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महेंद्र सिंह धोनी: पल दो पल का क़िस्सा नहीं, मक़बूल दास्तान

जनवरी 2017 में जबसे महेंद्र सिंह धोनी ने भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तानी छोड़ी, तबसे करिअर के अंतिम ढाई सालों में उन्हें तारीफ़ से ज़्यादा आलोचना मिली. टीम के हर कमज़ोर प्रदर्शन के बाद उनके संन्यास के कयास लगने शुरू हो जाते, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इन सालों में भी उनकी चमक फ़ीकी नहीं पड़ी थी.

महेंद्र सिंह धोनी. (फोटो साभार: फेसबुक/@MSDhoni)

महेंद्र सिंह धोनी. (फोटो साभार: फेसबुक/@MSDhoni)

वो 4 जनवरी 2017 का दिन था जब इंग्लैंड के खिलाफ एकदिवसीय श्रृंखला शुरू होने से कुछ ही दिन पहले अचानक कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने भारत की सीमित ओवर (एकदिवसीय और ट्वेंटी-20) क्रिकेट की कप्तानी छोड़ दी थी.

उस समय धोनी 35 साल की उम्र पार कर चुके थे, बल्ले से आउट ऑफ फॉर्म चल रहे थे इसलिए कप्तानी छोड़ने के साथ ही कयास लगाए जाने लगे कि वे जल्द ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को भी उसी तरह अलविदा कह देंगे जिस तरह टेस्ट क्रिकेट को 2014 में कप्तानी छोड़ने के साथ अलविदा कहा था.

लेकिन इन कयासों पर लगाम लगाते हुए धोनी ने खुद को एक सामान्य खिलाड़ी के तौर पर एकदिवसीय और ट्वेंटी-20 टीम में चयन के लिए उपलब्ध बताया.

आलोचकों की नजर धोनी पर थी क्योंकि उनके मुताबिक धोनी कप्तान थे इसलिए टीम में उनकी जगह सुनिश्चित थी, अब साधारण खिलाड़ी के तौर पर क्या वे टीम में अपनी जगह बचा पाएंगे?

यह सवाल उठने के पीछे कारण था साल 2016 में बतौर बल्लेबाज उनका प्रदर्शन. उस वर्ष में धोनी ने 13 एकदिवसीय मैच खेले, जिनकी 10 पारियों में 27.80 के मामूली औसत से महज 278 रन बनाए थे. इस दौरान उनके बल्ले से केवल एक अर्द्धशतक निकला.

धोनी जैसे कद के खिलाड़ी के लिहाज से यह आंकड़े चौंकाने वाले थे क्योंकि 50 से अधिक का औसत रखने और अक्सर नॉट आउट पारी खत्म करने वाला खिलाड़ी इस दरमियान जब भी मैदान में उतरा, तो ज्यादातर मौकों पर सस्ते में आउट होकर ही पैवेलियन लौटा. उस दौरान वे किसी भी पारी में नॉट आउट नहीं रहे.

यही प्रदर्शन आलोचना का आधार बना था और उन्होंने कप्तानी छोड़ी, लेकिन आलोचकों को उम्मीद थी कि वे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलना ही छोड़ देंगे यानी कि संन्यास ले लेंगे, जो नहीं हुआ.

तब सवाल उठा कि आउट ऑफ फॉर्म धोनी क्या टीम में अपनी जगह बचा पाएंगे और कब तक बचा पाएंगे? कब तक चयनकर्ता खराब प्रदर्शन के बावजूद भी बस उनके नाम के कारण उन्हें टीम में चुनते रहेंगे?

धोनी और चयनकर्ताओं पर दबाव इसलिए भी था क्योंकि संजू सैमसन और ऋषभ पंत जैसे विकेटकीपर-बल्लेबाज घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे. वहीं, अनुभवी खिलाड़ियों में दिनेश कार्तिक भी अच्छी फॉर्म में थे.

