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राहत इंदौरी: ख़ामोश हो गए इक शाम और उसके बाद तमाम शहर में मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू हम थे

बहुत कम शायर अवाम की बेचेहरगी और अवसाद को सत्ता के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बनाने में कामयाब हुए. ऐसे में राहत ने ग़ज़ल के हाशिये में पड़ी भाषा और मुंहफट चरित्रों को सत्ता के सामने खड़ा कर दिया. उनसे पहले भी शायरोंं ने सत्ता को आईना दिखाने की कोशिश की, लेकिन उनकी ग़ज़लें ज़रा ज़्यादा मुंहफट साबित हुईं.

राहत इंदौरी. (इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/ द वायर)

राहत इंदौरी. (इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/ द वायर)

राहत इंदौरी से मेरी कोई मुलाक़ात नहीं रही! लेकिन ख़बर जान को आई तो महसूस हुआ कि बिछड़ने का दुख भी हमें उठाना है…

रेत पर थककर गिरे बोझिल लम्हों के दरमियान जाने कब उन पन्नों में आंखें उग आईं, जिन पर हमारी मुलाक़ात के दस्तख़त ज़रा धुंधला गए हैं.

शायद 1998 की बात है, जब उन्होंने आवाज़ दी थी;

उजले कुर्ते पहन रखे हैं सांपों ने
ये ज़हरीले आदम-ख़ोर सारे चोर

सन्नाटों पर चीख़ती आवाज़ और व्यंग्यात्मक लहजे में शामिल उनकी हंसी आज फिर यादों में उठ बैठी है. अब सोचता हूं तो लगता है कमसिन यादों की वो लंबी तानें भी मेरे लिए शायरी थीं, जिसे हम डायलॉग की तरह होंठों पर सजाए फिरते थे.

मैं इस आवाज़ को ख़ारिज नहीं कर रहा हूं, लेकिन मुझे शायरी पर बात करनी है. सब जानते हैं कि स्टेज की शायरी राहत की बेपनाह शोहरत की वजह बनी, लेकिन कम लोगों को एहसास है कि वो पहचाने नहीं गए.

ऐसा नहीं है कि मैं स्टेज पर खड़े राहत को नकार रहा हूं, हां ये ज़रूर कहना चाहता हूं कि राहत ने मुशायरों में शेर कम पढ़े ‘धंदा’ ज़्यादा किया.

राहत ख़ुद इसको ‘धंदा’ कहते थे. जी, वो अच्छी शायरी समझते थे, अच्छी ग़ज़लें कहते थे और उनको मालूम था कि वो स्टेज पर क्या करते हैं.

एक मुशायरे में उन्होंने मुज़फ़्फ़र हनफ़ी को मुख़ातिब करते हुए कहा था, ‘मैं आपके स्तर की चीज़ें पढूंगा तो सुनने वाले मुझे हूट कर देंगे. प्लीज़ मुझे धंदा करने की इजाज़त दीजिए.’ (लाग-लपेट के बग़ैर,पृ: 134)

यूं राहत कई बार सिर्फ़ तान उड़ाते थे और अकबर इलाहाबादी के इस शेर की तस्वीर बन जाते थे;

सुर कहां के साज़ कैसा कैसी बज़्म-ए-सामईन
जोश-ए-दिल काफ़ी है ‘अकबर’ तान उड़ाने के लिए

अब जोश-ए-दिल को शायरी समझ भी लिया जाए, तो उसको राहत की मुकम्मल पहचान मान लेना ज़्यादती होगी.

राहत ने मुशायरे के विषय पर पीएचडी की थी और ख़ुद इस दुनिया के सरदार थे, इसलिए उनको ‘सुल्ताना डाकू’ भी कहा गया. मगर राहत साहित्य और ‘धंदे’ का फ़र्क़ जानते थे सो कह गए,

अदब कहां का कि हर रात देखता हूं मैं
मुशायरे में तमाशे मदारियों वाले

लेकिन क्या कीजिए कि इसी धंधे वाली दुनिया में राहत के अपने रंगों की शायरी भी थी जो अक्सर सियासत का आईना बनी और अवामी नग़मों के तौर पर उसकी शोहरत भी हुई.

ख़ैर बात 1998 से शुरू हुई थी और अब शायद वो 2006 का साल था, जब वो राहत क़ैसरी की सूरत ये कहते हुए नज़र आए कि,

लोग पीपल के दरख़्तों को ख़ुदा कहने लगे
मैं ज़रा धूप से बचने को इधर आया था (ग़ज़ल संग्रह ‘धूप-धूप’ से)

उस समय गुमान में भी नहीं था कि राहत इंदौरी ही कभी राहत क़ैसरी हुआ करते थे. बाद में भी बहुत दिनों तक बेख़बरी रही.

