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सार्वजनिक रूप से जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप कब लगाए जा सकते हैं, सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ चल रहे साल 2009 के अवमानना मामले के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सवाल तय किए हैं. भूषण की ओर से पेश हुए वकील ने कहा है कि जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने से अवमानना का मामला नहीं बनता है.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के खिलाफ साल 2009 के अवमानना मामले की सुनवाई के दौरान कुछ बड़े सवाल निर्धारित किए हैं, जिस पर विचार किया जाना है.

जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी की निम्नलिखित सवाल तय किए जिसका व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है.

1. क्या जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए सार्वजनिक टिप्पणी की जा सकती है, किस स्थिति में ऐसी टिप्पणी की जा सकती है?

2. कार्यरत और रिटायर्ड जज के संबंध में ऐसे आरोप लगाते हुए किस तरह की प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए?

प्रशांत भूषण द्वारा साल 2009 में तहलका पत्रिका को दिए एक इंटरव्यू को लेकर उन पर अवमानना कार्यवाही चल रही है, जिसमें भूषण ने कथित तौर पर ये आरोप लगाया था कि पिछले 16 मुख्य न्यायाधीशों में से कम से कम आधे भ्रष्ट थे.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक सुनवाई के दौरान जस्टिस अरुण मिश्रा ने भूषण की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजीव धवन से कहा कि जस्टिस जेएस वर्मा का एक फैसला है, जिसमें ये कहा गया है जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप पहले-पहल सार्वजनिक तौर से नहीं लगाए जाने चाहिए, इन्हें पहले जांच के लिए कोर्ट को बताए जाने चाहिए.

मिश्रा ने यह भी कहा कि विचाराधीन मामलों के संबंध में इस तरह आरोप लगाए जा सकते हैं या नहीं, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए.

इसे लेकर राजीव धवन ने सहमति जताई और कहा कि ये सवाल ‘विचारयोग्य’ हैं. उन्होंने कहा कि इन विषयों को एक बड़ी पीठ द्वारा तय किया जाना चाहिए. जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि इस पहलू पर भी विचार किया जाएगा.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को 24 अगस्त के लिए स्थगित कर दिया. मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस अरुण मिश्रा ने यह भी कहा कि वे इस मामले पर ‘अंतिम निर्णय’ करना चाहते हैं.

मालूम हो कि 10 अगस्त को कोर्ट ने ये फैसला किया था कि वो विस्तृत सुनवाई के बाद इस निर्णय पर पहुंचेगी कि अवमानना के इस मामले में प्रशांत भूषण द्वारा दी गई सफाई को कोर्ट स्वीकार करेगी या नहीं. इसके अलावा कोर्ट ने इस पर भी निर्णय लेने को कहा था कि भ्रष्टाचार के आरोप लगाने से अदालत की अवमानना होती है या नहीं.

सोमवार को मामले की सुनवाई के दौरान राजीव धवन ने पीठ से कहा कि भ्रष्टाचार के आरोप लगाना कोर्ट की अवमानना नहीं होती है और इस पर निर्णय लेते हुए तत्कालीन परिस्थिति को संज्ञान में लिया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि जब अरुण मिश्रा कलकत्ता हाईकोर्ट में जज थे, तब वे एक फैसले का हिस्सा रहे थे, जिसमें कोर्ट ने ये माना था कि ममता बनर्जी द्वारा जजों के खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोप से अवमानना का मामला नहीं बनता है.

बता दें कि वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे द्वारा शिकायत किए जाने पर शीर्ष अदालत ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया था.

भूषण ने तहलका मैगजीन की पत्रकार शोमा चौधरी को एक इंटरव्यू दिया था. इसे लेकर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने कहा था कि पिछले 16 मुख्य न्यायाधीशों में से आधे भ्रष्ट थे.

शिकायत में यह भी कहा गया है कि भूषण ने इंटरव्यू में कहा था कि उनके पास इन आरोपों के कोई प्रमाण नहीं हैं.

साल्वे ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि भूषण ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया पर यह कहते हुए गंभीर आरोप लगाया था कि उन्होंने स्टरलाइट कंपनी से जुड़े एक मामले की सुनवाई की, जबकि इस कंपनी में उनके शेयर्स हैं.

साल्वे ने यह शिकायत स्टरलाइट मामले में दायर एक आवेदन के माध्यम से की थी, जिसमें वह न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) थे.

उन्होंने कहा था कि प्रशांत भूषण ने ऐसा बयान यह तथ्य छिपाते हुए दिया कि मामले में पैरवी कर रहे वकीलों को ये बताया गया था कि जस्टिस कपाड़िया का कंपनी में शेयर है और वकीलों की सहमति के बाद जज ने मामले की सुनवाई शुरू की थी.

पहली बार छह नवंबर 2009 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णनन और जस्टिस एसएच कपाड़िया के सामने ये शिकायत पेश की गई थी, जिन्होंने निर्देश दिया था कि ये मामला तीन जजों की पीठ के सामने रखा जाए, जिसमें एसएच कपाड़िया सदस्य न हों.

इसके बाद 19 जनवरी 2010 को जस्टिस अल्तमस कबीर, जस्टिस सी. जोसेफ और जस्टिस एचएल दत्तू की पीठ ने प्रशांत भूषण और तरुण तेजपाल को मामले में नोटिस जारी किया था.

मई 2012 में आखिरी सुनवाई के बाद पिछली बार 11 दिसंबर 2018 को तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की पीठ के सामने ये मामला सूचीबद्ध किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को एक अन्य अवमानना मामले में दोषी ठहराया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि उनके दो ट्वीट के कारण न्यायपालिका का अपमान हुआ है.