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नंदकिशोर नवल: शेष है साहित्य ही

मेरा जीवन क्षणिक है, मैं इस अनंत में एक कण हूं लेकिन मैं हूं और मेरे होने का अर्थ है, अपने बारे में यह नवलजी का विश्वास था और इसका प्रमाण वे तमाम प्रकाशित और अप्रकाशित कृतियां हैं, जिनमें वे जीवित हैं.

नंदकिशोर नवल.

नंदकिशोर नवल. (फोटो: कबीर)

हर साल की तरह आज 2 सितंबर को शाम में पटना के राजप्रिया अपार्टमेंट में लेखकों का जमघट न होगा. वजह कोरोना वायरस का भय नहीं, उसका न रह जाना है जो अपने मित्रों की बाट जोहता था इस शाम.

आलोचक नंदकिशोर नवल अपना जन्मदिन अपने मित्रों के साथ अवश्य मनाते थे. यह आत्मीय आयोजन ही था. हंसी-ठट्ठा, गपशप, मिठाइयां, समोसे-कचौड़ी, और हां ! साहित्य.

यह पहला जन्मदिन है जो नवलजी की अनुपस्थिति में याद किया जाएगा. उनकी जीवन संगिनी रागिनी शर्मा आज उस महफ़िल को याद करते गुजारेंगी.

यह कुछ लोगों के लिए ताज्जुब की बात हो सकती है कि इस महफ़िल में और इस तरह की जाने कितनी महफ़िलों में इकट्ठा होने वालों में ज़्यादातर नवलजी से काफी कम उम्र के हुआ करते थे.

वयस जनित संकोच को नवलजी ने कभी युवतर लेखकों और अपने बीच नहीं आने दिया. छात्रों को भी इस कारण उनसे अपनी बात कहने में रुकावट महसूस हुई हो, याद नहीं.

पटना हिंदी साहित्य का एक केंद्र रहा है. नवलजी के रहने से उसका एक खास महत्त्व था. उनके न रहने के बाद भी अरुण कमल, आलोक धन्वा आदि है लेकिन नवलजी के कारण पटना की जो केंद्रीयता थी हिंदी साहित्य में, वह अवश्य ही अब वैसी न रही.

साहित्य के अलावा नाटक में भी उनकी रुचि गहरी थी. 1981 में पटना इप्टा के पुनर्गठन के बाद शायद ही उसका कोई नाटक या प्रस्तुति हो जो उनसे छूटी हो.

वे दूसरे रंगसमूहों के नाटक के दर्शक भी थे. ‘कला संगम’ के सतीश आनंद हों या ‘अनागत’ के नरेन्द्रनाथ पांडेय, उनके नाटक भी उन्होंने खूब देखे.

नवलजी का रानीघाट वाला सीढ़ीदार मकान शाम को हम नौजवानों का अड्डा हुआ करता था. वह ‘हम लोग’, ‘बुनियाद’, ‘नुक्कड़’, ‘भारत एक खोज’, ‘भारत की छाप’ और ‘तमस’ का ज़माना था.

टेलीविज़न नवलजी के यहां ही था. रात के दस बजे तक हम सीरियल देखकर, जाने कितनी चाय पीकर ही वहां से टलते थे. नवलजी की संगिनी रागिनी शर्मा कभी हमसे विरक्त हुई हों, याद नहीं!

ज्यादा दिन नहीं हुए, पटना, बनारस, लखनऊ, भोपाल, इलाहाबाद आदि के बिना हिंदी साहित्य की दुनिया नहीं बनती थी. उस पर दिल्ली का वैसा कब्जा न हुआ था जो अब है.

नवलजी सिर्फ पटना नहीं, हाजीपुर या वैशाली जैसे कस्बे से अपना रिश्ता जोड़े रहे. वहां के युवा रचनाकारों को ‘जनपद’ पत्रिका निकालने में सहयोग किया, उनके साथ मिलकर किताब संपादित ही नहीं की, उनकी रचनाओं के साथ अपनी रचनाओं को किताब की शक्ल में छपवाया भी.

