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चारधाम परियोजना में हुए उल्लंघनों पर सुप्रीम कोर्ट की समिति ने कहा- लगता है क़ानून का राज ही नहीं

चारधाम परियोजना के लिए वन एवं वन्यजीव क़ानूनों के बड़े स्तर पर उल्लंघन का इशारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त उच्च अधिकार प्राप्त समिति के अध्यक्ष ने केंद्रीय पर्यावरण सचिव को भेजे पत्र में कहा है कि परियोजना के कारण हिमालयी पारिस्थितिकी को बेहिसाब और दीर्घकालिक क्षति हुई.

सर्दियों के समय केदारनाथ धाम जाने का रास्ता. (फोटो साभार विकीमीडिया कॉमन्स/शुभांशु अग्रे/ CC BY-SA 4.0

सर्दियों के समय केदारनाथ धाम जाने का रास्ता. (फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स/शुभांशु अग्रे/ CC BY-SA 4.0)

नई दिल्ली: सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (एमओआरटीएच) की चारधाम परियोजना द्वारा वन एवं वन्यजीव कानूनों के बड़े स्तर पर उल्लंघन की ओर संकेत करते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त उच्च अधिकार प्राप्त समिति के अध्यक्ष ने पर्यावरण मंत्रालय से सख्त कार्रवाई करने को कहा है.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, उच्च स्तरीय समिति के अध्यक्ष रवि चोपड़ा ने बीते 13 अगस्त को केंद्रीय पर्यावरण सचिव को भेजे गए पत्र में कहा कि कानूनों का इस तरह से उल्लंघन किया गया जैसे कानून का शासन मौजूद ही नहीं है.

अपने पत्र में चोपड़ा ने कहा कि विभिन्न हिस्सों पर बिना अधिकृत मंजूरी के पेड़ों और पहाड़ियों को काटने के साथ खुदाई सामग्री निकाली गई जिससे परियोजना के कारण हिमालयी पारिस्थितिकी को बेहिसाब और दीर्घकालिक क्षति हुई.

बता दें कि चारधाम परियोजना का मकसद उत्तराखंड के चार पर्वतीय शहरों- यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ को सभी मौसम के अनुकूल सड़कों से जोड़ना है.

इस योजना को चारधाम मार्ग का पुनरुद्धार भी कहा जा रहा है. केंद्र की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत चीन सीमा और चारधामों तक पहुंचने वाली सड़कों को विश्व स्तर का बनाया जाना है.

इसके तहत करीब 12 हजार करोड़ रुपये की लागत से 889 किलोमीटर सड़क चौड़ीकरण का काम होना है.

गौरतलब है कि 27 दिसंबर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12,000 करोड़ रुपये की चारधाम विकास योजना का शिलान्यास किया था. इस योजना के तहत 900 किलोमीटर लंबी सड़कों का लगभग 10 मीटर चौड़ीकरण किया जाना है.

हालांकि, पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों में पेड़ों और पहाड़ों को काटने के तरीकों को लेकर इस योजना पर लगातार सवाल उठ रहे हैं.

परियोजना के पारिस्थितिक प्रभाव की जांच करने और इसे सही करने के उपायों की सिफारिश करने के लिए इस उच्च अधिकार प्राप्त समिति का गठन किया गया है.

समिति के सदस्यों द्वारा पहाड़ी सड़कों की आदर्श चौड़ाई के लिए 5.5 मीटर की जगह 12 मीटर पर असहमति जताने के बाद इस साल जुलाई में समिति ने दो रिपोर्ट्स प्रस्तुत की थीं.

हालांकि, दोनों में कई गैरकानूनी कार्यों पर चिंता जताते हुए सिफारिश की गई कि पर्यावरण मंत्रालय को विस्तृत पूछताछ और आवश्यक कार्रवाई के लिए आकस्मिक मुद्दों पर एक नोट भेजा जाए.

समिति के अध्यक्ष चोपड़ा द्वारा पर्यावरण सचिव को लिखे पत्र में अनेक उल्लंघनों को सूचीबद्ध किया गया है.

समिति का कहना है कि परियोजना के कई कार्य बिना अधिकृत मंजूरी के किए गए, जिसमें परियोजना का काम और विभिन्न हिस्सों पर पेड़ों की कटाई 2017-18 के बाद से अवैध रूप से जारी है. इसके तहत 250 किमी से अधिक जोड़ने का काम हो रहा है.

समिति के मुताबिक, राज्य वन विभाग द्वारा सितंबर 2018 में जारी एक कार्य आदेश, न केवल कार्य शुरू होने के बाद दिया गया बल्कि वह कानूनी रूप से गलत भी था. इसके अलावा राज्य और परियोजना अधिकारियों दोनों को उल्लंघन की जानकारी थी.

8 फरवरी, 2018 को राज्य वन विभाग ने डेवलपर को लिखा था, ‘चार धाम परियोजना माननीय प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना से संबंधित है. परियोजना के महत्व को ध्यान में रखते हुए. ऊपर उद्धृत हिस्सों में पेड़ काटने लगभग पूरा हो गया है, भले ही सैद्धांतिक अनुमोदन की शर्तों का पालन किए बिना ऐसा करना एक स्पष्ट उल्लंघन है.’

