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अवमानना क़ानून को चुनौती देने वाली याचिका वापस ली गई, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट जाने की छूट दी

पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी, वरिष्ठ पत्रकार एन. राम और कार्यकर्ता एवं वकील प्रशांत भूषण ने याचिका दायर कर अदालत की अवमानना क़ानून, 1971 को चुनौती दी थी और कहा था कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता के अधिकार का उल्लंघन है.

अरुण शौरी, एन. राम और प्रशांत भूषण. (फोटो: द वायर/पीटीआई)

अरुण शौरी, एन. राम और प्रशांत भूषण. (फोटो: द वायर/पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को याचिकाकर्ताओं को इजाजत दे दी कि वे अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(सी)(आई) को चुनौती देने वाली याचिका वापस ले सकते हैं.

लाइव लॉ के मुताबिक, इसके साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को ये छूट दी की वे उचित स्थान यानी कि हाईकोर्ट में इस मामले को लेकर जा सकते हैं और आगे चलकर वे फिर से सर्वोच्च न्यायालय आ सकते हैं.

जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ के सामने इस मामले को सूचीबद्ध किया गया था. याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा कि वे अपनी याचिका वापस लेना चाहते हैं.

धवन ने कहा, ‘इस समय आपके सामने कई सारे मामले लंबित हैं, इसलिए मैं नहीं चाहता ये मामला भी इसी बीच आ जाए. इस मामले को उठाने के लिए यह उचित समय नहीं है. मैं आगे चलकर फिर से ये याचिका दायर करने की इजाजत चाहता हूं.’

इस पर जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि वे इसकी इजाजत देते हैं कि मामले को वापस ले लिया जाए, लेकिन इसकी इजाजत नहीं है कि इसी मामले को फिर से हमारे सामने दायर किया जाएगा.

धवन ने मामले को तत्काल हाईकोर्ट के सामने दायर करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करने की मांग की. वरिष्ठ वकील ने कहा, ‘यह एक महत्वपूर्ण मामला है, इसलिए यह सवाल बने रहना चाहिए और उचित समय में इस पर फैसला किया जाए.’

उन्होंने यह भी कहा, ‘हो सकता है कि दो महीने में मैं फिर से इसी याचिका के साथ आऊं.’

पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी, वरिष्ठ पत्रकार एन. राम और कार्यकर्ता एवं वकील प्रशांत भूषण ने अपनी याचिका में ‘अदालत की निंदा’ के लिए आपराधिक अवमानना से जुड़े एक कानूनी प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है और कहा है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता के अधिकार का उल्लंघन है.

शुरुआत में इस मामले को जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस केएम जोसेफ की पीठ के सामने सूचीबद्ध किया गया था. हालांकि बाद में मामले को इस पीठ के सामने से हटा लिया गया और सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने इसे जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सूचीबद्ध किया.

सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने कहा कि इस मामले को जस्टिस मिश्रा की पीठ के सामने ही पेश किया जाना चाहिए था, क्योंकि वे प्रशांत भूषण के खिलाफ दो अवमानना मामलों की सुनवाई कर रहे हैं.

बता दें कि जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने भूषण के खिलाफ दो आपराधिक अवमानना मामलों पर चार और पांच अगस्त को सुनवाई की थी और इस पर अपने फैसलों को सुरक्षित कर लिया था.

इसमें से एक मामला प्रशांत भूषण के उन दो ट्वीट्स से जुड़ा हुआ है, जो उन्होंने 27 और 29 जून को ट्वीट किए थे. वहीं दूसरा मामला साल 2009 का है, जिसमें आरोप लगाया है कि तहलका मैगजीन को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने अदालत का अपमान किया था.

हालांकि साल 2009 के अवमानना मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भूषण की सफाई स्वीकार करने से मना कर दिया और कहा है कि इस मामले पर अब विस्तृत सुनवाई होगी और यह तय किया जाएगा कि पूर्व जजों के संबंध में दिए गए प्रशांत भूषण के बयान से अदालत की अवमानना होती है या नहीं.

चार अगस्त को इस मुद्दे पर अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए कोर्ट ने कहा था कि यदि वे स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं होते हैं, तो न्यायालय मामले को विस्तार से सुनेगा.

पिछले महीने 22 जुलाई को कोर्ट ने ट्वीट वाले मामले में भूषण को नोटिस जारी किया और पांच अगस्त सुनवाई की तारीख तय की. वहीं 24 जुलाई को कोर्ट ने 2009 वाले मामले के लिए सुनवाई की तारीख चार अगस्त तय की थी.

दोनों अवमानना मामलों की सुनवाई की तारीख तय किए जाने के बाद भूषण ने एक याचिका दायर कर उस नोटिस को चुनौती दी जो कि उनके ट्वीट के संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किया गया था.

यह मामला जस्टिस मिश्रा की अगुवाई वाली उसी पीठ के सामने सूचीबद्ध किया गया जो कि अवमानना मामले को सुन रही थी और पांच अगस्त को पीठ ने भूषण की इस याचिका को खारिज भी कर दिया था.

बाद में राम, शौरी और भूषण ने एक और याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(सी)(आई) को चुनौती दी थी.