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सुशांत मामला: मीडिया की मर्दवादी सोच के साथ कोर्टरूम में बदलते न्यूज़रूम

अगर आने वाले समय में रिया बेक़सूर साबित हो गईं, तब क्या मीडिया उनका खोया हुआ सम्मान और मानसिक शांति उन्हें वापस दे पाएगा?

अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती. (फोटो: पीटीआई)

अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती. (फोटो: पीटीआई)

औरतें रोती जाती हैं, मरद मारते जाते हैं
औरतें रोती हैं, मरद और मारते हैं
औरतें ख़ूब ज़ोर से रोती हैं
मरद इतनी जोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं

इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी रही हो मेरी मां रही होगी,
मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी
और यह मैं नहीं होने दूंगा

रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की लिखी इन लाइनों का मतलब आज भी वैसा ही है. मर्दवादी समाज महिलाओं को हमेशा से कमजोर समझता आया है, जिसका साक्ष्य मौजूद है हमारे धर्मग्रंथों, इतिहास और साहित्य में.

महिलाएं रोती हैं, महिलाएं खर्चीली होती हैं, महिलाएं एक दूसरे से जलती हैंं, चुगली करती हैं, गप्पे मारने में माहिर होती हैं आदि-आदि तरह के जजमेंट सोशल मीडिया पर खूब फैलाए जाते हैं.

महिलाओं के बारे में मर्द अमूमन पहले से ही अपनी राय बना लेते हैं. ऐसा मर्द इसलिए करते हैं क्योंकि उनकी मर्दवादी सत्ता बरकरार रहे. इसकी एक बानगी फैलाए गए इस गंद से समझा जा सकता है.

मैंने कई जगह सुना है, ‘त्रिया चरित्रं… देवो न जानाति कुतो मनुष्यः’ यानी महिलाओं के चरित्र के बारे में देवता भी नहीं जानते हैं.

आप उस समाज से क्या उम्मीद करेंगे, जिसने महिलाओं पर दोयम दर्जे के ग्रंथ, साहित्य और कहावतें लिखीं. दुख इस बात का है कि 21वीं सदी में यह आज भी बदस्तूर जारी है.

हां, मैं जानती हूं कि ये लेख पढ़कर थोड़ा और जजमेंटल हो सकते हैं. मुझे भला-बुरा भी सुना सकते हैं क्योंकि इस समाज और परिवेश ने आपको यही सिखाया है.

हमें बचपन से यह सिखाया जाता है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है. यहां अभिव्यक्ति की पूरी आजादी है और हर एक व्यक्ति को एक समान अधिकार मिले हुए हैं.

अगर कोई किसी अपराध या जुर्म में आरोपी पाया जाता है, तो भी वह तब तक दोषी नहीं कहला सकता, जब तक उस पर लगे आरोप साबित नहीं हो जाते.

लेकिन भारतीय मीडिया इसे गलत साबित करने में लगा हुआ है. कुछ मामलों में वो पहले ही आरोपी को दोषी मान लेता है और उसका हाल बद से बदतर कर देता है.

और ज्यादातर ऐसे मामलों में मीडिया का टारगेट होते हैं मुस्लिम, महिलाएं और दलित. हमारे आसपास लिंचिंग करने वाली भीड़ बनाई जा रही है, जिसमें आग में घी डालने का काम हमारा मेनस्ट्रीम मीडिया बखूबी कर रहा है.

अभी सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद रिया चक्रवर्ती पर एक से एक आरोप मीडिया द्वारा लगाए जा रहे हैं. सबसे ताज्जुब की बात ये है कि देश का मीडिया एक दूसरे से आगे बढ़ने के लिए एक महिला पर लगातार हल्ला बोल रहा है, जितना हो सके उसके सम्मान और निजता के साथ खेल रहा है.

वे भूल गए हैं कि रिया चक्रवर्ती ने अगर कोई जुर्म किया भी है तो वो एक आरोपी से पहले एक महिला है. इसी कारण हमारे देश की 50 फीसदी आबादी आज भी हाशिये पर नज़र आती है.

अगर कल को रिया बेकसूर साबित हो गईं, तो क्या उनका खोया हुआ सम्मान और जिस तरह से उन्हें मानसिक प्रताड़ित किया जा रहा है, वो यह मीडिया वापस दे पाएगा!

सोशल मीडिया पर रिया की कई आपत्तिजनक तस्वीरें साझा हो रही है, तो कोई बेवफ़ा कहकर भद्दी-भद्दी टिप्पणी कर रहा है और उन पर मीम बनाए जा रहे हैं.

आपको शायद याद होगा कि नोटबंदी के आसपास एक मीम बहुत चला था- ‘सोनम बेवफ़ा है.’ बे-वफ़ा यानी जो अपने रिश्ते के प्रति ईमानदार न हो. और ईमानदारी का सारा भार तो महिलाओं ने उठा रखा है, चाहे उस रिश्ते में शामिल पुरुष कुछ भी करें.

