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चीन ने भारतीय सेना पर एलएसी पार करने और फायरिंग का आरोप लगाया, सेना का इनकार

वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पैंगोंग झील का दक्षिणी किनारा भारत और चीन के बीच टकराव का नया केंद्र बन गया है. चीनी प्रवक्ता झांग शिउली ने दावा किया है कि भारतीय सैनिकों ने वॉर्निंग शॉट्स फायर किए हैं. भारतीय सेना ने इसका खंडन करते हुए कहा है कि उकसावे की कार्रवाई चीन की तरफ से ही हुई है.

लद्दाख का पैंगोंग सो इलाका जहां भारतीय और चीनी सेनाएं आमने-सामने आईं थीं. (फोटो: शोम बसु/द वायर)

लद्दाख का पैंगोंग त्सो इलाका जहां भारतीय और चीनी सेनाएं आमने-सामने हैं. (फोटो: शोम बसु/द वायर)

नई दिल्ली: चीन ने बीते सोमवार रात दावा किया कि भारतीय सैनिकों ने पैंगोंग झील के दक्षिणी तट के पास शेनपाओ पहाड़ों में वॉर्निंग शॉट्स फायर किए यानी फायरिंग की थी.

यदि चीन के ये आरोप सही पाए जाते हैं तो पिछले 53 सालों में भारत-चीन सीमा पर फायरिंग की यह पहली घटना होगी. हालांकि भारत ने इन दावों को सिरे से खारिज किया है और स्थिति को भड़काने के लिए चीन को जिम्मेदारी ठहराया है.

वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर पैंगोंग झील का दक्षिणी किनारा भारत और चीन के बीच टकराव का नया केंद्र बन गया है.

चीन का ये बयान ऐसे मौके पर आया है जब बीते पांच सितंबर को भारत एवं चीन के रक्षा मंत्रियों के बीच रूस के मास्को में मुलाकात हुई थी.

चीन के बयान के अनुसार, भारतीय सेना के जवानों ने सोमवार को कथित तौर पर पैंगोंग झील के पास नियंत्रण रेखा पार की.

यह क्षेत्र हाल ही में दोनों देशों के बीच गतिरोध के लिए एक नए क्षेत्र के रूप में उभरा है. भारत ने कहा था कि चीनी सैनिकों ने 29 और 31 अगस्त को दो बार एलएसी को पार करने का प्रयास किया था.

उन्होंने दावा किया कि भारतीय सैनिकों ने ‘चीनी सीमा पर गश्त करने वाले सैनिकों पर चेतावनी देने वाले शॉट्स चलाए. इसके चलते ‘चीनी सैनिकों को स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए जवाबी कार्रवाई के लिए मजबूर होना पड़ा.’

चीनी प्रवक्ता झांग शिउली ने दावा किया कि भारतीय सैनिकों ने ‘दोनों पक्षों द्वारा किए गए समझौते का उल्लंघन किया है, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है और इससे आसानी से गलतफहमी पैदा होगी, जो एक गंभीर सैन्य उकसावा है और यह घृणित कार्य है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हम भारतीय पक्ष से इन खतरनाक कदमों को तुरंत रोकने, एलएसी को पार करने वाले सैनिकों को हटाने, सीमावर्ती सैनिकों को सख्ती से नियंत्रित करने, फायरिंग के मामले की गंभीरता से जांच करने और उन कर्मियों को दंडित करने तथा इस तरह की घटनाओं को फिर से न दोहराने की मांग करते हैं.’

हालांकि भारतीय सेना की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि एलएसी पर भारतीय सैनिकों की ओर से कोई गोली नहीं चलाई गई है. उन्होंने कहा कि चीन की तरफ से ही उकसावे की कार्रवाई की गई है.

सेना ने कहा कि चीनी सैनिक भारत की एक अग्रिम चौकी के नजदीक आए थे और उन्होंने हवाई फायरिंग की थी. उन्होंने कहा कि ‘गंभीर उकसावे के बावजूद भारत के सैनिकों ने संयम रखा और परिपक्व और जिम्मेदार तरीके से व्यवहार किया.’

भारतीय सेना ने आगे कहा कि वे सीमा पर शांति के लिए प्रतिबद्ध हैं और किसी कीमत पर देश की अखंडता और संप्रभुता को कायम रखा जाएगा. चीन का बयाल घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय नागरिकों को गुमराह करने की कोशिश है.

साल 1996 में ‘भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ सैन्य क्षेत्र में विश्वास-निर्माण के उपायों’ पर किए गए एक समझौते के तहत ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा के दो किलोमीटर के भीतर’ फायरआर्म्स के उपयोग पर प्रतिबंध है.

मौजूदा संकट पर भारत ने कहा है कि उसके सैनिक सीमा प्रबंधन में अच्छी तरह से वाकिफ हैं और उन्होंने इस बात से भी इनकार किया है कि उन्होंने कभी एलएसी को पार किया था.

भारत ने कहा है कि मौजूदा गतिरोध की स्थिति चीनी सैनिकों की वजह से शुरू हुई है क्योंकि उन्होंने एलएसी के पास सैन्य अभ्यास की प्रकृति पर एक दूसरे को सूचित करने के द्विपक्षीय समझौते का पालन नहीं किया.

मालूम हो कि भारतीय सैनिकों द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सामान्य गश्त के बिंदु से परे चीनी घुसपैठ का पता लगाए जाने के बाद पूर्वी लद्दाख में मई की शुरुआत से ही भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच कई झड़पें हो चुकी हैं.

सबसे गंभीर झड़प 15 जून को गलवान घाटी में हुई थी, जब एक हिंसक लड़ाई में 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई थी. चीन ने अपनी तरफ भी हताहतों की संख्या को स्वीकार किया है, लेकिन किसी भी संख्या का खुलासा नहीं किया था.

नतीजतन फोन द्वारा विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर पर उच्च-स्तरीय हस्तक्षेप किया गया, जिसके कारण सीमा पर सैनिकों के पीछे हटने के लिए कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ता हुई.

हालांकि, चीन द्वारा पैंगोंग त्सो झील क्षेत्र में ‘फिंगर्स’ इलाके में अपने पिछले पोस्टों पर वापस जाने से इनकार करने के कारण सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया काफी हद तक रुकी हुई है.