साहित्य स्थानीय सहकारिता या मित्रता को अगर नहीं गढ़ सके तो वह विश्व मैत्री कैसे कर पाएगा! युवा रचनाकारों में ईमानदार दिलचस्पी और उन्हें लिखने को उत्साहित करते रहना आलोचना लिखने के अलावा आलोचक का एक काम है, यह नवलजी बखूबी जानते थे.

इसलिए यह उनका अभ्यास था कि जिसमें थोड़ी भी चिंगारी देखें, उसे एक पोस्टकार्ड ज़रूर लिखें.


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साहित्य ही नवलजी का घर था या संसार और उसका पसार बहुत था. लेकिन उसमें भी उन्होंने अपना मोर्चा तय कर रखा था. वह कविता का था.

हिंदी साहित्य के सूर्यों के ताप से तपे उनके शरीर से उनके ही शब्दों में कविता की गंध आती थी. नवलजी प्रायः कहा करते थे कि आप सच्चे साहित्यिक को उसके शरीर से आने वाली साहित्य-गंध से ही महसूस कर सकते हैं.

हिंदी की दीर्घ साहित्यिक परंपरा में वे हमेशा खुद को एक नौसिखुआ कहते रहे. इस पर हमें आश्चर्य होता था और एकाध बार लगा भी कि वे अतिशय विनम्र हो रहे हैं लेकिन यह मिथ्या विनम्रता न थी.

नवलजी कहते थे कि हिंदी साहित्य की दुनिया में पांव धरते हुए हमेशा याद रखना चाहिए कि इसकी धरती भारतेंदु, महावीर प्रसाद द्विवेदी, हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त, निराला, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, उग्र, अज्ञेय, जैनेंद्र, मुक्तिबोध के पसीने से सिंचित है.

लिखना, हिंदी लिखना और साहित्य रचना इन्हें याद करना तो है ही, इनके प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना भी है.

इस विस्तार और अगाधता के बोध का परिणाम लेकिन जड़ता न हो, यह वे चेताते रहे. इसलिए लिखना रोजाना का काम हो.

प्रेमचंद को जाने उन्होंने कितनी बार याद किया होगा, जिस दिन मैं न लिखूं, उस दिन रोटी खाने का हक मुझे नहीं. ‘परफेक्शन’ मकसद होना चाहिए, लेकिन वह ‘फेटिश’ न हो जाए, यह उनसे अक्सर सुना.

आप किसी भी विषय को आख़िरी तौर पर समाप्त नहीं कर रहे हैं. आप कितने ही विस्तार से लिखें और कितनी ही गहराई में डुबकी लगाएं, हर लेखक और विषय में कुछ बचा रह जाएगा जिसे कोई और निगाह देखेगी.

‘परफेक्शन’ को इसलिए अपने आलस्य का बहाना नहीं बना लेना चाहिए. लिखना, लेकिन सलीके से. और सावधानी भी. यह चेतावनी सिर्फ लिखने के मामले में न थी.

मेजपोश के सारे कोने एक सीध में हों, मंच के पीछे लगा हुआ बैनर आड़ा-तिरछा न हो, इसके लिए वे ख़ासा वक्त लगा सकते थे.

‘जो दो वाक्य सुंदर लिख नहीं सकते, वे सुंदर समाज क्या बनाएंगे,’ नामवरजी की इस उक्ति को जाने कितनी बार उनसे सुना होगा. वैसे ही कायदे से प्रूफ देखना भी लेखक का काम है.

पटना के वैशाली प्रेस में ‘धरातल’, फिर ‘उत्तरशती’ और ‘धारा’ के अंक निकालते हुए गेली प्रूफ से लेकर मशीन प्रूफ तक में आंख गड़ाए रखने का जीवट हमने उनसे सीखा. अब तो अंदाज से प्रूफ देखा जाता है. प्रूफ के चिह्नों की शिक्षा भी हम जैसों को उनसे मिली.

