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फाइनल वर्ष की परीक्षा कराने के यूजीसी के फ़ैसले में कुछ भी अनुचित या मनमाना नहीं: सुप्रीम कोर्ट

यूजीसी के 30 सितंबर तक विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के अंतिम साल की परीक्षाएं कराने के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है. साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राज्य आपदा प्रबंधन क़ानून के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल कर इसे आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो उन्हें आयोग के सामने आवेदन करने की छूट है.

(फोटो: पीटीआई)

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को अंतिम साल की परीक्षाएं 30 सितंबर तक कराने का विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का निर्देश उसके अधिकार क्षेत्र में है और इन परीक्षाओं में प्रदर्शन छात्रों की क्षमता को प्रतिबिंबित करता है.

शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य और विश्वविद्यालय 30 सितंबर तक अंतिम वर्ष/अंतिम सेमेस्टर की परीक्षाएं आयोजित किए बगैर छात्रों को प्रोन्नत नहीं कर सकते.

न्यायालय ने कहा कि अंतिम परीक्षा या सेमेस्टर परीक्षा आयोजित करने संबंधी यूजीसी के परिवर्तित निर्देशों और पहले के वर्षों के लिए परीक्षाएं न लेने के विकल्प का तर्कसंगत आधार है और इसे छात्रों के बीच भेदभाव वाला नहीं कहा जा सकता.

जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने कहा कि राज्य सरकारें और राज्य आपदा प्रबंधन अधिकरण को आपदा प्रबंधन कानून, 2005 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करके अंतिम वर्ष की परीक्षा के बगैर ही छात्रों को उनके पहले के वर्षों के प्रदर्शन के आधार पर प्रोन्नत करने का निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है.

पीठ ने कहा कि अंतिम वर्ष की परीक्षा छात्रों के लिए अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन करने का अवसर है जो उनके भावी शैक्षणिक और रोजगार के क्षेत्र में उपयोगी होगा.

पीठ ने कहा, ‘अंतिम वर्ष या अंतिम सेमेस्टर की परीक्षाएं महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सीखने की प्रक्रिया ऐसा संवाद है जो छात्रों के ज्ञान के बारे में जानकारी प्राप्त करने और उसके आकलन का प्रमाण है.’

पीठ ने कहा कि यदि किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश ने आपदा प्रबंधन कानून के तहत अधिकारों का इस्तेमाल करके 30 सितंबर तक अंतिम साल की परीक्षाएं कराना संभव नहीं होने जैसा निर्णय लिया है, तो हम उन्हें परीक्षा की तारीख 30 सितंबर से आगे बढ़ाने के लिए यूजीसी के समक्ष आवेदन करने की छूट प्रदान करते हैं, जिन पर आयोग विचार करेगा और जल्द से जल्द परिवर्तित तारीख के बारे में ऐसे राज्य या केंद्र शासित प्रदेश को सूचित करेगा.

पीठ ने अपने 160 पन्नों के फैसले में यूजीसी की तीन जुलाई, 2020 के दिशा निर्देशों पर विस्तार से चर्चा की है.

पीठ ने कहा कि उसे यूजीसी के छह जुलाई, 2020 के परिवर्तित दिशानिर्देशों में कुछ भी अनुचित या मनमाना नजर नहीं आया है और ये दिशानिर्देश उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं हैं.

पीठ ने कहा कि छह जुलाई के दिशा निर्देश 29 अप्रैल के निर्देशों का ही हिस्सा हैं और वे पहले जारी किए गए निर्देशों के खिलाफ नहीं हैं. पीठ ने इसके साथ ही शिव सेना की युवा शाखा युवा सेना सहित छात्रों और निजी संगठनों की याचिकाओं का निस्तारण कर दिया.

बता दें कि बीते तीन जुलाई को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने सभी संस्थानों को सितंबर के अंत तक टर्मिनल सेमेस्टर या अंतिम वर्ष की परीक्षाएं आयोजित कराने की सलाह दी थी, जिसका कुछ राज्यों ने विरोध किया था.

वहीं. कांग्रेस ने कई शीर्ष नेताओं के साथ मिलकर एक सोशल मीडिया अभियान शुरू किया था, जिसके तहत वीडियो संदेशों के जरिये यूजीसी की आलोचना कर परीक्षाएं आयोजित कराने के उनके फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा गया था.

इसके बाद मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा था कि अंतिम वर्ष की परीक्षाओं को लेकर यूजीसी के दिशानिर्देश राज्यों के लिए बाध्यकारी हैं. हालांकि चार राज्यों ने इसके विरोध में केंद्र सरकार को पत्र लिखा है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)