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वर्ष 1951 से होगा ‘असमिया लोगों’ का निर्धारण: गृह मंत्रालय की समिति की रिपोर्ट

असमिया लोगों के निर्धारण के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा असम समझौते की धारा छह को लागू करने के लिए गठित एक उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट को इसके चार सदस्यों ने सार्वजनिक कर दिया है. इसमें गृह मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि असमिया लोगों के निर्धारण के लिए 1951 को कट-ऑफ वर्ष माना जाना चाहिए.

Guwahati: People show their documents after arriving at a National Register of Citizens (NRC) Seva Kendra to check their names on the final draft, in Guwahati, Saturday, Aug 31, 2019. (PTI Photo) (PTI8_31_2019_000080B)

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

गुवाहाटी: केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा असम समझौते की धारा छह को लागू करने के लिए गठित एक उच्चस्तरीय समिति ने कहा है कि असमिया लोगों के निर्धारण के लिए 1951 को कट-ऑफ वर्ष माना जाना चाहिए.

इस साल फरवरी में राज्य सरकार को सौंपी गई 14 सदस्यीय समिति की रिपोर्ट मंगलवार को इसके चार सदस्यों द्वारा प्रेस को जारी की गई.

ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के तीन और समिति के एक अन्य सदस्य एवं अरुणाचल प्रदेश के महाधिवक्ता निलय दत्ता ने संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया और कहा कि वे इसे केवल इसलिए जारी कर रहे हैं क्योंकि ‘सरकार सिर्फ हाथ पर हाथ रखकर बैठी है.’

आसू के तीन सदस्य समुज्जल भट्टाचार्य, दीपांकर नाथ और लुरिनज्योति गोगोई हैं.

आसू के मुख्य सलाहकार समुज्जल कुमार भट्टाचार्य ने कहा, ‘हमें रिपोर्ट सौंपे पांच महीने से अधिक समय हो गया है, लेकिन सरकार की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हुई है. लोग हमसे रोज पूछ रहे हैं, उसका क्या हुआ. हमने आखिरकार इसे जारी करने का फैसला किया, क्योंकि लोगों को जानने का अधिकार है.’

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार को एक बयान जारी कर असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने रिपोर्ट के खुलासे को बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बताया.

उन्होंने कहा कि सरकार असम समझौते के प्रत्येक खंड को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है. उन्होंने कहा कि पूर्व में किसी सरकार ने खंड 6 को लागू करने के लिए कोई समिति नहीं बनाई थी.

उन्होंने आगे कहा, ‘इसके साथ ही केंद्र सरकार भी इस संबंध में कदम उठा रही है. इसलिए एक निश्चित समयसीमा दिए बिना समिति की रिपोर्ट का खुलासा करना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है.’

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, रिपोर्ट में कहा गया है कि असम समझौते की धारा 6 के कार्यान्वयन के उद्देश्य से ‘असमिया लोग’ की परिभाषा में स्वदेशी आदिवासियों के साथ-साथ असम के अन्य स्वदेशी समुदाय, भारत के अन्य सभी नागरिक, जो असम के क्षेत्र में 01/01/1951 को और उससे पहले से रह रहे हैं और स्वदेशी असमिया और उनके वंशज शामिल होने चाहिए.

धारा छह के अनुसार, असमिया लोगों की संस्कृति, सामाजिक, भाषाई पहचान और विरासत की रक्षा, संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए संवैधानिक, विधायी और प्रशासनिक सुरक्षा उपाय, जो भी उपयुक्त हों किए जाएंगे.

समझौते पर हस्ताक्षर होने बाद से विवाद की जड़ असमिया लोगों की परिभाषा है, जिसका समाधान समिति ने करने की कोशिश की.

पिछले साल दिसंबर में पूरे असम नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए थे, तब सर्बानंद सोनोवाल की अगुवाई वाली राज्य सरकार ने इन प्रदर्शनों को रोकने के उद्देश्य और ‘स्वदेशी’ लोगों के हितों की रक्षा के एक उपाय तौर पर धारा 6 को जल्द से जल्द लागू करने का वादा किया था.

बहरहाल 25 फरवरी को जस्टिस (सेवानिवृत्त) बीके शर्मा की अध्यक्षता में धारा छह के कार्यान्वयन पर उच्चस्तरीय समिति ने रिपोर्ट मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल को सौंपी थी, ताकि इसे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सौंपा जा सके.

समिति के अध्यक्ष ने पूरे राज्य मंत्रिमंडल, शीर्ष सरकारी अधिकारियों और पत्रकारों की उपस्थिति में मुख्यमंत्री को रिपोर्ट सौंपी थी.

भट्टाचार्य ने कहा, ‘हमें नहीं पता कि रिपोर्ट कहां है. क्या यह मुख्यमंत्री (सर्बानंद सोनोवाल) की अलमारी में है या कहीं और? क्या इसे दिल्ली भेजा गया है? रिपोर्ट को इस तरह से नजरअंदाज करना स्वीकार्य नहीं है.’

रिपोर्ट में असम समझौते को अक्षरश: लागू करने की बात की गई है और सरकार से भारत-बांग्लादेश सीमा को सील करने के लिए त्वरित उपाय करने के लिए कहा गया है.

इसमें राज्य से संसद की सीटों में 80-100 प्रतिशत आरक्षण का सुझाव तथा असम में उच्च सदन बनाने की भी सिफारिश की गई है.

यह पूछे जाने पर कि क्या रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का कोई कानूनी प्रभाव होगा, वरिष्ठ अधिवक्ता दत्ता ने कहा कि इसका कोई प्रभाव नहीं होगा.

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पिछले साल जनवरी में सेवानिवृत्त केंद्रीय सचिव एमपी बेजबरुआ की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था, लेकिन नौ सदस्यों में से छह ने इसका हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था. उसके बाद 16 जुलाई, 2019 को समिति का पुनर्गठन किया गया, जिसमें जस्टिस (सेवानिवृत्त) शर्मा अध्यक्ष बनाए गए और 14 अन्य सदस्य रखे गए.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)