इन्हीं सवालों और दबावों के बीच 15 जनवरी 2017 को करीब नौ साल बाद धोनी बिना कप्तानी के मैदान में खेलने उतरे थे. लेकिन, इंग्लैंड के खिलाफ श्रृंखला के पहले ही मैच में वे फिर फ्लॉप हुए.

हाई स्कोरिंग मैच में 351 रन का पीछा कर रहे भारत ने 56 रन पर तीन विकेट गंवा दिए थे, तब धोनी मैदान पर आए और महज 6 रन बनाकर आउट हो गए.

मैच फिनिशर कहलाने वाले धोनी से उम्मीद थी कि वे पारी संभालेंगे, इसलिए वे फिर आलोचकों के निशाने पर थे. लेकिन चार दिन बाद अगले ही मैच में उन्होंने धुआंधार 134 रनों की पारी खेलकर आलोचकों का मुंह बंद कर दिया.

यह पारी भी उन्होंने ऐसे दबाव में खेली जब भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 25 रन पर 3 विकेट गंवा दिए थे.

धोनी की उस पारी में उनके शुरुआती दौर की बल्लेबाजी की झलक थी, जहां वे गेंदबाज पर पूरी तरह हावी होकर लंबे छक्के मारा करते थे.

इसलिए उस पारी के बाद आलोचकों और प्रशंसकों को धोनी से उम्मीद बंध गई कि अब कप्तानी के दबाव से मुक्त होने के बाद वे दस साल पुराने धोनी बन जाएंगे.

इस मैच के बाद धोनी अगले ढाई साल और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेले, लेकिन वैसी धुआंधार पारी उनके बल्ले से फिर नहीं निकली. इसके उलट, इस दौरान उन्होंने कुछ ऐसी पारियां जरूरी खेलीं जो उनके स्वभाव के विपरीत थीं.

जैसे 2017 में भारत के वेस्टइंडीज दौरे पर चौथे एकदिवसीय में 114 गेंदों पर 54 रन, 2018 के एशिया कप फाइनल में 67 गेंदों पर 36 रन, 2019 में भारत के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर पहले एकदिवसीय में 96 गेंदों पर 51 रन की पारियां.

शायद यही वजह रही कि कप्तानी छोड़ने के बाद उनके करिअर के अंतिम ढाई सालों में उन्हें तारीफ कम और आलोचना अधिक मिली. भारतीय क्रिकेट टीम की उपलब्धियों से अधिक धोनी के संन्यास की चर्चाएं हुईं.

‘धोनी चुक गए हैं’, ‘धोनी टीम पर बोझ हैं’, ‘धोनी को संन्यास ले लेना चाहिए’ जैसी बातों के बीच भारत की लगभग हर हार के लिए कहीं न कहीं धोनी को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा.

2019 के विश्वकप सेमीफाइनल में भी सभी बल्लेबाजों की विफलता के बावजूद भी धोनी के धीमा खेलने को हार का कारण बताने वालों की कमी नहीं थी. जबकि उन्होंने ऐसे समय में अर्द्धशतकीय पारी खेलकर भारत को जीत के करीब पहुंचाया था, जब सभी ने भारत की हार स्वीकार ली थी.

अखिरकार विश्वकप सेमीफाइलन के एक साल बाद धोनी ने औपचारिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया.

पर इस मौके पर भी ऐसा कहने वालों की कमी नहीं है कि धोनी को संन्यास का यह फैसला सालों पहले कर लेना चाहिए था क्योंकि उनकी बल्लेबाजी में अब धार नहीं रही थी, वे मैदान में रन बनाने के लिए जूझते नजर आते थे, वे टीम के लिए सालों पहले उपयोगिता खो चुके थे आदि.

लेकिन क्या वास्तव में ऐसा था? क्या धोनी वास्तव में रन बनाने के लिए जूझ रहे थे? क्या वे भारत के लिए उपयोगी नहीं रहे थे?