गोष्ठी, सेमिनार, यह सब भी और इनके आयोजन में उन्हें ख़ासा मज़ा आता था, लेकिन ठीहा तो वह मेज थी जिस पर उन्हें लौटना ही था.

वह सच्चा आलोचक नहीं, जो अपने वक्त की रचनाशीलता से दो-चार न हो. उससे सुरक्षित दूरी बनाकर बाकी जो हो, आलोचना नहीं हो सकती. इसी वजह से नवलजी ने समीक्षाएं बहुत लिखीं और अंत-अंत तक लिखते रहे.

समीक्षा में और आलोचना में भी आप जितना दूसरे को अनावृत्त करते हैं उससे कहीं अधिक खुद को. जिसमें यह साहस नहीं है, वह आलोचना न करे.

निष्कवच जो नहीं हो सकता उसे आलोचना के क्षेत्र में नहीं उतरना चाहिए. यह मित्र बनाने का इलाका नहीं है. और आलोचक को यह भी बताना चाहिए कि यह रचना या रचनाकार उसे प्रिय तो है, लेकिन वह श्रेष्ठ हो, ज़रूरी नहीं.

श्रेष्ठता के मानक बनाना उसका धर्म है, भले ही आगे वे ध्वस्त कर दिए जाएं. इसे दूसरे शब्दों में साहित्य-विवेक कहते हैं.

आलोचना में एक समय आया, जब सिद्धांत निरूपण ने रचना को पढ़ने की प्राथमिकता को काफी लज्जित किया. पश्चिम से आई यह आंधी वहां छंटी, तो साहित्य का आकाश दृश्यमान हुआ.

नवलजी को अपने कर्त्तव्य को लेकर उलझन न थी. वे सिद्धांत या थियरी के फेरे में कभी नहीं पड़े. आलोचना का जीवन स्रोत रचना ही है. उसकी उपेक्षा करके वह जीवित नहीं रह सकती.

अगर साहित्य आपको अपनी ओर नहीं खींचता, अगर वह माध्यम या साधन मात्र है आपके लिए, तो आप आलोचक नहीं कुछ और भले हों.

नंदकिशोर नवल ने अपनी रुचि नहीं छिपाई और श्रेष्ठता के अपने मानक भी गढ़े. लेखकों का मूल्यांकन किया. एक से अधिक बार अपनी राय बदली. पिछली राय और आज की राय में सुसंगति हो ही, यह कतई ज़रूरी नहीं.

मूल्यों को लेकर भ्रम नहीं होना चाहिए और खोज की प्रवृत्ति बनी रहनी चाहिए. आलोचना भी रचना की तरह सत्य का संधान है. उसमें किसी अहंकार का स्थान नहीं. नवलजी की आंखें कविता-पकी थीं, वे कवि- हृदय थे और खुद कवि भी थे.

एक कविता संकलन में उन्होंने अपने बारे में लिखा, ‘मैं प्रकृति से रूमानी हूं, इसलिए मुझे सबसे ज़्यादा प्रकृति और प्रेम संवेदित करते हैं. स्वभावतः कविताओं में जो ‘सामाजिक यथार्थ’ खोजेंगे, उन्हें निराशा हाथ लगेगी.’

यह आत्मस्वीकार नहीं है, आत्मकथन है. नवलजी ने साहित्य को प्रेमचंद की तरह ही जीवन और मनुष्यता में आस्था जगाने का उद्यम ही माना, निराशा को न नकारते हुए.

मेरा जीवन क्षणिक है, मैं इस अनंत में एक कण हूं लेकिन मैं हूं और मेरे होने का अर्थ है, यह विश्वास नवलजी का अपने बारे में था और इसका प्रमाण वे तमाम प्रकाशित और अप्रकाशित कृतियां हैं, जिनमें वे शेष हैं, जीवित हैं.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)