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हरिशंकर परसाई: समाज की रग-रग से वाक़िफ़ व्यंग्यकार

हरिशंकर परसाई व्यंग्य के विषय में ख़ुद कहा करते थे कि व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है, विसंगतियों, अत्याचारों, मिथ्याचारों और पाखंडों का पर्दाफाश करता है. उनकी रचनाएं उनके इस कथ्य की गवाह हैं.

Haishankar Parsai

हरिशंकर परसाई. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

हिन्दी के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई किसी भी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं. हिन्दी साहित्य में व्यंग्य विधा के लिए, हर वर्ग के पाठक की चेतना में अगर किसी का नाम पहले-पहल आता है, तो वो परसाई ही हैं.

व्यंग्य विधा को अपने सुदृढ़ और आधुनिक रूप में खड़ा करने में परसाई के योगदान को आलोचकों ने एक सिरे से स्वीकार किया है.

एक आधुनिक विधा के रूप में व्यंग्य की ख्याति 20वीं सदी में हुई. पाश्चात्य चिंतक जॉनथन स्विफ्ट व्यंग्य के विषय में कहते थे कि ‘व्यंग्य एक ऐसा दर्पण है जिसमें देखने वाले को अपने अतिरिक्त सभी का चेहरा दिखता है.’

इस विधा का मुख्य उद्देश्य है, व्यक्ति और उसके सामाजिक संदर्भों में दिखने वाली किसी भी विसंगति पर कुठाराघात करना, भले ही यह संदर्भ, व्यक्ति और समाज के संबंध का हो सकता है, वर्ग और जाति के समीकरण का हो सकता है या विभिन्न विचारधाराओं के टकराव का.

एक व्यंग्यकार, व्यक्ति-जीवन की विडंबनाओं का एक ऐसा रेखाचित्र खींचता है जिसे पढ़कर एक चेतन पाठक अपने आप से भी सवाल उठाने पर विवश हो जाता है.

व्यंग्य के विषय में स्वयं परसाई कहा करते थे ‘व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है, विसंगतियों, अत्याचारों, मिथ्याचारों और पाखंडों का पर्दाफाश करता है.’

22 अगस्त 1924 को होशंगाबाद, मध्य प्रदेश के जमानी ग्राम में जन्मे परसाई मध्यवर्गीय परिवार से आते थे. अल्पायु में ही मां की मृत्यु के बाद पिता की भी कालांतर में एक असाध्य बीमारी के बाद मृत्यु हो गई.

अब चार छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी परसाई पर ही थी. इस प्रकार इनका आरंभिक जीवन गहन आर्थिक अभावों के बीच बीता.

अपने आत्मकथ्य ‘गर्दिश के दिन’ में उन्होंने बचपन की सबसे तीखी याद ‘प्लेग’ की भयावहता का ज़िक्र किया है,

‘1936 या 37 होगा. मैं शायद आठवीं का छात्र था. कस्बे में प्लेग पड़ी थी… रात को मरणासन्न मां के सामने हम लोग आरती गाते. गाते-गाते पिताजी सिसकने लगते, मां बिलखकर हम बच्चों को हृदय से चिपटा लेती और हम भी रोने लगते… ऐसे भयकारी त्रासदायक वातावरण में एक रात तीसरे पहर मां की मृत्यु हो गई.….पांच भाई-बहनों में मृत्यु का अर्थ मैं ही समझता था.’ 

पर जिस गर्दिश की बात परसाई कहते थे, वह जीवन पर्यंत बनी ही रही. वे स्वयं स्वीकार करते थे कि गर्दिश का सिलसिला बदस्तूर है, मैं निहायत बेचैन मन का संवेदनशील आदमी हूं. मुझे चैन कभी मिल ही नहीं सकता. इसलिए गर्दिश नियति है.

अपनी जीवनी में परसाई इस बात का खुलासा करते हुए कहते हैं कि बाल्यकाल में जिस व्यक्ति ने उन्हें सबसे ज़्यादा प्रभावित किया वह थीं उनकी बुआ. परसाई जी ने उनसे ही अपनी ज़िंदगी के कुछ मूल-मंत्र सीखे थे: जैसे, निस्संकोच किसी से भी उधार मांग लेना या बेफिक्र रहना. बड़े-से-बड़े संकट में भी वो यही कहते कोई घबराने की बात नहीं, सब हो जाएगा.