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Thanks a lot for ur love and support throughout.from 1929 hrs consider me as Retired

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इन सवालों के जवाब जब उनके अंतिम ढाई वर्षों (जनवरी 2017-जुलाई 2019) के प्रदर्शन में खोजे, तो तस्वीर कुछ और ही निकलकर आती है.

इस दरमियान उन्होंने 67 एकदिवसीय मैच खेले, जिनकी 51 पारियों में 1,663 रन बनाए. इस दौरान उनका औसत 48.81 और स्ट्राइक रेट 81.36 रहा.

इस दौरान भारत ने नंबर एक से नंबर सात के बल्लेबाजी क्रम पर कुल 18 बल्लेबाजों को मौका दिया, जिनमें सबसे अधिक रन बनाने वाले बल्लेबाजों की सूची में धोनी चौथे पायदान पर रहे.

उनसे अधिक रन केवल विराट कोहली (3,716), रोहित शर्मा (3,527) और शिखर धवन (2,402) ने बनाए. जबकि उनसे अच्छा औसत केवल कोहली (79.06) और रोहित (66.54) का रहा. यानी औसत के मामले में धोनी भारत के तीसरे सबसे सफल बल्लेबाज रहे.

धोनी की बात करें, तो उन्होंने इस दौरान 12 अर्द्धशतक और 1 शतक जमाया, यानी 13 बार पचास से ऊपर स्कोर किया. ऐसा उनसे अधिक बार केवल तीन भारतीय खिलाड़ी- कोहली (31), रोहित (30) और धवन (16) कर सके.

हालांकि इस दौरान धोनी समेत इन सभी ने मैच भी अन्य खिलाड़ियों के मुकाबले अधिक खेले लेकिन इनकी सफलता की कहानी इनके ‘प्रति पारी अर्द्धशतक’ मारने की औसत से पता चलती है.

धोनी ने हर 3.92 पारी में कम से कम एक अर्द्धशतक लगाया. अर्द्धशतकीय पारी का इससे बेहतर औसत केवल चार खिलाड़ियों, अजिंक्य रहाणे (1.88), कोहली (1.93), रोहित (2.06) और धवन (3.5), का ही रहा.

गौरतलब है कि इन चारों ने यह उपलब्धि टॉप ऑर्डर (नंबर 1 से 3) में खेलकर हासिल की. जबकि धोनी ने मिडिल ऑर्डर (नंबर 4 से नंबर 7) में बल्लेबाजी की.

अगर खुद धोनी के ही पूरे एकदिवसीय क्रिकेट करिअर से उनके इस प्रदर्शन की तुलना करें, तो उन्होंने अपने करिअर में 350 मैच खेलकर 50.6 के औसत और 87.6 के स्ट्राइक रेट से 10,773 रन बनाए. उनकी ‘प्रति पारी अर्द्धशतक’ की दर 3.57 रही.

औसत, स्ट्राइक रेट और ‘प्रति पारी अर्द्धशतक’ की दर को ध्यान में रखें, तो अंतिम ढाई सालों में धोनी के प्रदर्शन में बहुत ज्यादा तो नहीं, पर हल्की गिरावट जरूर देखी गई.

लेकिन इस गिरावट का कारण उनकी ढलती उम्र नहीं थी. भारत की मिडिल ऑर्डर की बल्लेबाजी उन पर अत्याधिक निर्भर थी. इस अत्याधिक निर्भरता का वही दबाव धोनी के प्रदर्शन में गिरावट का कारण बना और उन्हें खुलकर नहीं खेलने दिया.

भारत की मिडिल ऑर्डर की बल्लेबाजी का हाल कुछ ऐसा था कि ढाई सालों में जहां टॉप ऑर्डर के तीन स्थानों पर केवल पांच बल्लेबाज खेले, वहीं मिडिल ऑर्डर के चार स्थानों पर धोनी समेत 14 बल्लेबाज आजमाए गए.


