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नगालैंड: नगा संगठन ने जारी की गोपनीय फ्रेमवर्क एग्रीमेंट की प्रति, वार्ताकार पर लगाए आरोप

केंद्र सरकार के साथ शांति वार्ता में शामिल सबसे बड़े नगा संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड-इसाक मुईवाह ने 2015 में सरकार के साथ हुए फ्रेमवर्क एग्रीमेंट की प्रति सार्वजनिक करते हुए कहा कि वार्ताकार आरएन रवि नगा राजनीतिक मसले को संवैधानिक क़ानून-व्यवस्था की समस्या का रंग दे रहे हैं.

टी. मुइवाह और आरएन रवि. (फाइल फोटो: पीटीआई)

टी. मुइवाह और आरएन रवि. (फाइल फोटो: पीटीआई)

केंद्र सरकार के साथ लगभग 20 सालों में शांति वार्ता में शामिल सबसे बड़े नगा संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड-इसाक मुईवाह (एनएससीएन-आईएम) ने 2015 में सरकार के साथ हुए रूपरेखा समझौते (फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) की प्रति सार्वजनिक कर दी है.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने इसे मूल दस्तावेज की प्रति कहा है. संगठन ने केंद्र की ओर से वार्ताकार और नगालैंड के राज्यपाल आरएन रवि पर आरोप लगाते हुए कहा है कि वे कथित तौर पर नगा और नागरिक संगठनों को भेजी जा रही प्रतियों में मूल एग्रीमेंट में ‘बदलाव’ और उसके कंटेंट से छेड़छाड़ कर रहे हैं.

बता दें कि 2015, जब से इस एग्रीमेंट पर दस्तखत हुए थे, तब से इसे सरकार और संगठन की आपसी सहमति से ‘सुरक्षा कारणों के चलते’ गोपनीय रखा गया था. अब तक न ही केंद्र सरकार और न ही राज्यपाल आरएन रवि की ओर से इस बारे में कोई स्पष्टीकरण जारी किया गया है.

एनएससीएन-आईएम का यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब महज हफ्ते भर पहले वे आरएन रवि पर पर नगा राजनीतिक मुद्दों के अंतिम समाधान में बाधक बनने का आरोप लगाते हुए शांति वार्ता आगे बढ़ाने के लिए नए वार्ताकार को नियुक्त किए जाने की मांग कर चुके हैं.

संगठन की ओर से उन्हें हटाए जाने की मांग करते हुए कहा गया था कि जब तक वार्ताकार बदले नहीं जाते, तब तक शांति वार्ता की प्रक्रिया का आगे बढ़ पाना संभव नहीं है.

बीते कुछ समय से एनएससीएन-आईएम शांति प्रक्रिया में रवि की भूमिका को लेकर काफी आलोचनात्मक रहा है. वहीं रवि ने भी अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में राज्य सरकार के साथ उन पर भी निशाना साधा था.

गौरतलब है कि उत्तर पूर्व के सभी उग्रवादी संगठनों का अगुवा माने जाने वाला एनएससीएन-आईएम अनाधिकारिक तौर पर सरकार से साल 1994 से शांति प्रक्रिया को लेकर बात कर रहा है.

सरकार और संगठन के बीच औपचारिक वार्ता वर्ष 1997 से शुरू हुई. नई दिल्ली और नगालैंड में बातचीत शुरू होने से पहले दुनिया के अलग-अलग देशों में दोनों के बीच बैठकें हुई थीं.

18 साल चली 80 दौर की बातचीत के बाद अगस्त 2015 में भारत सरकार ने एनएससीएन-आईएम के साथ अंतिम समाधान की तलाश के लिए रूपरेखा समझौते (फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किए गए.

एनएससीएन-आईएम के महासचिव थुलिंगलेंग मुईवाह और वार्ताकार आरएन रवि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में तीन अगस्त, 2015 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

तीन साल पहले केंद्र ने एक समझौते (डीड ऑफ कमिटमेंट) पर हस्ताक्षर कर आधिकारिक रूप से छह नगा राष्ट्रीय राजनीतिक समूहों (एनएनपीजी) के साथ बातचीत का दायरा बढ़ाया था.

2015 में नगा समझौते के समय नगा नेताओं के साथ प्रधनमंत्री मोदी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

2015 में नगा समझौते के समय नगा नेताओं के साथ प्रधनमंत्री मोदी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

अक्टूबर 2019 में आधिकारिक तौर पर इन समूहों के साथ हो रही शांति वार्ता खत्म हो चुकी है, लेकिन नगालैंड के दशकों पुराने सियासी संकट के लिए हुए अंतिम समझौते का आना अभी बाकी है.

बता दें कि एनएससीएन-आईएम नेतृत्व हफ्ते भर से अधिक समय से दिल्ली में है और पिछले कुछ दिनों में आधिकारिक स्तर की वार्ता हुई है. इस बीच उनकी ओर से अपने अलग झंडे, संविधान और ग्रेटर नगालिम की मांगें दोहराई गयी हैं.

14 अगस्त को संगठन प्रमुख टी. मुईवाह ने कहा कि अलग झंडे, संविधान और ग्रेटर नगालिम के बिना कोई समाधान नहीं निकल सकता.