संघर्षों से भरे अपने जीवन में परसाई ने स्वयं को सदैव मजबूत बनाए रखा:

‘मैंने तय किया- परसाई, डरो किसी से मत. डरे कि मरे. सीने को ऊपर कड़ा कर लो, भीतर तुम जो भी हो. ज़िम्मेदारी को गैर ज़िम्मेदारी के साथ निभाओ.’

परसाई के व्यक्तित्व में धार्मिक रूढ़िवादिता, जातीयता, धार्मिक कट्टरता इन सबके विरुद्ध जो एक खास किस्म का विरोधी तेवर दिखलाई पड़ता है उसका बहुत कुछ श्रेय वह अपनी बुआ को देते हैं.

उनसे ही उन्होंने सीखा कि जातीयता और धर्म बेकार के ढकोसले हैं. स्वयं उनकी बुआ ने पचास साल की अवस्था में तमाम विरोधों के बावजूद एक अनाथ मुस्लिम लड़के को अपने यहां शरण दे रखी थी.


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जीविकोपार्जन के संदर्भ में भी परसाई ने कभी किसी बंधी-बंधाई परंपरा का निर्वाह नहीं किया. अपने स्वाभिमानी व्यक्तित्व और आदर्शवादी स्वभाव ने उन्हें किसी भी नौकरी में टिकने नहीं दिया.

मैट्रिक की परीक्षा उतीर्ण करते ही उन्होने जंगल विभाग में नौकरी शुरू की. जंगल में ही सरकारी टपरे पर रहते थे. ईंटों की चौकी बनाकर, पटिये और चादर बिछाकर सोया करते थे, जहां चूहों की धमाचौकड़ी रात भर चलती थी. परसाई अपने इन दिनों के विषय में कहते हैं,

‘चूहों ने बड़ा उपकार किया. ऐसी आदत डाली कि आगे की ज़िंदगी में भी तरह-तरह के चूहे मेरे नीचे उधम करते रहे हैं, सांप तक सर्राते रहे हैं, मगर मैं पटिये बिछाकर, पटिये पर सोता हूं.’ 

आर्थिक संकटों के बीच ही उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए की परीक्षा उत्तीर्ण की और छिट-पुट अध्यापन का कार्य शुरू किया. कुछ वर्षों तक अध्यापन कार्य करने के बाद उन्होंने 1947 में विद्यालय की नौकरी छोड़ दी.

कुछ सालों बाद शाजापुर में एक कॉलेज के प्रिंसिपल नियुक्त होने का प्रस्ताव आया, पर उन्होंने इसे भी अस्वीकार कर दिया और जबलपुर में रहकर स्वतंत्र रूप से लेखन करना स्वीकार किया.

यहीं रहकर उन्होंने साहित्यिक पत्रिका ‘वसुधा’ का प्रकाशन और संपादन किया. इसके अतिरिक्त दैनिक अखबार ‘देशबंधु’ में ‘पूछो परसाई से’ स्तंभ भी बराबर लिखा जहां पर पाठकों के सवालों के माध्यम से विचार-विमर्श किया जाता रहा.

परसाई हिन्दी की प्रायः सभी प्रमुख पत्रिकाओं से स्तंभ लेखक के रूप में आजीवन जुड़े रहे. अपने पहले चरण में तो वसुधा दो वर्ष तक, लगातार प्रकाशित होती रही, जिसके संपादक की भूमिका परसाई ने निभाई.

हालांकि आर्थिक तंगी और संसाधनों के अभाव की वजह से दो वर्षों के बाद पत्रिका को बंद करना पड़ा. आगे चलकर मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की पत्रिका के रूप वसुधा को एक बार फिर पुनर्जीवित किया गया और संघ के अध्यक्ष होने के नाते पत्रिका के संपादन का कार्यभार भी परसाई को ही दिया गया.

‘मेरे समकालीन’ शीर्षक से परसाई ने भी अपने स्तंभ की शुरुआत की थी. हालांकि इस प्रकार के स्वतंत्र लेखन की एक सबसे बड़ी अनिश्चितता यह रही कि आय की अनियमितता के कारण परसाई सदैव आर्थिक संकट में उलझे रहे.

मसलन, अगर अख़बार की आमदनी घट जाती या किसी अखबार में लंबी हड़ताल हो गई तो उनकी रचनाओं का मेहनताना भी उन्हें समय पर नहीं मिलता था.