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इनमें धोनी को छोड़ दें तो कोई भी बल्लेबाज निरंतर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सका. जिसके चलते हर मैच में भारत के मिडिल ऑर्डर की सूरत बदली होती थी.

2011 क्रिकेट विश्व कप जीतने के बाद युवराज सिंह के साथ धोनी. (फोटो साभार: ट्विटर)

2011 क्रिकेट विश्व कप जीतने के बाद युवराज सिंह के साथ धोनी. (फोटो साभार: ट्विटर)

मिडिल ऑर्डर के बल्लेबाजों के प्रदर्शन में निरंतरता के अभाव के चलते बीच के ओवरों में भारतीय पारी को संभालने का सारा भार धोनी के कंधों पर था. आलम यह था कि 2019 के विश्वकप में क्रिकेट जगत में सबसे अधिक चर्चा का विषय यह था कि भारत के लिए चौथे क्रम पर बल्लेबाजी कौन करेगा?

इन ढाई सालों में भारत की जीत केवल टॉप ऑर्डर (धवन, रोहित और कोहली) के प्रदर्शन पर निर्भर करती थी. अगर ये तीनों सस्ते में आउट हो जाते, तो पारी को पूरे 50 ओवर तक खींचकर ले जाने के लिए धोनी को ही एक छोर पर खूंटा गाड़ना पड़ता.

इसका उदाहरण बार-बार सामने आया. वेस्टइंडीज के खिलाफ जब 2017 में टीम 190 रनों का पीछा कर रही थी तो टॉप ऑर्डर के जल्दी ढहने के बाद धोनी ने मोर्चा संभाला.

मिडिल ऑर्डर में कोई 20 रन से अधिक नही बना सका. नतीजतन धोनी ने अपना विकेट बचाने के लिए कोई जोखिम नहीं लिया और 114 गेंदों पर 54 रन बनाए.

उसी साल श्रीलंका के खिलाफ 29 रन पर 7 विकेट गिरने के बाद भी धोनी ने ही 87 गेंदों पर 65 रन बनाकर टीम को 112 रन के सम्मानजनक स्कोर तक पहुंचाया.

2018 में एशिया कप के फाइनल में बांग्लादेश के खिलाफ लक्ष्य का पीछा करते हुए विकेटों के पतझड़ के बीच धोनी ने एक छोर पकड़ा और 67 गेंदों पर 36 रन बनाए.

फिर 2019 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 3 रन पर 4 विकेट गिरने के बाद धोनी मैदान पर आए और 96 गेंदों पर 51 रन बनाकर विकेटों का गिरना रोका.

कुछ ऐसा ही विश्वकप के सेमीफाइलन में हुआ जब भारत ने 240 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए 92 रन पर 6 विकेट गंवा दिए, फिर धोनी ने आकर 72 गेंदों पर 50 रन बनाए.

टॉप ऑर्डर के फेल होने के बाद बनी ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भारत के पास मिडिल ऑर्डर में धोनी के अतिरिक्त कोई ऐसा बल्लेबाज ही नहीं था, जो क्रीज पर टिकने का ज़ज़्बा दिखा सके.

धोनी की बल्लेबाजी के साथ उनकी विकेटकीपिंग की भी मिसाल दी जाती है. (फाइल फोटो: पीटीआई)

धोनी की बल्लेबाजी के साथ उनकी विकेटकीपिंग की भी मिसाल दी जाती है. (फाइल फोटो: पीटीआई)

इसलिए बार-बार जिम्मेदारी धोनी पर आई, लिहाजा वे हालातों के मुताबिक पारी संभालने के लिए धीमा खेलते नजर आए, जिससे उनका औसत व स्ट्राइक रेट प्रभावित हुआ और आलोचकों को उन्हें घेरने का मौका मिला.

