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जनता संसद: विपक्षी एकजुटता के लिए राजनीतिक दलों ने साझा न्यूनतम कार्यक्रम का प्रस्ताव रखा

नागरिक अधिकार संगठनों के संगठित समूह ने एक हफ्ते तक डिजिटल जनता संसद में इस दौरान स्वास्थ्य सेवा का अधिकार, बिना आधार लिंक किए हुए सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सार्वभौमिकरण और मूलभूत आय जैसी मांगें उठाईं. इस सत्र में कार्यकर्ता मेधा पाटकर के साथ विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं ने भाग लिया.

जनता संसद. (फोटो ट्विटर/@_maadhyam)

जनता संसद. (फोटो ट्विटर/@_maadhyam)

नई दिल्ली: एक हफ्ते तक चलने वाला डिजिटल जनता संसद 26 अगस्त को समाप्त हो गया और इस दौरान विपक्षी नेताओं ने बड़े स्तर पर एकजुटता बढ़ाने के लिए सत्र के दौरान तैयार किए गए प्रस्तावों के आधार पर साझा न्यूनतम कार्यक्रम (सीएमपी) तैयार करने का प्रस्ताव रखा.

रिपोर्ट के अनुसार, इस सत्र के दौरान स्वास्थ्य सेवा का अधिकार, बिना आधार लिंक किए हुए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का सार्वभौमिकरण और मूलभूत आय जैसी मांगें भी उठाई गईं.

जनता संसद पहल की वेबसाइट के अनुसार, सत्र का आयोजन कोविड-19 से संबंधित नीतिगत मुद्दों को लेकर किया गया.

नागरिक अधिकार संगठनों के संगठित समूह जन सरोकार ने इस जनता संसद का आयोजन किया था. आयोजकों ने कहा कि दुनिया भर में कई देशों में सांसदों को ऑनलाइन बुलाने और सत्र आयोजित करने के साथ-साथ समिति की बैठकें आयोजित करने की व्यवस्था की गई थीं.

उन्होंने कहा, ‘भारत में अब तक ऐसा नहीं किया गया, हालांकि इस पर पिछले कुछ समय से चर्चा चल रही है. संसद का मानसून सत्र जुलाई के मध्य तक शुरू हो जाना चाहिए था. कोविड महामारी के दौरान संसद के सत्र में न होने के कारण प्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने वाले मंच को लेकर ही संकट खड़ा हो गया है.’

चर्चा के समापन के बाद विपक्षी दलों के विभिन्न नेताओं ने पहल की प्रशंसा की और कहा कि वे सत्रों के दौरान उठे विचारों पर काम करेंगे.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हुए के. राजू ने पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) और कृषि में अध्यादेशों को लेकर अपनी पार्टी के विरोध के बारे में बताया और प्रस्तावित किया कि नागरिक समाज के सदस्य इन मुद्दों की वकालत करने के लिए सांसदों से व्यक्तिगत तौर पर मुलाकात करें.

राजू ने कहा, ‘आर्थिक सुस्ती और कोविड-19 से गरीब सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं. कांग्रेस शुरुआत से ही मांग कर रही है कि सार्वभौमिक मूलभूत आय के रूप में गरीबों के हाथ में पैसा दे. यह सबसे जरूरी संगठित मांग है.’

आयोजकों द्वारा जारी प्रेस रिलीज के अनुसार, माकपा नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि लॉकडाउन के बाद संसद सत्र आयोजित नहीं किए जाने के कारण जनता संसद एक उपयोगी कवायद थी.

येचुरी ने हाल में नागरिक स्वतंत्रता, भोजन के अधिकार और सूचना पर हालिया हमलों की भी निंदा की और कहा कि एक पार्टी या एक आंदोलन से साझा न्यूनतम कार्यक्रम सफल नहीं हो पाएगा.

उन्होंने कहा कि हमें संसद और संसद के बाहर इन मुद्दों को उठाने के लिए एक संयुक्त कार्य योजना बनाने की आवश्यकता है.

राजद नेता मनोज झा ने कहा कि संसद और लोगों के संसद के बीच एक पुल बनाने के लिए एक रणनीति बनाई जानी चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि एक आम एजेंडा बिहार में आगामी चुनावों में उनकी पार्टी के लिए उपयोगी होगा.

भाकपा के राष्ट्रीय महासचिव डी. राजा ने कहा, ‘मौजूदा सरकार द्वारा संसद को दरकिनार कर दिया गया है. अब समय की जरूरत है कि संसद और उसके बाद पार्टियां और सामाजिक आंदोलन एक साथ मिलकर काम करें.’

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार सेल, कोल और रेलवे जैसी विभिन्न राष्ट्रीय संपत्तियों से विनिवेश करने के अपने फैसले पर सवाल उठने से बचने के लिए जानबूझकर संसद सत्र का आयोजन नहीं कर रहा है.

सिंह ने भाजपा शासित राज्य सरकारों द्वारा कोविड-19 महामारी से निपटने की आलोचना की और उत्तर प्रदेश का उदाहरण दिया, जहां उन्होंने कहा कि कोविड-19 के कारण दो कैबिनेट मंत्रियों का निधन हो गया.

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ऐसे असाधारण समय के दौरान लोगों को पर्याप्त राहत देने में विफल रही है.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, संगठन के एक संयोजन और ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन’ के सदस्य निखिल डे ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण प्रगति है कि वाम और कांग्रेस दोनों ने कहा कि एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम की आवश्यकता है. इस जनता संसद के साथ यह सवाल भी उठता है कि यदि हम में से बहुत से लोग ऐसा कर सकते हैं, तो वास्तविक संसद क्यों आयोजित नहीं हो सकती है? इन प्रस्तावों पर संसद में चर्चा हो यह सुनिश्चित करने के लिए अब हम आयोजन में भाग लेने वाले दलों के साथ काम करेंगे.

कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने इन मुद्दों को संसद में लाने के लिए सांसदों से आग्रह करके सत्र का समापन किया. उन्होंने कहा कि नागरिक समाज एकजुटता के साथ रैली करेंगे और एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर काम करेंगे लेकिन एक साझा अधिकतम एजेंडा भी खोजेंगे.

उन्होंने प्रशांत भूषण के मामले का हवाला देते हुए देश की अन्य घटनाओं और न्यायपालिका जैसी स्वतंत्र संस्थाओं के बारे में भी चिंता व्यक्त की.

संविधान की प्रस्तावना को पढ़ने और 43 घंटों की चर्चा के बाद सत्र स्थगित कर दिया गया. कोविड-19 के दौरान जनता संसद में पेश किए गए नीतिगत प्रस्तावों को यहां देखा जा सकता है.

कार्यक्रम में भाग लेने वाले संगठनों में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, मजदूर किसान शक्ति संगठन, माध्यम, जन स्वास्थ्य अभियान, विकल्प संगम और अखिल भारतीय किसान सभा शामिल हैं.