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श्रमिक संगठनों ने पेट्रोलियम मंत्री से बीपीसीएल के निजीकरण पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया

श्रमिक संगठनों ने सरकार के हवाई अड्डों के निजीकरण और भारतीय रेल खानपान एवं पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) में भी हिस्सेदारी बेचने के प्रस्ताव की आलोचना की है.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: मजदूर संघों ने बुधवार को एक बार फिर पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) के प्रस्तावित निजीकरण के फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया.

प्रधान को भेजे गए एक संयुक्त पत्र में श्रमिक संगठनों ने कहा है, ‘केंद्रीय श्रमिक संघों और महासंघों का संयुक्त मंच आपसे आग्रह करता है कि बीपीसीएल के निजीकरण के फैसले पर एक बार फिर से गंभीरता से विचार किया जाए और देश हित में इस उपक्रम का निजीकरण न किया जाए.’

पत्र में कहा गया है कि श्रमिक संगठनों और बीपीसीएल कर्मचारी संघों के विरोध के बावजूद सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के निजीकरण को आगे बढ़ा रही है.

इसमें कहा गया है कि बीपीसीएल संसद के कानून के जरिये बहुराष्ट्रीय पेट्रोलियम कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करके बनाया गया था. यह देश के पेट्रोलियम क्षेत्र को मजबूत बनाने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया था.

मजदूर संगठनों ने कहा है कि राष्ट्रीयकरण के बाद बीपीसीएल की क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश किया गया ताकि देश की जनता को पेट्रोल, डीजल, खाना पकाने की गैस और मिट्टी तेल की निर्बाध रूप से आपूर्ति की जा सके.

पत्र में कहा गया है कि बीपीसीएल ने पीएम केयर्स फंड में 125 करोड़ रुपये और स्टेच्यू ऑफ यूनिटी में 25 करोड़ रुपये का योगदान किया है.

इसमें कहा गया है कि कई तरह की अड़चनों के बावजूद बीपीसीएल लगातार बेहतर काम करती रही है और राष्ट्रीय खजाने में लाभांश, विशेष लाभांश और करों के जरिये योगदान करती रही है.

बता दें कि बीते साल नवंबर महीने में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बीपीसीएल में सरकार की पूरी 53.29 प्रतिशत हिस्सेदारी की बिक्री को मंजूरी दी है. सरकार का कहना था कि रणनीतिक विनिवेश से जो राशि प्राप्त होगी, उसका उपयोग सामाजिक योजनाओं के वित्त पोषण में किया जाएगा जिससे लोगों को लाभ होगा.

हालांकि इसके बाद अधिकारियों की यूनियन का कहना था कि 9 लाख करोड़ रुपये मूल्य की बेशकीमती कंपनी को कौड़ियों के दाम पर बेचा जा रहा है और कंपनी का निजीकरण करना देश के लिए आत्मघाती साबित होगा.

बीपीसीएल मुंबई (महाराष्ट्र), कोच्चि (केरल), बीना (मध्य प्रदेश), और नुमालीगढ़ (असम) में प्रतिवर्ष 38.3 मिलियन टन की संयुक्त क्षमता के साथ चार रिफाइनरियों का संचालन करती है, जो भारत की 249.8 मिलियन टन की कुल शोधन क्षमता का 15.3 प्रतिशत है.

देशभर में बीपीसीएल के लगभग 16,309 पेट्रोल पंप और 6,113 एलपीजी (तरलीकृत पेट्रोलियम गैस) वितरक एजेंसियां हैं. इसके अलावा 51 एलपीजी बॉटलिंग प्लांट हैं.

बीते जुलाई महीने में निजीकरण से पहले कंपनी ने अपने कर्मचारियों को वीआरएस देने की पेशकश की थी.

बीपीसीएल ने अपने कर्मचारियों को भेजे आंतरिक नोटिस में कहा था, ‘कंपनी ने वीआरएस की पेशकश करने का फैसला किया है. यह योजना उन कर्मचारियों के लिए है, जो विभिन्न व्यक्तिगत कारणों से कंपनी में सेवाएं जारी रखने की स्थिति में नहीं हैं. वे कर्मचारी वीआरएस के लिए आवेदन कर सकते हैं.’

बहरहाल बीपीसीएल के निजीकरण के खिलाफ धर्मेंद्र प्रधान को यह पत्र इंटक, एटक, एचएमएस, सीटू, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी, सेवा, एआईसीसीटीयू, एलपीए और यूटीयूसी इन दस केंद्रीय श्रमिक संगठनों ने संयुक्त मंच बनाकर सरकार को पत्र भेजा है.

देश में 12 केंद्रीय स्तर के मजदूर संगठन हैं. दो अन्य संगठन आरएसएस से संबद्ध भारतीय मजदूर संघ है और एक अन्य नेशनल फ्रंट आफ इंडियन ट्रेड यूनियंस है.

कुछ दिन पहले ही केंद्रीय श्रमिक संगठनों ने सरकार के हवाई अड्डों के निजीकरण और भारतीय रेल खानपान एवं पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) में हिस्सेदारी बेचने के प्रस्ताव की कड़ी आलोचना की थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)