोरोना वायरस के कारण हैदराबाद में उनकी मां का अंतिम संस्कार शनिवार (एक अगस्त) को ही कर दिया गया.’

कैंसर से पीड़ित उनकी मां ने मरने से पहले एक बार अपने बेटे को देखने की इच्छा जाहिर की थी, लेकिन अदालत ने उनकी जमानत याचिका को खारिज कर दिया था.

उसके बाद साईबाबा के भाई ने जेल प्रशासन से अनुरोध किया था कि उन्हें अंतिम संस्कार की रस्मों में शामिल होने के लिए रिहा किया जाए.

जेल अधीक्षक अनूप कुमार कुमरे ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, ‘हमने उन्हें अनुष्ठानों में शामिल होने से मना कर दिया क्योंकि वह अलग तरह के कैदी हैं.’

विभिन्न प्रकार के कैदियों से उनका क्या अभिप्राय है पूछे जाने पर कुमरे ने कहा, ‘मैं इस पर और विस्तार से नहीं कह सकता.’

उन्होंने कहा, ‘पैरोल या फर्लो पर रिहा होने के बाद कुछ कैदी वापस नहीं लौटते हैं, वे (साईबाबा) फिर से जमानत के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं.’

साईबाबा को मार्च 2017 में गढ़चिरौली कोर्ट द्वारा गैरकानूनी गतिविधियां (निवारक) अधिनियम (यूएपीए) के तहत माओवादियों से संबंध रखने और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाली गतिविधियों में शामिल होने के लिए दोषी ठहराया गया था और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. उन्होंने इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)