ये वही ज़माना है जब उर्दू आलोचना की हर अच्छी-बुरी चीज़ मुझ तक पहुंच रही थी. राहत अक्सर हवालों से ग़ायब थे.

अपनी डायरी पर भरोसा करूं तो शायद इक्का-दुक्का लोगों के अलावा मज़दूर शायर रम्ज़ अज़ीमाबादी ने एक साक्षात्कार (1980) में आधुनिक ग़ज़ल कहने वाले बड़े शायरों के साथ राहत का नाम लिया था.

अब विपदा ये है कि रम्ज़ को ही जानने वाले कितने हैं जो उनके कहे को सनद भी माना जाए.

ख़ैर मुझे उस समय इस बात पर ज़्यादा हैरत इसलिए नहीं थी कि मैं ख़ुद राहत को साहित्य में जगह देते हुए सहज नहीं था.

हां, जब राहत क़ैसरी ने राहत इंदौरी से मिलवाया तो उनकी किताबें सवाल पूछने लगीं. फिर मुझे दिल्ली और इलाहाबाद के आलोचक और उनके अनुयायी बड़े मासूम लगने लगे.

वो शायरी पर बात करते हुए शायर के बारे में सवाल उठाते थे कि इसने कितना पढ़ा है, वर्ल्ड लिटरेचर से कितना वाक़िफ़ है और ये भी कि मार्क्सवाद का नाम भी सुना है.

दिल्ली और इलाहाबाद ने आधुनिकतावाद और उत्तर आधुनिकतावाद के दायरे में सब कुछ पढ़ लेने का स्वांग रच लिया था इसलिए वो अपनी मिट्टी के स्वाभाविक रंग और रचनात्मकता के अड़ियलपने को साहित्य ही नहीं समझ रहे थे.

वो गिनती के शायरों की माला जप रहे थे और दबी ज़बान से ये कहने की कोशिश कर रहे थे कि राहत की शायरी में गहराई नहीं है. वहीं राहत एक दूसरे अंदाज़ में शायरी पर तब्सिरा कर रहे थे.

हमने दो सौ साल से घर में तोते पाल के रखे हैं
मीर तक़ी के शेर सुनाना कौन बड़ी फ़नकारी है

यहां पूछा जा सकता है कि फिर राहत की शायरी का दर्जा क्या है, उसको कैसे पढ़ना चाहिए? इसका जवाब बेहद आसान है, लेकिन उसके लिए ये समझना होगा कि आपके ज़ेहन में ग़ज़ल क्या है?

अगर ये औरत या महबूब का सरापा है तो राहत की शायरी हमारे बहुत काम की नहीं है. अगर ये सिर्फ़ फ़ारसी शब्दों या तराकीब से गुंधी जाने वाली बालों की चोटी है तब भी इसमें हमारे लिए बहुत कुछ नहीं है.

अगर ग़ज़ल शहद घोलते एहसास का नाम है तो राहत हमारे लिए बिलकुल नहीं हैं. यहां सवाल फिर वही है कि राहत हैं कौन?

राहत दरअसल उस शायर का नाम है जिसने ग़ज़ल के ख़िलाफ़ ग़ज़ल लिखी और ग़ज़ल की परंपरा से बग़ावत करते हुए पहले ही संग्रह में ये कह दिया कि,

हमने सीखी नहीं है क़िस्मत से
ऐसी उर्दू जो फ़ारसी भी लगे

लेकिन ऐसी बातें और शायरों के यहां भी मिल जाती हैं, फिर राहत कौन है? इसका जवाब सीधे-सीधे ये है कि राहत अपनी तरह से जज़्बात को विचारों में बदल देने का हुनर ग़ज़ल में लेकर आए.

वो थोपे हुए विचारों से अक्सर बचते-बचाते और कई बार आम लोगों की बातचीत को ग़ज़ल में स्थापित करते हुए वो सब कह गए जिसके लिए ग़ज़ल बनी ही नहीं थी.

इसमें कई बार बहुत कामयाब हुए और कई दफ़ा उनके बयान को ही शायरी का दर्जा दे दिया गया.

क़िस्सा ये है कि उनकी शायरी पढ़ी कम गई, सुनी ज़्यादा गई इसलिए भी उसको राहत की आवाज़ के साथ याद रखने की एक मजबूरी हो सकती है.

