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‘महागुन सोसाइटी विवाद में हम शामिल नहीं थे फिर भी हमारी दुकानें तोड़ दी गईं’

नोएडा के सेक्टर 78 में महागुन सोसाइटी के सामने बनीं दुकानें और झोपड़ियां तोड़ दी गईं, जिसके बाद प्रभावित लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है.

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महागुन सोसाइटी के सामने बनीं दुकानों के तोड़े जाने से प्रभावित लोग. (फोटो: प्रशांत कनौजिया)

‘हमें न तो नोटिस दिया गया और न ही घरों से सामान निकालने तक का मौका ही मिला. प्राधिकरण के अधिकारी और पुलिस तीन जेसीबी लेकर आए थे. हमने जब उनसे इस कार्रवाई का कारण पूछा तो उन्होंने हमें हटाते हुए बोला कि बाद में बात करेंगे’, ये कहना है नोएडा के सेक्टर 78 में महागुन सोसाइटी के सामने सब्जी की दुकान चलाने वाले आकाश का. बीते दिनों घरेलू नौकरानी को लेकर हुए इस विवाद के बाद इस सोसाइटी का नाम चर्चा में आया था.

बीती 17 जुलाई को नोएडा विकास प्राधिकरण की ओर से हुई कार्रवाई में सोसाइटी के सामने खेतों में बनीं तकरीबन 40 दुकानें और झोपड़ियां तोड़ दी गई हैं. प्रभावित लोगों का आरोप है कि यह कार्रवाई बिना नोटिस दिए की गई थी.

आकाश बताते हैं, ‘महागुन सोसाइटी के लगभग 70 फीसदी लोग हमारे पास सब्ज़ियां लेने आते हैं. सोसाइटी के अंदर भी दुकानें हैं, जिनका किराया 80 हज़ार से लेकर एक लाख रुपये तक है. उनके ग्राहक हमारे पास आते हैं, ऐसे में उन दुकानों का किराया तक नहीं निकलता होगा. मुझे लगता है ये कार्रवाई इसी वजह से हुई है. इस कार्रवाई से मेरा तकरीबन एक लाख रुपये का सामान बर्बाद हो गया.’

प्रभावित दुकानदारों का कहना है कि सोसाइटी के लोग फोन करके भी उनकी दुकानों से फल और सब्ज़ियां मंगा लिया करते थे.

इससे पहले 12 जुलाई को महागुन मॉडर्ने सोसाइटी के नज़दीक स्थित बंगाली बस्ती के लोगों ने पत्थरबाज़ी की थी. तब काफी देर तक हंगामा होता रहा था. बस्ती के लोगों का कहना था कि सोसाइटी में रहने वाले एक परिवार के लोगों ने अपनी घरेलू नौकरानी पर पैसे चोरी करने का आरोप लगाकर उसे पूरी रात कथित रूप से बंधक बनाकर रखा था.

इसके विरोध में बंगाली बस्ती में रहने वाली नौकरानी के परिजनों ने सैकड़ों अन्य लोगों के साथ मिलकर सोसाइटी पर धावा बोल दिया. इस दौरान बस्ती के लोगों ने वहां तोड़फोड़ और पथराव भी किया.

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नोएडा विकास प्राधिकरण द्वारा तोड़ी गईं झोपड़ियों और दुकानों का मलबा. (फोटो: प्रशांत कनौजिया)

वहीं सोसाइटी के रहवासियों का कहना था कि नौकरानी ने चोरी की थी और इसे स्वीकार भी किया था. बस्ती के लोगों के सोसाइटी में उपद्रव के बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर मामला दर्ज कराया था, जिसके बाद पुलिस ने पथराव करने वालों में से कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया था.

गौरतलब है कि बंगाली बस्ती में मालदा और कूचबिहार से आए कुछ लोग आस-पास सोसाइटी में बतौर घरेलू नौकर काम करते हैं.

अब इस हालिया कार्रवाई से प्रभावित लोगों का आरोप है कि सोसाइटी में हुए उस विवाद का हर्जाना उन्हें भुगतना पड़ रहा है जबकि उनका सोसाइटी पर हुई पत्थरबाज़ी से कोई लेना-देना नहीं था.

जूस की दुकान चलाने वाले रफ़ीक़ बताते हैं, ‘मेरी दुकान टूटने से पांच से छह हज़ार रुपये का नुकसान हुआ है. इस ज़मीन के मालिक तो कांवड़ लेकर हरिद्वार गए हैं. यहां बिना नोटिस दिए हमारे दुकान और मकान उजाड़ दिए गए.’