और ऐसे समय में मित्रों और परिचितों से उधार मांगने के दौर चला करते थे, पर चेहरे पर शिकन नहीं आती और जीने का जज़्बा बरक़रार रहता.

परसाई एक सफल व्यंग्यकार हुए, उसके पीछे एक सबसे बड़ी वजह संभवतः यह भी है कि वह स्वयं पर भी व्यंग्य करने या अपनी खुद की आलोचना करने से नहीं डरते थे.

अपनी जीवनी में उन्होंने  बीसियों बार स्वयं के ऊपर एक तटस्थ आलोचक की तरह आत्मलोचन किया है. उनकी मर्मभेदी लेखनी  ने अपनी कमियों को भी बारंबार उभारा है. मिसाल के तौर पर, परसाई अपने बेटिकट यात्रा करने के संदर्भ में कहते हैं:

‘एक विद्या मुझे और आ गई थी- बिना टिकट सफर करना. जबलपुर से इटारसी, टिमरनी, खंडवा, इंदौर, देवास बार-बार चक्कर लगाने पड़ते. पैसे थे नहीं. मैं बिना टिकट बेखटके गाड़ी में बैठ जाता. तरकीबें बचने की बहुत आ गई थीं. पकड़ा जाता तो अच्छी अंग्रेजी में अपनी मुसीबत का बखान करता. अंग्रेजी के माध्यम से मुसीबत बाबुओं को प्रभावित कर देती और वे कहते-लेट्स हेल्प दि पुअर बॉय.’ 

वे एक जगह लिखते हैं:

‘गैर ज़िम्मेदारी इतनी कि बहन की शादी करने जा रहा हूं. रेल में जेब कट गई, मगर अगले स्टेशन पर पूरी-साग खाकर मज़े में बैठा हूं कि चिंता नहीं. कुछ हो ही जाएगा. और हो गया.’

परसाई ने स्वयं अविवाहित रहते हुए अपने सभी भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी का निर्वाह किया, पर उनके स्वयं का जीवन भी यातना-गर्भित व्यंग्य है.

काम के प्रति उनकी निष्ठा ने उन्हें इस विषम ज़िंदगी को झेल जाने की वह शक्ति दी थी कि जीवन के प्रति एक वीतराग का भाव उनके अंदर आ गया था. परसाई ने अपने एक निबंध ‘पहला सफ़ेद बाल’ में लिखा है:

‘अपना कोई पुत्र नहीं. होता तो मुश्किल में पड़ जाते. क्या देते?… तो इतना रंक नहीं हूं- विराट भविष्य तो है और उत्तराधिकारी की समस्या भी हल हो गई. होने दो हमारे बाल सफ़ेद. हम काम में तो लगे हैं- जानते हैं कि काम बंद करने और मरने का क्षण एक ही होता है.’ 

परसाई के व्यक्तित्व की एक महत्वपूर्ण विशेषता जो उन्हें एक अनोखा व्यंग्यकार बनाती है वो है, सच कह पाने का हौसला और उसके परिणामों को साहस के साथ स्वीकार कर पाने का जज़्बा.

वे जिनकी कलई खोलते, निर्भीकता के साथ खोलते थे. सन 1975 में राष्ट्रीय आपातकाल के समय में सत्ता पक्ष के विपरीत जाकर सच कह पाने का साहस परसाई के निबंधों में ही दिखता है.

राष्ट्र के धर्म-निरपेक्ष ताने-बाने को नष्ट करने वाले तत्वों को वो अपनी लेखनी के माध्यम से आड़े हाथों लेते थे. विश्वनाथ उपाध्याय लिखते हैं:

‘मुझे हरिशंकर परसाई की लंबी पतली काया बंदूक की नली सी लगती है जिसमें से व्यंग्य भन्नाता हुआ निकलता है और जनशत्रु को छार-छार कर देता है.’

एक साहित्यकार के रूप में परसाई के रचना संसार की विविधता का आकलन इस बात से लगाया जा सकता है कि मुख्यतया एक सफल व्यंग्यकार (व्यंग्य संग्रह: तब की बात और थी, भूत के पांव पीछे, बेईमानी की परत, वैष्णव की फिसलन, पगडण्डियों का जमाना, शिकायत मुझे भी है, सदाचार का ताबीज, तुलसीदास चंदन घिसैं, हम इक उम्र से वाकिफ हैं, जाने पहचाने लोग) होने के साथ ही उन्होंने कहानी (कहानी-संग्रह: हंसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे) और उपन्यास (रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज) जैसी विधाओं में भी लेखन किया.