गौरतलब है कि मिडिल ऑर्डर में कोई दमदार बल्लेबाज न होने के चलते टीम प्रबंधन ने छठवें और सातवें क्रम पर बल्लेबाजी करने वाले धोनी को पांचवें क्रम पर प्रमोट करके उनका किरदार बदल दिया था. उसी किरदार के अनुरूप उन्होंने खुद को ढाल लिया था.

धोनी के सहयोगी के तौर पर चयनकर्ताओं द्वारा मिडिल ऑर्डर में आजमाए गए 13 खिलाड़ियों का प्रदर्शन टीम में अपनी जगह बचाने लायक तक नहीं था (जो निम्न सूची से प्रदर्शित होता है). मिडिल ऑर्डर में अकेले धोनी ही एक स्थापित खिलाड़ी बचे थे.

भारत के लिए नंबर 4 से नंबर 8 के क्रम में खेले प्रमुख बल्लेबाजों का प्रदर्शन

(15 जनवरी 2017 – 9 जुलाई 2020)

नाम मैच पारी नॉट आउट रन औसत स्ट्राइक रेट 50 100
एमएस धोनी

केदार जाधव

हार्दिक पांड्या

अंबाती रायुडु

दिनेश कार्तिक

युवराज सिंह

रविंद्र जडेजा

विजय शंकर

श्रेयस अय्यर

ऋषभ पंत

मनीष पांडे

अजिंक्य रहाणे

लोकेश राहुल

सुरेश रैना

 

67

53

50

21

23

11

27

12

6

9

11

6

8

3

51

42

36

20

19

10

15

8

5

8

9

5

7

2

17

13

6

5

8

1

3

1

0

0

3

0

0

0

 

1,663

1,018

912

639

439

372

263

223

210

209

179

140

81

47

48.91

35.10

30.04

42.60

39.90

41.33

21.91

31.85

42

26.12

29.83

35

23.50

81

100

116

84

73

99

89

91

96

99

86

77

701

12

6

4

4

2

1

1

0

2

0

0

1

0

0

1

1

0

1

0

1

0

0

0

0

0

0

0

0

इस दौरान बनाए कुल 1,663 में से 814 रन धोनी ने मैच की दूसरी पारी में बनाए. उन्होंने सात अर्द्धशतक जड़े और उनका औसत 58.14 रहा, जो इस बात की तस्दीक करता है कि बल्लेबाजी क्रम में बदलाव और मिडिल ऑर्डर की चुनौतियों के बीच भी वे अपनी मैच फिनिशर की भूमिका को निभाने के प्रयास करते रहे.

अकेले 2019 के प्रदर्शन की ही बात करें, जो कि धोनी के करिअर का अंतिम वर्ष था, तो इस साल में धोनी भारत के लिए सबसे अधिक औसत से रन बनाने वाले बल्लेबाज थे.

वर्ष 2019 में एकदिवसीय में धोनी के साथ खेले भारतीय बल्लेबाजों का औसत

(1 जनवरी 2019 – 9 जुलाई 2019)

*इस दौरान एक बार धोनी ‘प्लेयर ऑफ द सीरिज’ का भी खिताब जीते.

नाम मैच पारी रन औसत
एमएस धोनी

रोहित शर्मा

विराट कोहली

केदार जाधव

लोकेश राहुल

शिखर धवन

हरेन पंड्या

विजय शंकर

अंबाती रायुडू

ऋषभ पंत

रविंदर जडेजा

दिनेश कार्तिक

शुभमान गिल

18

22

20

17

10

15

12

12

10

6

9

8

2

 

16

22

20

14

10

15

11

8

10

6

5

6

2

600

1204

1054

370

387

545

287

223

247

168

130

89

16

60

57.33

55.47

46.25

43

38.92

31.88

31.85

30.87

28

26

22.25

8

एकदिवसीय के इतर ट्वेंटी-20 क्रिकेट में धोनी पर जिम्मेदारियों का बोझ अधिक नहीं था इसलिए कप्तानी छोड़ने के बाद से क्रिकेट के इस फॉर्मेट में उनकी बल्लेबाजी में निखार आया और इस दौरान उन्होंने अपने करिअर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया.