मुईवाह  का कहना था, ‘सात दशकों पुराने हिंसक आंदोलन का सम्मानजनक समाधान बिना झंडे और संविधान के मुमकिन नहीं है. नगा लोग भारत के साथ संप्रभु अधिकारों को साझा करते हुए सह-अस्तित्व में रहेंगे, जैसा कि फ्रेमवर्क एग्रीमेंट में स्वीकृत और परिभाषित किया गया, लेकिन वो भारत के साथ विलय नहीं करेंगे.’

2015 में केंद्र सरकार के साथ हुए समझौता मसौदे के बाद यह पहली बार है जब मुईवाह ने यह कहा है कि अलग झंडे और संविधान को लेकर वे कोई समझौता नहीं करेंगे.

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि एग्रीमेंट में सभी नगा इलाकों को एक साथ लाकर ‘ग्रेटर नगालिम’ बनाने की बात भी हुई है.

बता दें कि ग्रेटर नगालिम में असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के भी क्षेत्र आते हैं. इन राज्यों में इस प्रस्ताव का भारी विरोध होता रहा है.

बताया गया है कि केंद्र सरकार पहले ही संगठन की इन मांगों पर असहमति जता चुकी है, ऐसे में इस पूरी शांति प्रक्रिया के बेपटरी होने के आसार बनते दिख रहे हैं.

इससे पहले पिछले साल अक्टूबर में जब शांति वार्ता आधिकारिक तौर पर पूरी हुई थी, तब केंद्र की ओर से वार्ताकार आरएन रवि ने एनएससीएन-आईएम की अलग झंडे और संविधान की मांग को भी खारिज कर दिया था.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुतबिक, 2017 में इस बातचीत में शामिल हुए छह अन्य नगा समूह यानी एनएनपीजी बिना अलग झंडे और संविधान के फाइनल समझौते पर दस्तखत करने को तैयार हैं.

हालांकि अब एनएससीएन-आईएम द्वारा लगाए गए आरोपों में रवि पर बाकी संगठनों के साथ-साथ संसदीय समिति को भी गुमराह करने की बात कही गई है.

बीते रविवार को जारी बयान में संगठन ने कहा, ‘संसद की स्थायी समिति को नगा शांति समझौतेके संदर्भ में फ्रेमवर्क एग्रीमेंट के बारे में बताते हुए ऐसी बातें कहीं जिनका एग्रीमेंट में जिक्र ही नहीं है.’

बयान में आगे कहा गया, ‘रवि के अनुसार यह फ्रेमवर्क एग्रीमेंट सरकार द्वारा नगा इतिहास की विशिष्टता को पहचानने के बारे में था, साथ ही इस समझ पर कि जो भी समावेशी समझौता होगा वह भारतीय संघ के दायरे में रहकर नगा इतिहास की विशिष्टता को ध्यान में रखकर लिया जायेगा.’

बयान में आगे कहा गया, ‘रवि ने आगे कहा कि एग्रीमेंट में यह इंगित किया गया था कि नगाओं के लिए कुछ विशेष इंतजाम किए जाएंगे. यह रवि द्वारा फ्रेमवर्क एग्रीमेंट की बिल्कुल तोड़ी-मरोड़ी व्याख्या है.’

इसके साथ ही एनएससीएन-आईएम ने नगालैंड के पूर्व मुख्यमंत्री एससी जमीर पर इस प्रक्रिया में अवरोध डालने के लिए आरएन रवि के साथ ‘चोरी-चुपके काम’ करने के आरोप लगाए हैं.

संगठन का यह भी कहना है कि रवि नगा राजनीतिक मसले को संवैधानिक कानून और व्यवस्था की समस्या का रंग दे रहे हैं.

संगठन के बयान में इस बारे में कहा गया है, ‘हमने उनके नेतृत्व में एनएससीएन-आईएम के सदस्यों की हत्या, घर पर छापे, गिरफ्तारियां और राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा उनकी धरपकड़ देखी है. रवि के नगालैंड का राज्यपाल बनने के बाद हमने हर जगह मौजूद असम राइफल्स को काफी सक्रिय देखा है.

सामान्य तौर पर वार्ताकार प्रधानमंत्री के कहे का पालन करता है और संगठन का कहना है कि वह रवि से उसी तौर पर बात कर रहा है न कि एक राज्यपाल के रूप में.

एनएससीएन-आईएम ने  सरकार से लंबित मुद्दों पर उसका रवैया तय करने का अनुरोध करते हुए कहा है, ‘क्योंकि रवि ने इस बातचीत की  प्रक्रिया में उलझनें पैदा की हैं, प्रधानमंत्री ने इस वार्ता को जल्दी पूरी करने की जिम्मेदारी खुफिया विभाग की टीम को सौंपी है.’

बता दें कि प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से बागी समूहों और वार्ताकार के बीच तनाव पर चिंता जताते हुए इंटेलीजेंस ब्यूरो के निदेशक अरविंद कुमार से कहा है कि नगा शांति वार्ता को फिर शुरू किया जाए.

एनडीटीवी के अनुसार, एक अधिकारी ने बताया कि पीएमओ ने अरविंद कुमार और आईबी के विशेष निदेशक अक्षय कुमार मिश्रा को काम सौंपा गया है. इन दोनों ने एक दशक से अधिक समय तक एजेंसी के नॉर्थ ईस्ट डेस्क को संभाला है.