इस कार्रवाई से यहां रह रहे लोगों की आजीविका बुरी तरह प्रभावित हुई है. लोग अपने-अपने ज़मीन मालिकों से संपर्क कर रहे हैं ताकि इस समस्या का समाधान निकाल सकें. यहां रह रहे लोगों का कहना है कि ज़मीन मालिक उनसे कोई तय किराया नहीं लेते थे, बल्कि इन लोगों से जो बन पड़ता था ये दे देते थे.

प्रभावित लोगों का कहना है कि उनकी दुकानें महागुन सोसाइटी के निर्माण से पहले की हैं. इतने वर्षों तक किसी ने कुछ नहीं बोला और सब कुछ सामान्य चल रहा था. अचानक इस कार्रवाई के चलते बहुत सारे परिवारों की रोजी छिन गई है.

कुछ लोग इस घटना का ज़िम्मेदार नौकरानी को लेकर बंगाली बस्ती के लोगों और महागुन सोसाइटी के रहवासियों के बीच हुए विवाद को मानते हैं, वहीं कुछ लोगों का मानना है कि इसकी वजह सोसाइटी के अंदर चलने वाली सब्ज़ी की दुकानों के मालिक हैं.

कानपुर की रहने वाली ज्ञानशक्ति यहां दो साल से फल और सब्ज़ी की दुकान चला रही थीं. उनका कहना है कि उनकी दुकान के 30 हज़ार रुपये की सब्ज़ियां और फल इस कार्रवाई के चलते बर्बाद हो गए.

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नोएडा विकास प्राधिकरण द्वारा तोड़ी गईं झोपड़ियों और दुकानों का मलबा. (फोटो: प्रशांत कनौजिया)

ज्ञानशक्ति बताती हैं, ‘हमारी पांच से छह महीने की कमाई इस कार्रवाई से बर्बाद हो गई. हम लोग क़र्ज़ लेकर व्यवसाय करते हैं. हमारी आजीविका इसी पर निर्भर थी. अब हमारे परिवार और बच्चों का क्या होगा?’

उत्तर प्रदेश की रहने वाली नूरी अपने दो छोटे बच्चों के साथ यहां एक झोपड़ी में रह रही थीं. नूरी बताती हैं, ‘इस दुनिया में हमारा कोई नहीं है. अपने दो बच्चों को पालने के लिए चाय की दुकान लगाती हूं. अब गुज़ारा कैसे होगा?’

अमरोहा की शहाना का कहना है कि उनका एक से डेढ़ लाख रुपये का नुकसान हुआ है. शहाना की फल-सब्ज़ी के अलावा कबाड़ का दुकान तोड़ दी गई है. शहाना इस कार्रवाई का ज़िम्मेदार उन नौकरानियों को मानती हैं, जिनका महागुन सोसाइटी के लोगों से विवाद हुआ था.

वे कहती हैं, ‘हम तो उस दिन के झगड़े में शामिल भी नहीं थे. इसके बावजूद हमारी दुकानें तोड़ दी गईं. सोसाइटी में काम करने वाले लोग तो फिर से काम पर लौट गए, लेकिन हमारी दुकानें ख़त्म कर दी गईं. हम क़र्ज़ लेकर काम करते हैं, उसे कैसे चुकाएंगे और क्या खाएंगे?’

अलीगढ़ की रहने वाली कांति भी भविष्य की चिंता से परेशान हैं. वे बताती हैं, ‘मेरा लगभग 50 हज़ार रुपये का नुकसान हुआ है. मेरी फलों की दुकान थी. हम मेहनत से दुकान चलाते हैं, जो अब तोड़ दी गई. अब अपने परिवार को कैसे पालूंगी. अब ज़मीन के मालिक ही फैसला लेंगे हमारी दुकान फिर से खुल पाएगी या वापस अपने घर लौटना पड़ेगा.’

नोएडा विकास प्राधिकरण के सीईओ अमित मोहन प्रसाद का इस कार्रवाई पर कहना है कि ये कार्रवाई अवैध अतिक्रमण की वजह से की गई है. नोएडा में इस तरह की कार्रवाई नियमित रूप से होती रहती हैं, जिसके तहत अवैध निर्माण और अतिक्रमण तोड़े जाते हैं.