लेकिन एक भीड़ ही थी, जिसने सोनम की तरह न जाने कितनी महिलाओं को बेवफ़ा ही नहीं बल्कि पता नहीं क्या-क्या बना दिया था. वैसे ही एक बार फिर इस भीड़ को मौका मिल गया है रिया के नाम पर.

रिया ने कोई गलती की है या नहीं ये तो कानून ही बता पाएगा. लेकिन हमारे समाज की इस भीड़ ने फिर एक बार एक महिला पर अपना फैसला सुना दिया है.

अदालत का फैसला आने से पहले ही इस भीड़ ने तय कर लिया है कि रिया दोषी हैं और सुशांत की मौत की मुख्य जिम्मेदार रिया ही हैं.

सुशांत के मामले में रिया का अभूतपूर्व मीडिया ट्रायल चल रहा है. लोगों का गुस्सा देखकर लग रहा है जैसे अगर रिया उनके सामने हो तो वो उसे जिंदा भी जला देंगे!

खैर, यह समाज महिलाओं को जिंदा जलाने में कभी पीछे नहीं रहा. चाहे सती प्रथा हो या रेप के बाद महिला को जला देना हो, इस समाज ने आधी आबादी को हमेशा गुलाम बनाकर रखना चाहा है.

वर्तमान समय में जो हो रहा है इस सबके पीछे कोई और नहीं बल्कि हमारे देश का मीडिया कसूरवार है, जिन्होंने न्यूज़रूम को कोर्टरूम बना दिया है.

किसे क्या फैसला देना है हमारे देश का कानून नहीं बल्कि अब मीडिया तय कर रहा है. आपको क्या लगता है कि ये सब सुशांत के लिए सहानुभूति के कारण हो रहा है!

अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो सच मानिए आप बिल्कुल गलत सोच रहे हैं क्योंकि ये सुशांत के लिए सहानुभूति नहीं बल्कि राजनीति का एक हिस्सा है.

यह सहानुभूति तब कहां गई थी, जब देश के करोड़ों गरीब-मजदूर सबकुछ छोड़कर अपने घर पैदल निकल पड़े थे.

बता दूं कि बिहार में इसी साल चुनाव होने हैं. सुशांत बिहार से ही ताल्लुक रखते थे. सुशांत के लिए सभी के दिल में एक सॉफ्ट कॉर्नर है और बिहार के लोगों के प्रति संवेदनाएं दिखाने का मीडिया को एक अच्छा बहाना मिल गया है.

ऐसे में वे ये भूल गए हैं कि अभी कुछ दिन पहले ही इसी राज्य के सबसे ज्यादा मजदूर देश के अलग-अलग हिस्सों से जैसे तैसे बिहार लौटे हैं.

जब कोरोना महामारी का असर उनकी मजदूरी पर पड़ा, तब वे पैदल ही अपने घर की ओर निकल लिए. भूखे-प्यासे, पैदल ही एक लंबा सफर तय किया.

महिलाएं सड़कों पर बच्चे को जन्म दे रही थीं, और फिर कुछ देर बाद ही चल पड़ी अपनी मंजिल का सफर पूरा करने के लिए.

ज्योति नामक दलित लड़की हरियाणा से बिहार साइकिल पर अपने बीमार पिता को बैठाकर निकल पड़ती हैं, लेकिन मीडिया ने यह सवाल नहीं उठाया कि ज्योति को क्यों इतना लंबा सफर साइकिल से तय करना पड़ा!

तब इसी मीडिया को न बिहार से प्यार था न बिहारवासियों से.

सुशांत मामले में उन्होंने जिस तरह से रिया की मीडिया लिंचिग करनी शुरू की है उस पर आज नहीं तो कल उन्हें खुद शर्म आएगी.

वे आज अपने चैनल को टीआरपी में टॉप पर पहुंचाना चाहते हैं. चाहे ऐसे में किसी को अपनी जान ही क्यों ना खोनी पड़े, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता!

राजदीप सरदेसाई को इंटरव्यू देते समय रिया कहती हैं, ‘मैं तो बोलती हूं कि एक बंदूक लाओ, फैमिली लाइन में खड़ी हो जाएगी और हमें गोली मारकर उड़ा दो. नहीं तो हम ही सुसाइड कर लेते हैं.’

रिया अपने इंटरव्यू में ये भी कहती हैं कि उन्हें आत्महत्या करने के ख्याल आने लगे हैं, अगर उन्होंने कुछ कर लिया तो इसका जिम्मेदार कौन होगा!

वे जान गई हैं कि जनता ने उन्हें एक ही तराजू में तौल दिया है. मीडिया इस पर फैसले सुना रहा है. आज जो भी सुशांत को पसंद करता है या उनकी तारीफ़ में चंद शब्द कहता है, तो वो रिया को भी खरी-खोटी सुनाने में पीछे नहीं हटता.