लेकिन जब उनकी शायरी को पढ़ने की कोशिश करेंगे तो शायरी का वो रंग ज़्यादा नज़र आएगा जो एक पाठक पर अलग-अलग तरह से खुलता है और उसको अपनी गिरफ़्त में लेता है.

माफ़ कीजिएगा मैं राहत को ‘किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है’…जैसी शायरी का शायर नहीं मानता. हालांकि इस शायरी में कोई ख़राबी नहीं है.

असल में राहत इस तरह की शायरी और तेवर में कहीं दब जाते हैं. जी, चौंकिए मत, ये उनका एक रंग ज़रूर हो सकता है लेकिन राहत की शायरी अपने ख़ास रंग में कहीं और खुलती है.

इस तरह की शायरी कुछ ख़ास संदर्भों की वजह से लोगों को अच्छी लगती है और अपने समय के राजनीतिक खोखलेपन का हवाला भी बनती रहती है.

लेकिन ये शायरी कहां है. हां, इस पर शायरी का गुमान होता है और गुमान से परे इसमें शायरी की सच्चाई ज़्यादा देर तक ज़िंदा नहीं रहती.

वो तो लफ़्ज़ों का और उससे ज़्यादा आवाज़ का घना गर्म जादू है, जिसको शायरी समझ लिया जाता है. बात वही है कि इस युग के सन्नाटे में चीख़ने वाले शायर को सुना बहुत गया, सोचा नहीं गया.

मुशायरों की ज़िंदाबाद में दबी कुचली अवाम ने अपनी ख़्वाहिशात का जश्न मनाया और ये समझ लिया कि उनकी आवाज़ जिंदा है,

मुझे गिलास के अंदर ही क़ैद रख वर्ना
मैं सारे शहर का पानी शराब कर दूंगा
महाजनों से कहो थोड़ा इंतिज़ार करें
शराब-ख़ाने से आकर हिसाब कर दूंगा

यहां अवाम की समझ ग़लत नहीं थी, लेकिन उसको शायरी समझ लेने की भूल ख़ुद राहत ने भी नहीं की थी. वो अक्सर कहते थे मुझे ध्यान से सुनो जाने कब अच्छा शेर सुना दूं या फिर ये कि अभी जो शेर मैंने पढ़ा अच्छा था.

उनके चेहरे की शिकन बता देती थी वो शायरी समझने वालों की भीड़ में शेर नहीं पढ़ रहे. इसलिए वहां उनको इस तरह की शायरी रास आती थी,

क़लम वालो सियासी ज़ुल्म की रुदाद लिख देना
क़यामत जब भी लिखना हो अहमदाबाद लिख देना

इन बातों से अलग राहत को पढ़ते हुए लगता है कि वो अपने समय को ख़ूब समझ रहे थे. हालंकि उनकी इस समझ के पीछे अतीत का एक घना साया भी है, जिसकी धूप-छांव में बैठकर वो अपने समय के ख़िलाफ़ ग़ज़ल में ‘बयान’ भी दे रहे थे और शायरी भी कर रहे थे.

इन बातों के लिए राहत की आलोचना की जा सकती है लेकिन जिस दौर में अख़बारों ने झूठ बोलना शुरू कर दिया हो, उस ज़माने में ग़ज़ल को अख़बार का भी काम करना ही चाहिए.

यूं कह सकते हैं कि राहत ने शायरी में सच बोलने का गुनाह किया. एक रिजर्वेशन के साथ उनके इन गुनाहों को भी पढ़ना चाहिए लेकिन ऐसा कोई दावा नहीं करना चाहिए कि ये शायरी भी है.

असल में राहत की ग़ज़ल मुशायरों से अलग भी अपने समय की चुप्पी पर चीख़ सकती है, बे-हिसी पर व्यंग कर सकती है और ज़िंदगी की वहशत पर हंस सकती है.

हां, राहत किताबों की शायरी में भी इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि जिस वक़्त वो अपनी ग़ज़लों में अवाम की बेचेहरगी और अवसाद का चित्रण कर रहे थे, उस वक़्त हमारी उर्दू ग़ज़ल एकांत की खिड़की से झांक रही थी.

और हमारे शायर के एकांतवास में समाज एक निरर्थक शब्द की तरह था.

दरअसल ग़ज़ल उस वक़्त ऐसी भाषा में बात कर रही थी जो अपने बाहर सोचती हुई कम ही नज़र नहीं आती है और आत्ममुग्धता के प्रतीकों में उलझकर कमरे भर की तन्हाई को इस युग का सबसे बड़ा सच मान बैठी थी.