नियमों के तहत एक रैखिक परियोजना को वन मंजूरी के लिए अपनी सैद्धांतिक मंजूरी में शर्तों को पूरा करने के बाद ही काम की अनुमति मिलती है. यह अनुमति एक वर्ष के लिए वैध होती है और संतोषजनक प्रगति रिपोर्ट के आधार इसे एक और वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है.

इस तरह के आदेश को सार्वजनिक किए जाने चाहिए। इसे वन (संरक्षण) अधिनियम और एनजीटी अधिनियम के तहत कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है.

समिति ने अपनी रिपोर्ट में पुरानी मंजूरी के दुरुपयोग का भी उल्लेख किया है. रिपोर्ट के अनुसार, 200 किमी सड़क को जोड़ने के लिए कई हिस्सों पर 2002-2012 के दौरान बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) को दी गई पुरानी मंजूरी के आधार पर काम शुरू किया गया.

इसके साथ ही राष्ट्रीय वनजीव बोर्ड (एनबीडब्ल्यूएल) से बचने के लिए झूठी घोषणाएं की गईं.

दरअसल पेड़ों और पहाड़ियों को काटते हुए और खुदाई की गई सामग्री निकालते हुए 200 किमी सड़क का निर्माण एनबीडब्ल्यूएल से बचकर किया गया और एनबीडब्ल्यू से बचने के लिए झूठ कहा गया कि ये हिस्से केदारनाथ वन्यजीव अभ्यारण्य, राजाजी राष्ट्रीय पार्क, फूलों की घाटी राष्ट्रीय पार्क आदि पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्रों में नहीं आते हैं.

रिपोर्ट में कहा गया कि कारण स्पष्ट  किए बिना वन मंजूरी के लिए आवेदन वापस लेने के बाद कम से कम 60 किमी तक जोड़ने वाले विभिन्न हिस्सों पर काम शुरू हुआ.

चोपड़ा ने लिखा, ‘अक्टूबर 2019 में एचपीसी की पहली यात्रा के दौरान इन परियोजनाओं पर काम शुरू नहीं हुआ था. लेकिन एचपीसी द्वारा सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को नया काम शुरू करने के बारे अपना नजरिया बताए जाने के बाद भी एचपीसी के बाद की यात्राओं के दौरान पेड़ काटने और पहाड़ी काटने के मामले देखे गए. यह बेशर्म उल्लंघन है, जैसे कि कानून का शासन मौजूद ही नहीं है.’

रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के उल्लंघन को भी बताया गया है. अप्रैल 2019 के उत्तराखंड सरकार के उस हलफनामे के बाद भी कम से कम 50 किमी की सड़क पर काम शुरू कर दिया गया था, जिसमें कहा गया था कि जिन हिस्सों पर पहले से काम शुरू नहीं हुआ है उन हिस्सों में सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अधीन काम शुरू होगा।

एचपीसी ने एमओआरटीएच से काम शुरू करने से पहले तेजी से पर्यावरण प्रभाव आकलन का अध्ययन करने को कहा था.

एमओआरटीएच ने एचपीसी के उस सर्वसम्मत नजरिए का भी उल्लंघन किया जिसमें कहा गया था कि डेवलपर को भूस्खलन से बचने के लिए यात्रा के मौसम से पहले नए काम शुरू नहीं करने चाहिए और कमजोर ढलान को दोबारा बनाना चाहिए.

इस पत्र के बारे में पूछे जाने पर पर्यावरण सचिव रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ने कहा कि वह चोपड़ा के पत्र से अवगत नहीं थे. उन्होंने कहा, ‘मैं उसे देखा नहीं है लेकिन अगर पर्यावरण मंत्रालय को ऐसा कोई पत्र प्राप्त हुआ है तो हम निश्चित तौर पर उसे देखेंगे.’

वहीं, चोपड़ा ने कहा कि मंत्रालय ने फिलहाल पत्र का संज्ञान नहीं लिया है. उन्होंने कहा, ‘मैंने 13 अगस्त को मंत्रालय के विभिन्न अधिकारियों को ईमेल किया था. चूंकि मंत्रालय तुरंत जवाब नहीं देता है तो मैं सोचा कि उन्हें दोबारा लिखने से पहले मैं उन्हें कुछ हफ्ते का समय दूं.’

इस बीच, फिलहाल पहाड़ी सड़क के लिए उचित चौड़ाई के मुद्दे पर 13 सदस्यी समिति की बहुमत समूह ने फिलहाल कोई फैसला नहीं लिया है.

बहुमत समूह के एक सदस्य ने कहा, ‘हां, हमने पर्यावरण मंत्रालय को भेजने के लिए एक पत्र लिखा था लेकिन फिर हमें एहसास हुआ कि हमें अपने नतीजे एमओआरटीएच को भेजने हैं. वैसे भी सभी उल्लंघन रिपोर्ट में दर्ज हैं. सुप्रीम कोर्ट को तय करने दीजिए.’

चोपड़ा ने कहा कि उन्होंने इसलिए पांच एचपीसी सदस्यों के अल्पसंख्यक मत के साथ जाने का फैसला किया क्योंकि एमओआरटीएच ने 2018 में एक परिपत्र जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि पहाड़ी इलाकों के लिए 5.5 मीटर सतह बनाया जाएगा.