क्या ऐसा पहली बार है! नहीं. महिला का चीरहरण हमेशा से किया जाता रहा है. एक मर्दवादी समाज में ये बहुत आसान है क्योंकि उनके लिए महिलाएं हमेशा से कमजोर रही हैं.

अगर वे अपने मन का कुछ कर लेती हैं तो उन्हें समाज में पूरी तरह से बेइज्जत किया जाता है. हमारे हिंदू धर्म के ग्रंथों में भी ऐसा देखा गया है.

महाभारत में द्रौपदी के साथ हुए दुर्व्यवहार से हमारा समाज अच्छे से वाकिफ़ है. इसी तरह मनुस्मृति में भी महिलाओं को दोयम दर्ज़े का समझा गया है.

मनुस्मृति के अनुसार, एक महिला को दिन में दासी और रात को रंभा बनकर रहना चाहिए.

मनुस्मृति के पांचवे अध्याय में बताया गया है कि एक लड़की को हमेशा अपने पिता के संरक्षण में रहना चाहिए. शादी के बाद उसका पति उसका संरक्षक होना चाहिए. यदि पति की मृत्यु हो जाती है तो उसे अपने बच्चों पर आश्रित होना चाहिए. किसी भी स्थिति में महिला को आज़ाद नहीं छोड़ा जा सकता.

मनुस्मृति में बताया गया है कि एक महिला को पुरुष के बराबर अधिकार नहीं है. इसमें कहा गया है कि किसी भी महिला का कल्याण तभी हो सकता है, जब एक पुरुष का कल्याण हो.

एक महिला को किसी भी तरह के धार्मिक अधिकार नहीं हैं. वह अपने पति की सेवा करके स्वर्ग प्राप्त कर सकती है.

ये धार्मिक ग्रंथ ही बताते हैं कि महिलाएं अपने दम पर कुछ नहीं कर सकती. जिस महिला ने अपने दम पर कुछ किया या गलती से किसी पुरुष के साथ अपनी मर्जी से जीवन व्यतीत कर लिया, तो उसे समाज में बहुत कुछ झेलना पड़ सकता है.

एक तरफ हमारा समाज सुशांत के लिए आज भी दुआएं कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ उनकी महिला मित्र के लिए भद्दी-भद्दी टिप्पणियां कर रहा है.

मीडिया किसी के प्रति जहर उगल रहा है तो हमारा समाज उसका बहिष्कार करने के बजाय उस जहर को स्वीकार किए जा रहा है.

एनसीआरबी के अनुसार महिलाओं के खिलाफ़ अपराध हर साल बढ़ रहे हैं, लेकिन ये आंकड़ा हमारे समाज को झकझोरने के लिए काफी नहीं है क्योंकि यह अब सब सामान्य नॉर्मल  बना दिया गया है.

सुशांत के साथ गलत हुआ है ये हम सब जानते हैं और हम सभी उसके लिए इंसाफ़ की फ़रियाद भी करते हैं. लेकिन उन्हें इंसाफ़ दिलाते-दिलाते हम कहीं किसी और के साथ नाइंसाफ़ी न कर बैठें.

अगर ऐसा हुआ तो शायद खुद सुशांत भी किसी को माफ़ नहीं करेंगे. अपनी बात रखने का अधिकार हम सभी को है. चाहे वो कितना भी बड़ा अपराधी ही क्यों न हो.

रिया की बात सुने बिना ही हमारी मीडिया और एक वर्ग ने तो अपना फैसला सुना ही दिया है, फिर अब उनके पक्ष से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता. ले

किन आज भी ये देश संविधान से ही चलता है इसलिए जब तक कोई अपराध साबित नहीं हो जाता या कानून की नज़र में वो दोषी नहीं पाया जाता तब तक वो आरोपी ही बना रहेगा, दोषी नहीं.

सोचिए अगर ये देश वाकई में मनुस्मृति के हिसाब से चलता तो! तो अब तक शायद बीच चौराहे पर रिया को लटका दिया गया होता!

या इससे भी बुरा किया जा सकता था, जिसकी मात्र कल्पना करने से भी रूह कांप जाए. अगर यह सब अब नहीं रुका तो हमारी आने वाली पीढ़ी को इसका बहुत बड़ा ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.

…और आख़िर में, जो लोग रिया की मीडिया लिंचिंग करने से खुश हैं वे एक बार अपने घर की महिलाओं की तरफ़ जरूर नज़र डालें कि उनके घर की महिलाएं किस हालत में रह रही हैं!

कहीं यही समाज उन्हें दूसरी, तीसरी,चौथी रिया तो नहीं समझ रहा, जिसने किसी की नजर में गलत किया हो क्योंकि उनकी नज़र में महिलाएं कभी सही नहीं होती!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)