बहुत कम शायर अवाम की बेचेहरगी और उसके अवसाद को सत्ता के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बनाने में कामयाब हो रहे थे. किसी को ग़ज़ल की नाज़ुकी का ख़याल था, तो कोई अवाम की भाषा से अपने शब्दकोश को मलिन नहीं करना चाहता था.

ऐसे में राहत ने ग़ज़ल के हाशिए में पड़ी भाषा और मुंहफट चरित्रों को सत्ता के सामने लाकर खड़ा कर दिया. राहत से पहले भी शायरी ने सत्ता का मुंह नोच लेने की कोशिश की, लेकिन राहत की ग़ज़लें ज़रा ज़्यादा मुंहफट साबित हुईं.

यहां ये बात समझने की है कि राहत फ़ैज़ नहीं थे, वो जालिब भी नहीं थे इसलिए उनकी शायरी कई बार सिर्फ़ एक बयान के दायरे में सिमट जाती है.

हालांकि ये बात सिर्फ़ राहत के लिए नहीं कही जा सकती. और मैं इसको शायरी में किसी लांछन की तरह भी नहीं देखता लेकिन ये जो कुछ भी है शायरी के दर्जे को नहीं पहुंचती.

ये और बात है कि इस तरह की शायरी की वजह से राहत कभी अली सरदार जाफ़री की नज़रों में भी आए थे. मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद ने इस प्रसंग को इस तरह लिखा है कि- जब एक मुशायरे में राहत ने ये शेर पढ़ा,

फिर एक बच्चे ने लाशों के ढेर पर चढ़कर
ये कह दिया कि अभी ख़ानदान बाक़ी है

तो अली सरदार जाफ़री की निगाहों में चमक पैदा हुई. उन्होंने सरापा दाद बनकर मेरी तरफ देखा और कागज के एक टुकड़े पर ये शेर नोट कर लिया. मुझे इसमें बस ये जोड़ना है कि बाद में जाफ़री इस शेर को जहां अपने भाषणों में दोहराते हुए नज़र आएं, वहीं जावेद अख़्तर की शायरी पर लेख लिखते भी हुए इस शेर को समकालीन शायरी के संदर्भ में दर्ज करना ज़रूरी समझा.

दिलचस्प बात ये है कि जाफ़री अपने इस नौजवान शायर की शायरी का रिश्ता मध्ययुग की परंपरा से भी जोड़ते हैं. शायद ये प्रगतिशील लेखक संघ का ज़माना होता, तो राहत उसके प्रतिनिधि शायर होते.

मगर क्या कीजिए कि हम विचारों के उस लिंचिंग युग में चले आए हैं जहां राहत की हैसियत भी एक दाढ़ी-टोपी वाले जिहादी मुसलमान की हो गई है और उनकी शायरी को हिंदुओं के ख़िलाफ़ जिहाद का तमग़ा तक दिया जा चुका है.

ईमान, काफ़िर और हिजरत जैसे शब्दों के गिर्द इस डिस्कोर्स को स्थापित करते हुए उर्दू को भी हिंदू और हिंदुस्तान का विरोधी बताया जा रहा है.

शायद मैं विषय से भटक रहा हूं लेकिन ये कहना ज़रूरी है कि इस शायरी से सिर्फ़ सत्ता को डरना चाहिए और उस सत्ता को तो ज़रूर खौफ़ खाना चाहिए जो धर्म की आड़ में उत्पात को बढ़ावा देती आई है.

राहत ने इस सत्ता को कभी इमाम बुख़ारी का नाम दिया, तो कभी फ़तवे की सियासत पर व्यंग किया और कभी बिना नाम लिए हिंदू राष्ट्र की कल्पना पर चीख पड़े.

ये अलग बात है कि इन सब में राहत की शायरी उतनी शायरी नहीं रही जितनी वो हो सकती थी. शायद इसलिए उनकी अच्छी शायरी को सामने रखते हुए ज़ुबैर रिज़वी ने उसमें मुस्तफ़ा ज़ैदी, सलीम अहमद, मोहम्मद अल्वी और बाक़र मेहदी जैसे महत्वपूर्ण शायरों के रंगों की पहचान की.

और शायद इसलिए बशीर बद्र के नज़दीक राहत ऐसे शायर थे, जिसने स्टेज और किताब के फ़ासले को कम किया. ख़याल रहे ये उन लोगों की राय है जो राहत के पाठक भी रहे.