हालांकि उनकी रचनाधर्मिता के स्वरूप के विषय में आलोचक नामवर सिंह यह मानते हैं कि परसाई ने क्रमश: कहानियों की दुनिया को छोड़ते हुए निबंधों की दुनिया में प्रवेश किया, जहां घटनाएं सिर्फ उदाहरण के लिए प्रयोग की जाती हैं.

इस सिलसिले में स्वयं परसाई कहते थे:

‘कहानी लिखते हुए मुझे यह कठिनाई बराबर आती है कि जो मैं कहना चाहता हूं, वह मेरे इन पात्रों में से कोई नहीं कह सकता. तो क्या करूं? क्या कहानी के बीच में निबंध का एक टुकड़ा डाल दूं? पर इससे कथा प्रवाह रुकेगा.’ 

और शायद यही वजह है कि परसाई को सबसे अधिक सफलता निबंध लेखन में ही मिली, न कि कहानियों में. हालांकि भोलाराम का जीव, कहानी हिन्दी की उत्कृष्ट व्यंग्य कहानियों में गिनी जाती है, जिसमें परसाई ने सरकारी कार्यालयों और लालफीताशाही पर प्रहार किया है.

अपने प्रसिद्ध व्यंग्य निबंध संग्रह ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ के लिए सन 1982 में साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त करने वाले परसाई हिन्दी के एकमात्र व्यंग्यकार हैं. परसाई की रचनाओं के अनुवाद लगभग सभी भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में हो चुके हैं.


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एक व्यंग्यकार की सफलता का आकलन इसी तथ्य से किया जा सकता है कि उसके व्यंग्यों की सामाजिक सोद्देश्यता क्या है? और उसके सरोकार क्या हैं? लेखक की सामाजिक प्रतिबद्धता के विषय में परसाई के विचार थे:

‘लेखक समाज का एक अंग है और उस समाज पर जो गुजरती है, उसमें सहभागी है. समाज के उत्थान और पतन, संघर्ष, सुख-दुख, आशा-निराशा, अन्याय-उत्पीड़न आदि में वह दूसरों का सहभोक्ता है.’ 

लेखक की समाज में फैली विसंगतियों को पहचानने की पीड़ा, उसकी व्यक्तिगत पीड़ा है जिसका समाधान वह समूह में और समूह के लिए ढूंढना चाहता है.

इसीलिए अज्ञेय जिस व्यक्ति-स्वातंत्र्य की बात अपने विचारों में करते हैं, परसाई उसका सम्मान करते हुए भी व्यक्ति और व्यक्ति-निर्मित कला  की एक सामाजिक सोद्देश्यता के पक्षधर हैं. परसाई कहते हैं:

‘मनुष्य की छटपटाहट है मुक्ति के लिए, सुख के लिए, न्याय के लिए. पर यह बड़ी लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती है.

अकेले वही सुखी है, जिन्हें कोई लड़ाई नहीं लड़नी. उनकी बात अलग है. अनेक लोगों को सुखी देखता हूं और अचरज करता हूं कि ये सुखी कैसे हैं. न उनके मन में सवाल उठते हैं न शंका उठती है.’  

समाज के शोषितों और गरीबों के प्रति परसाई की सहानुभूति और संवेदना सिर्फ बौद्धिक ही नहीं, बल्कि क्रियात्मक भी थी. परसाई को याद करते हुए, मायाराम सुरजन ने लिखा है:

‘वे राजनांदगांव आएंगे तो शरद कोठारी के रसोइये से पाचक चूरन की शीशी खरीदना नहीं भूलेंगे. मेरा एक ड्राइवर इक़बाल उन्हें घंटों अपनी शायरी सुना देता और वे ऐसे सुनते जैसे उसमें ही डूब गए हैं.

किसी ने अपना दुखड़ा सुनाया तो उसकी मदद चाहे वह उनके बस की बात न हो, करने में सबसे आगे, भले ही फिर उसका बोझा दूसरे उठाएं.’

परसाई के व्यंग्यों में समय और समाज की विसंगतियों और विरोधाभासों को मौके-बेमौके परास्त होते देखा जा सकता है: प्रेम विवाहों और अन्तर्जातीय विवाहों के संदर्भ में परसाई अपने एक परिचित की मान्यताओं के उत्तर में लिखते हैं:

‘भगवान अगर औरत भगाये तो वह बात भजन में आ जाती है. साधारण आदमी ऐसा करे तो यह काम अनैतिक हो जाता है. जिस लड़की की आप चर्चा कर रहे हैं, वह अपनी मर्ज़ी से घर से निकल गई और मर्ज़ी से शादी कर ली, इसमें क्या हो गया?’

