नॉर्थ ईस्ट

असम: तेल के कुएं से गैस रिसाव रोकने का दूसरा प्रयास भी असफल, जून से लगी हुई है आग

तिनसुकिया ज़िले के बाघजान गांव में ऑयल इंडिया लिमिटेड के एक तेल के कुएं में 27 मई से गैस का रिसाव हो रहा है, जिसमें नौ जून को आग लग गई थी. कंपनी के अनुसार कुएं पर ढक्कन रखने का प्रयास किया जा रहा था, लेकिन आग के कारण उसे रखने वाली केबल क्षतिग्रस्त हो गई.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

गुवाहाटी: असम के तिनसुकिया जिले के बाघजान में गैस के क्षतिग्रस्त कुएं को बंद करने का दूसरा प्रयास भी सोमवार को सफल नहीं हो सका और ढक्कन उठाने वाला लोहे का केबल टूट गया.

आयल इंडिया लि. (ओआईएल) के इस कुएं से पिछले 76 दिनों से गैस का रिसाव हो रहा है. कुएं को बंद करने के लिए पिछले 10 दिनों में यह दूसरा प्रयास था.

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ने एक बयान में यह जानकारी दी. कंपनी के अनुसार आग के कारण अत्यधिक गर्मी की वजह से केबल क्षतिग्रस्त हो गया.

कंपनी ने कहा कि आवश्यक सुधार किए जाने के बाद कुएं को बंद करने का फिर से प्रयास किया जाएगा.

सार्वजनिक उपक्रम के प्रवक्ता त्रिदिप हजारिका ने बताया कि विशेषज्ञ कुएं के मुंह पर ब्लो आउट प्रेवेंटर (बीओपी) रखने की कोशिश कर रहे थे लेकिन अत्यधिक गर्मी के कारण केबल टूट गया.

बीओपी धातु के एक भारी ढक्कन जैसा होता है और इसका वजन कई टन तक होता है. इसे तेल या गैस के रिसाव को रोकने के लिए कुएं के मुंह पर रखा जाता है.

उन्होंने कहा, ‘हमारे विशेषज्ञ केबल की मरम्मत के लिए काम कर रहे हैं. जैसे ही यह तैयार होता है, हम फिर से कोशिश करेंगे.’

इससे पहले 31 जुलाई को भी कुएं का मुंह बंद करने की कोशिश की गयी थी लेकिन उस समय हाइड्रोलिक मशीन पलट गयी थी.

गौरतलब है कि 27 मई को राजधानी गुवाहाटी से करीब 450 किलोमीटर दूर तिनसुकिया जिले के बाघजान गांव में ऑयल इंडिया लिमिटेड के एक तेल के कुएं में विस्फोट (ब्लोआउट) हो गया था, जिसके बाद इस कुएं से अनियंत्रित तरीके से गैस रिसाव शुरू हुआ था.

ब्लोआउट वह स्थिति होती है, जब तेल और गैस क्षेत्र में कुएं के अंदर दबाव अधिक हो जाता है और उसमें अचानक से विस्फोट के साथ और कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस अनियंत्रित तरीके से बाहर आने लगते हैं.

कुएं के अंदर दबाव बनाए रखने वाली प्रणाली के सही से काम न करने से ऐसा होता है. इसके बाद नौ जून को यहां भीषण आग लग गई, जिसमें दो दमकलकर्मियों की मौत हो गई थी. तब से यह रिसाव और आग अब तक नियंत्रित नहीं की जा सकी है.

आग लगने की घटना के बाद मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इस घटना की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए थे.

इसके अलावा देश और विदेश के तमाम विशेषज्ञों द्वारा इस आग और रिसाव पर काबू पाने के प्रयास किए जा रहे थे.

बीते 22 जुलाई को सिंगापुर की एक कंपनी के तीन विदेशी विशेषज्ञों को ओआईएल और ओएनजीसी के विशेषज्ञों की मदद के लिए बुलाया गया था. कुंए में लगी आग को बुझाने के प्रयास के दौरान भीषण विस्फोट हुआ था जिसमें तीनों विशेषज्ञ घायल हो गए थे.

मई महीने से वहां गैस रिसाव लगातार हो रहा है, जिसके चलते भारी प्राकृतिक नुकसान हो रहा है. आसपास के संवेदनशील वेटलैंड, डिब्रु-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान और लुप्त हो रही प्रजातियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं.

स्थानीय रहवासियों ने जून में बताया था कि उन्होंने पास के मागुरीबिल झील में डॉल्फिंस के शव पड़े देखे हैं. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार आसपास के गांवों के धान के खेत, तालाब और वेटलैंड प्रदूषित हो चुके हैं और खतरा हर दिन बढ़ रहा है.

गांव वालों ने गैस रिसाव के बाद शुरुआती सप्ताह में बताया था कि उन्हें गैस की महक आ रही है और इस उद्यान में कई जगहों पर तेल फैल चुका है. कई छोटे चाय किसानों ने बताया कि गैस की परतें चाय बागान के ऊपर इकट्ठी हो गई हैं.

इसके बाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने इस आग पर काबू पाने में असफल रहने पर ऑयल इंडिया पर 25 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था. अधिकरण का कहना है कि कुएं में लगी आग से पर्यावरण को बहुत नुकसान हो रहा है.

वहीं, पीएसयू ने बताया था कि वर्तमान में ईआरएम इंडिया, टेरी और सीएसआईआर-एनआईईएसटी जैसी कई एजेंसियों द्वारा गांवों और आस-पास के वन क्षेत्रों में विस्फोट के विभिन्न आकलन और प्रभावों का अध्ययन किया जा रहा है.

तिनसुकिया और डूमडोमा सर्कल दोनों में 14 जुलाई तक कुल सर्वे किए गए परिवारों की संख्या 1,491 है. मई में कुएं में आग लगने और बाद में पिछले महीने 9,000 से अधिक लोगों को 13 राहत शिविरों में पहुंचाया गया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)