इस दौरान उन्होंने 25 मैच की 22 पारियों में 42 के औसत और 135 के स्ट्राइक रेट से 505 रन बनाए. इस फॉर्मेट में अपने करिअर के दोनों अर्द्धशतक इसी दौरान बनाए.

जबकि इससे पहले उन्होंने जो 73 मैच खेले थे, उनकी 63 पारियों में 35 के औसत और 122 के स्ट्राइक रेट से 1,112 रन बनाए थे.

आईपीएल में उनके पिछले दो सालों का प्रदर्शन भी इस बात की गवाही देता है कि वे अच्छी लय में थे और तेज गति से भी खेलने की क्षमता रखते थे.

आईपीएल 2018 में उन्होंने 15 पारियों में 75.83 के औसत और 150.66 के स्ट्राइक रेट से 455 रन बनाए. आईपीएल 2019 में 12 पारियों में 83.20 के औसत और 134.62 के स्ट्राइक रेट से 416 रन बनाए.

इन दोनों वर्षों में बल्लेबाजी औसत के मामले में वे आईपीएल के शीर्ष खिलाड़ी थे. 2018 में औसत के मामले में दूसरे नंबर पर लोकेश राहुल (54.91), तो 2019 में डेविड वॉर्नर (69.20) थे, जो धोनी से बहुत पीछे थे.

इस दौरान धोनी ने चौकों से अधिक छक्के मारे. पिछले तीन आईपीएल में उन्होंने कुल 61 चौके और 69 छक्के मारे हैं.  ये आंकड़ा यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि आलोचकों का धोनी को ‘चुका हुआ’ बताना तथ्यों से परे था.

आईपीएल मैच में सुरेश रैना के साथ धोनी. (फोटो साभार: फेसबुक/चेन्नई सुपर किंग्स)

आईपीएल मैच में सुरेश रैना के साथ धोनी. (फोटो साभार: फेसबुक/चेन्नई सुपर किंग्स)

उनमें ताबड़तोड़ खेलने की क्षमता तब भी थी. यदि एकदिवसीय में मिडिल ऑर्डर में कोई मजबूत बल्लेबाज धोनी का साथ निभाने होता तो उनका और टीम का प्रदर्शन शायद कुछ और होता.

यही कारण था कि धोनी 2020 का टी-20 विश्वकप खेलकर संन्यास लेने के इच्छुक थे. इसके पीछे एक कारण यह भी था कि धोनी के विकल्प के तौर पर देखे जा रहे ऋषभ पंत और संजू सैमसन दोनों ही विकेटकीपिंग के साथ-साथ बल्लेबाजी के मामले में भी बुरी तरह फ्लॉप हुए.

ऋषभ पंत ने इस दौरान 28 मैच खेले और 25 पारियों में 20.50 के औसत और 135.38 के स्ट्राइक रेट से 410 रन बनाए. संजू सैमसन को तीन मैच में मौका मिला और वे 5.33 के औसत से महज 16 रन बना सके. जिसके चलते दोनों को ही टीम से बाहर कर दिया गया और लोकेश राहुल को विकेटकीपर की जिम्मेदारी सौंप दी.

पार्ट टाइम विकेटकीपर के तौर पर विकेट के पीछे राहुल की टीम पर भारी पड़ती गलतियां ही धोनी के लिए वापसी के द्वार खोले हुए थीं. लेकिन कोरोना संक्रमण के चलते विश्वकप 2021 तक टल जाने के कारण उन्होंने 39 वर्ष की उम्र में क्रिकेट को अलविदा कहना ही ठीक समझा.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)