मैं ख़ुद राहत को अदम गोंडवी के घराने का शायर समझता हूं. इनको एक साथ पढ़िए तो लगता है कि अपनी तमाम भिन्नताओं के बावजूद वो हाशिए पर खड़े लोगों के शायर थे और अगली क़तार में बैठे सियासतदानों का मुंह नोच लेने की एक जैसी ख़्वाहिश रखते थे.

कमाल ये है कि दोनों अपनी-अपनी भाषा में हिंदुस्तानियत के अलमबरदार नज़र आते हैं. हां, अदम की शायरी का किरदार अपने व्यक्तिगत पते साथ भी मौजूद है, जबकि राहत के यहां एक तरह की सामूहिकता का अंदाज़ ज़्यादा है.

यहीं पर अर्ज कर दूं कि ‘लहू से मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना’ जैसी शायरी के लिए राहत को नहीं पढ़ा जाना चाहिए.

हालांकि इस शायरी की अपनी-सी अहमियत और ज़रूरत है, लेकिन इसको शायर के देशप्रेम बल्कि कई दफ़ा राजनीतिक और सामाजिक कथ्य से जुड़ी भावनात्मक शायरी से आगे बढ़कर देखना और शायरी का मानक भी समझना ठीक नहीं है.

पूरी उर्दू शायरी इससे ओत प्रोत है इसलिए भी देशप्रेम की शायरी में कोई नया रंग तलाश कर लेना मुहाल है. अब लाल चंद फ़लक का ही शेर देखिए,

दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़त
मेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगी

इस शेर के बाद राहत का शेर नहीं पढ़ा जा सकता. लेकिन शायर की भी अपनी एक मनोदशा होती और हमारे ज़माने में तो पूरे समाज को ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया है इसलिए भी शायर को बार-बार ऐलान करना पड़ता है कि वो कौन है.

जब शायर की शहरियत और उसकी मज़हबी पहचान को सवाल बना दिया जाए, तो शायर को इस तरह से भी जवाब देना पड़ता है लेकिन वो शायरी भी हो ज़रूरी नहीं है.

हां, ये शायरी नहीं है. अगर ये शायरी है तो उनकी शायरी आम आदमी के गुस्से की तरह लाल है और अपनी हताशा, निराशा और बेबसी पर रोने-पीटने की क़ायल नहीं है.

वो एक तरह की ज़िद से बंधी हुई शायरी है इसलिए उसका ज़िद्दी सुर ज़रा-सा कोलाहल को पसंद करता है.

हालांकि ये बेचेहरा लोगों का अहंकार है जो मन के कोलाहल को हर उस सत्ता के सामने तनकर खड़ा होने का मौक़ा देना चाहता है, जिसने उसको बराबर का इंसान नहीं समझा.

इसलिए वो बड़प्पन के तमाम प्रतीकों को अपनी ज़मीन पर पटक देता है और कभी इतिहास के स्मरण में अपने क़द की पैमाइश करता है.

वो अवाम के सामने किसी के क़द को बड़ा होते हुए नहीं देखना चाहता वो एक मज़हब को दूसरे मज़हब की सियासत से बचाना चाहता है. वो संसद भवन में भी इस यक़ीन के साथ आग लगाना चाहता है कि यहीं पर मुल्क का सौदा होता है.

क्या ये यक़ीन सिर्फ़ एक शायर का है? राहत की शायरी इस सवाल के जवाब में अवाम से जुड़ती है और जज्बों को विचारों की ढाल देती है. कभी मौक़ा हो तो राहत को ज़रूर पढ़िए, यहां बस दो तीन शेर;

एक वीराना जहां उम्र गुज़ारी मैंने
तेरी तस्वीर लगा दी है तो घर लगता है

अपना चेहरा तलाश करना है
गर नहीं आईना तो पत्थर दे

उठी निगाह तो अपने ही रू-ब-रू हम थे
ज़मीन आईना-ख़ाना थी चार-सू हम थे

ख़मोश हो गए इक शाम और उसके बाद
तमाम शहर में मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू हम थे

क्यों ये सैलाब सा है आंखों में
मुस्कुराए थे हम ख़याल आया

और अंत में बस इतना कि राहत नंगी आंखों के क़ायल थे इसलिए उनका ख़ुदा भी बहुत ख़ूबसूरत नज़र आता है, उन्हीं के शब्दों में,

ख़ुदा को देखना ही है तो ऐनकों का सहारा क्यों लिया जाए,
नंगी आंखों से जहां तक देख पाऊं
वहीं मैं अपना मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा बना दूं.