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यूपी पुलिस द्वारा दर्ज मामले में पत्रकार सुप्रिया शर्मा को मिला गिरफ़्तारी से संरक्षण

बीते जून में न्यूज़ वेबसाइट ‘स्क्रोल’ की कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा के ख़िलाफ़ यूपी पुलिस ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) क़ानून और आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज़ किया था. इलाहबाद हाईकोर्ट ने उन्हें गिरफ़्तारी से संरक्षण देते हुए एफआईआर रद्द करने की उनकी याचिका को नामंज़ूर कर दिया है.

सुप्रिया शर्मा. (फोटो: साभार: ट्विटर)

सुप्रिया शर्मा. (फोटो: साभार: ट्विटर)

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में स्क्रोल डॉट इन की पत्रकार सुप्रिया शर्मा के खिलाफ कथित तौर पर तथ्यों और बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश करने के आरोप में दर्ज एफआईआर संबंधी मामले में उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ़्तारी से संरक्षण दिया है.

सुप्रिया इस वेबसाइट की कार्यकारी संपादक हैं. बीते जून महीने में उन्होंने अपनी एक रिपोर्ट ‘इन वाराणसी विलेज अडॉप्टेड बाय प्राइम मिनिस्टर नरेंद्र मोदी, पीपल वेंट हंगरी ड्यूरिंग लॉकडाउन’ (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गोद लिए वाराणसी के गांव में लोग लॉकडाउन के दौरान भूखे रहे) में डोमरी गांव के लोगों की स्थिति की जानकारी दी थी और गांव वालों के हवाले से बताया था कि लॉकडाउन के दौरान किस तरह से उनकी स्थिति और बिगड़ गई है.

वाराणसी जिले के रामनगर थाना क्षेत्र का डोमरी उन गांवों में से एक है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद लिया है.

सुप्रिया की रिपोर्ट को लेकर डोमरी गांव की निवासी माला देवी ने शिकायत दर्ज करवाई थी. उनका आरोप था कि सुप्रिया ने अपनी रिपोर्ट में गलत तरीके से बताया है कि कोरोना वायरस के कारण लागू लॉकडाउन के कारण आपातकालीन भोजन की व्यवस्था न होने से उनकी स्थिति और खराब हुई है.

इस शिकायत पर 13 जून को दर्ज एफआईआर में सुप्रिया शर्मा और समाचार पोर्टल के एडिटर-इन-चीफ के खिलाफ आईपीसी की धारा 269 (किसी बीमारी का संक्रमण फैलाने के लिए गैर जिम्मेदारी से किया गया काम, जिससे जीवन को खतरा हो) और धारा 501 (मानहानिकारक विषय का प्रकाशन) और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की दो धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया था.

स्क्रोल के मुताबिक, मंगलवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस मनोज मिश्रा और अनिल कुमार की पीठ ने कहा कि इस एफआईआर को ख़ारिज करने की याचिका को अभी स्वीकार नहीं किया जा सकता. साथ ही उन्होंने इस बारे में जांच जारी रखने का आदेश दिया है.

माला की शिकायत के बाद जारी बयान में वेबसाइट ने कहा था कि वे अपनी रिपोर्ट पर कायम हैं और उन्होंने माला के बयान को जैसा उन्होंने कहा था, हूबहू वैसा ही शामिल किया है.

सुप्रिया के वकील ने अदालत को बताया कि यह साबित करने के लिए उनके पास ऑडियो रिकॉर्डिंग भी है.

अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि याचिकाकर्ता ने उस इंटरव्यू की ऑडियो रिकॉर्डिंग की थी और उनके द्वारा किया गया (रिपोर्ट का) प्रकाशन इस इंटरव्यू में कही गई बातों का वास्तविक हिस्सा है और यह प्रकाशन उन लोगों की स्थितियों को दिखाने के लिए जनहित में किया गया था.’

अदालत ने बताया कि यह दिखाने की लिए कि इस व्यक्ति से संपर्क किया गया था, याचिकाकर्ता ने याचिका के साथ कुछ फोटोग्राफ भी सौंपे हैं.

आदेश में कहा गया, ‘इन परिस्थितियों में जब आरोप संज्ञेय अपराध होने का इशारा करते हैं, तब याचिकाकर्ता की एफआईआर को रद्द करने की गुजारिश को स्वीकार नहीं किया जा सकता. इसके बावजूद, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को मद्देनज़र रखते हुए, साथ ही याचिकाकर्ता का दावा कि इंटरव्यू की ऑडियो रिकॉर्डिंग भी है जिसके अंश प्रकाशित किए गए, हम यह भी आदेश देते हैं कि याचिकाकर्ता को तब तक गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए जब तक मामले की जांच मुकम्मल होने के बाद सीआरपीसी की धारा 173 (2) के तहत पुलिस रिपोर्ट जमा नहीं हो जाती.’

पीठ ने याचिकाकर्ता से यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़े तो संबद्ध अथॉरिटी के साथ ऑडियो रिकॉर्डिंग को साझा किया जाए.

जून में इस एफआईआर के दर्ज होने पर यूपी पुलिस की खासी आलोचना हुई थी. इस एफआईआर को कोविड-19 महामारी के दौरान पत्रकारों को उनका काम करने के लिए प्रताड़ित करने की दृष्टि से देखा गया था.

जून महीने में ही प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया था कि कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान बिगड़े हुए हालात पर रिपोर्ट करने के कारण कम से कम 55 पत्रकारों और संपादकों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ या उन्हें गिरफ्तार किया गया.

इस संबंध में उत्तर प्रदेश ने काफी तेजी दिखाई और पिछले कुछ महीनों में कई सारे ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां प्रशासन पर सवाल उठाने वाली खबरों के कारण पत्रकारों पर एफआईआर दर्ज की गई.