आगे, परिचित महोदय कहते हैं: आप जानते हैं, लड़का-लड़की अलग जाति के हैं?

मैंने पूछा- मनुष्य जाति के तो हैं न?…. कम से कम मनुष्य जाति में तो शादी हुई. अपने यहां तो मनुष्य जाति के बाहर भी महान पुरुषों ने शादी की है- जैसे भीम ने हिडिंबा से. 

इसी निबंध में परसाई आगे कहते हैं:

क्या कारण है कि लड़के-लड़की को घर से भागकर शादी करनी पड़ती है? 24-25 साल के लड़के-लड़की को भारत की सरकार बनाने का अधिकार तो मिल चुका है, पर अपने जीवन-साथी बनाने का अधिकार नहीं मिला. 

इसी प्रकार देश में धर्म और संप्रदाय के नाम पर जिस प्रकार कट्टर अतिवादियों द्वारा मुद्दों को उछाला और अपने हितों के लिए प्रयोग किया जाता है, परसाई अपनी तीक्ष्ण दृष्टि से उसे भांप लेते हैं और उसके विरोध में अपनी लेखनी चलाते.

आज कल के तथाकथित लव जिहाद पर परसाई का यह विश्लेषण एकदम सटीक बैठता है:

‘अपने यहां प्रेम की भी जाति होती है. एक हिंदू प्रेम है, एक मुसलमान प्रेम, एक ब्राह्मण प्रेम, एक ठाकुर प्रेम, एक अग्रवाल प्रेम. एक कोई जावेद आलम किसी जयंती गुहा से शादी कर लेता है, तो सारे देश में लोग हल्ला कर देते हैं और दंगा भी करवा सकते हैं.’  

इसी प्रकार, अपने एक प्रसिद्ध निबंध ‘एक गोभक्त से भेंट‘ में उन्होंने गाय को एक प्रतीक की तरह चुनावों में भुनाने के राजनीतिक ढर्रे की पोल खोली है. परसाई, एक गोरक्षक साधु के तर्क को इस प्रकार व्यक्त करते हैं:

‘जनता जब आर्थिक न्याय की मांग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज़ में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह खतरनाक हो जाती है.

जनता कहती है हमारी मांग है, मंहगाई बंद हो, मुनाफाखोरी बंद हो, वेतन बढ़े, शोषण बंद हो, तब हम उससे कहते हैं कि नहीं, तुम्हारी बुनियादी मांग गोरक्षा है. बच्चा, आर्थिक क्रांति की तरफ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूँटे से बांध देते हैं. यह आंदोलन जनता को उलझाए रखने के लिए है.’

देखा जाये तो एक व्यंग्यकार होने की परसाई की विशेषता में ही कहीं-न-कहीं उनके सबसे पहले एक नितांत मानववादी होने की विशेषता मिली हुई है.

एक व्यंग्यकार के रूप में उन्होंने इस विधा को एक साहित्यिक मान्यता दिलवाई क्योंकि बात को जिस बेबाकी और खरेपन से परसाई अपने निबंधों में रखते हैं, वह शैली न केवल हिन्दी साहित्य के लिए बल्कि हिन्दी व्यंग्य के लिए भी एक नई और अनोखी बात थी.

और एक मानववादी होने के नाते उनके इस व्यंग्य के केंद्र में भी मनुष्य के हित की योजना ही शामिल थी.

प्रसिद्ध विद्वान आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहा करते थे ‘व्यंग्य वह है जहां कहने वाला तो अधरोष्ठों में हंस रहा हो और पर सुनने वाला तिलमिला रहा हो.’

कुछ इसी तरह की व्यंग्य क्षमता हम मध्यकालीन भक्ति संत कबीर में पाते हैं जब वह एक सुर में सभी धर्म के कट्टर तत्वों को हांक लगाते थे.

इसी नज़र से देखा जाये तो आधुनिक युग में व्यंग्य में सामाजिक सोद्देश्यता का पुट मिलाकर परसाई भी कबीर के ही एक नए अवतार से कम नहीं लगते.

(अदिति भारद्वाज दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.)