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आधुनिक शिक्षा व्यवस्था आदिवासियों को उनका अस्तित्व बचा पाने के रास्ते क्यों नहीं दिखा पाती

आधुनिक शिक्षा का पूरा ढांचा वर्चस्ववादी संस्कृति और मानसिकता से खड़ा किया गया है, जिसमें आदिवासी समाज कहीं फिट नहीं बैठता. उसकी पूरी जीवन शैली, जीवन दर्शन और दुनिया अलग है, जिसे वर्चस्ववादी नज़रिये से नहीं समझा जा सकता.

झारखंड के गुमला जिले के डुमरी ब्लॉक गांव में बने एक अंग्रेजी-कुरुख स्कूल के छात्र. (फोटो: जसिंता केरकेट्टा)

झारखंड के गुमला जिले के डुमरी ब्लॉक गांव में बने एक अंग्रेजी-कुरुख स्कूल के छात्र. (फोटो: जसिंता केरकेट्टा)

पिछले दिनों ओडिशा के कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज को 2023 के वर्ल्ड एंथ्रोपोलॉजी कांग्रेस की मेजबानी मिलने के ख़िलाफ़ आदिवासी और गैर आदिवासी समाज के कुछ प्रबुद्ध लोगों ने हस्ताक्षर अभियान चलाया और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रतिरोध दर्ज किया.

इनमें प्रो. वर्जीनियस खाखा, गुजरात विधानसभा के सदस्य छोटूभाई वसावा, सोनी सोरी, ग्लैडसन डुंगडुंग, प्रणव डोले, आशीष कोठारी, लालसू सोम नागोटी आदि शामिल थे.

इनका मानना है कि ओडिशा में स्थित तीस हजार आदिवासी बच्चों का यह कारखानानुमा आवासीय स्कूल, बच्चों को आदिवासी जीवन दर्शन, भाषा-संस्कृति और आदिवासी नजरिये से काटता है.

विरोध का परिणाम यह निकला कि वर्ल्ड एंथ्रोपोलॉजी कांग्रेस की मेजबानी का अधिकार इंस्टिट्यूट से वापस ले लिया गया. वहीं, इंटरनेशनल यूनियन ऑफ एंथ्रोपोलॉजिकल एंड एथनोलॉजिकल साइंसेज (आईयूएईएस), भारतीय मानवशास्त्रियों के सहयोग से फिर से मेजबानी पाने की कोशिश में जुटा हुआ है.

इस घटना ने एक बार फिर आदिवासियों के लिए आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया है. पर ऐसे सवाल लगातार क्यों उठते हैं?

इस शिक्षा ने युद्ध, पर्यावरण असंतुलन और बीमारियां दी है

आधुनिक शिक्षा व्यवस्था आदिवासियों को अपना अस्तित्व बचा पाने के रास्ते क्यों नहीं दिखा पाती?

इसलिए क्योंकि यह शिक्षा व्यवस्था सिर्फ बाजारवाद में जीने, जीने के लिए प्रतियोगिता करने, प्रतियोगिता जीतने के लिए दूसरे को पछाड़ने, उनकी शक्ति, क्षमता, संसाधन लूट लेने, इसके लिए दूसरे समुदायों का जनसंहार तक करने और इस क्रूरता को दान, धर्म, सेवा से निरंतर ढकते रहने की प्रक्रिया को ही मजबूत करती है.

इसी व्यवस्था ने दुनिया को युद्ध, पर्यावरण असंतुलन, विस्थापन, असमानता, शोषण, गरीबी और बीमारियां दी हैं.

यदि दुनिया की बड़ी आबादी इन समस्याओं से त्रस्त है, तो फिर दुनिया के कुछ लोगों के लिए चौड़ी सड़कें या भव्य अट्टालिकाएं पूरी मानवता के लिए कतई मायने नहीं रखतीं.

आधुनिक शिक्षा का पूरा ढांचा ऐसी ही वर्चस्ववादी संस्कृति और मानसिकता से खड़ा किया गया है, जिसमें आदिवासी समाज कहीं फिट नहीं बैठता. उसकी पूरी जीवन शैली, जीवन दर्शन और दुनिया अलग है, जिसे वर्चस्ववादी नजरिये से नहीं समझा जा सकता है.

नया शोषक वर्ग बनते हैं बाजारवाद का हिस्सा बने आदिवासी

एक आदिवासी के रूप में अपने गांव-जंगल से निकलकर आधुनिक शिक्षा हासिल करने फिर अपनी और अपने समाज की पड़ताल करते हुए अपने ही गांव-जंगल लौटते हुए मैंने महसूस किया है कि आधुनिक शिक्षा के इस ढांचे में मानवता के बचने के रास्ते नहीं हैं.

यह पूरी तरह श्रेष्ठतावादी मानसिकता को मजबूत करने वाली ऐसी शिक्षा व्यवस्था है, जो दूसरों पर अपने सिद्धांत, अपनी व्यवस्था थोपना चाहती है. इसमें आदिवासी समुदाय ही नहीं, मनुष्यों की मुक्ति भी नहीं है.

आधुनिक शिक्षा से दूर, सुदूर इलाकों के आदिवासियों में अपने संसाधनों और शक्तियों को लेकर एक मजबूत समझ है, लेकिन बाजार के इर्द-गिर्द रहते शिक्षित आदिवासियों के बीच मानसिक गुलामी पनपी है.

वे दिग्भ्रमित और तटस्थ हैं रहते हैं और अपने समाज के लिए नया शोषक वर्ग बनते हैं.

वर्चस्ववादी व्यवस्था के खिलाफ हैं आदिवासी

दुनिया भर में अपने जंगल-जमीन पर खड़े आदिवासी, लंबे समय से इसी वर्चस्ववादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ हैं, इसलिए दुनिया भर के मानवशास्त्रियों ने आधुनिक दुनिया के सामने आदिवासियों का चित्र बर्बर, असभ्य, जंगली और जानवर के रूप में खींच रखा है.

आधुनिक समाज की असुंदरता और बर्बरता को सुंदर शब्दों में छिपा लिया जाता है.

इस आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में आदिवासियों के लिए बस एक ही रास्ता है, या वे पूरी तरह कथित मुख्यधारा की तरह हो जाएं अथवा खुद का अस्तित्व बचाने का संघर्ष निरंतर करते रहें.

आधुनिक शिक्षा के साथ मिलती है ‘धर्म’ की खुराक!

ओडिशा के गोंड आदिवासी समाज के उड़िया भाषा के कवि हेमंत दलपती के साथ हमने ओडिशा में कई दिनों की एक लंबी मोटरसाइकिल यात्रा की थी.

हम हर दिन सौ किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर किसी सुदूर गांव पहुंचते, रात बिताते, लोगों से बातें करते थे. हमने शिक्षा को लेकर छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों में लोगों से बातचीत भी की.

इस क्रम में छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में संघ से जुड़कर आदिवासियों के बीच शिक्षा का कार्य करने वाले और 40 शिशु मंदिर स्कूलों के सचिव रह चुके पवन वर्मा ने बताया, ‘वनवासियों के बीच शिक्षा का काम करते हुए हमने खुद देखा कि वही लोग असल में शास्त्रों का सारा सार जीते हैं. हमने सिर्फ शास्त्र लिखे, लेकिन इसे खुद कहां जीते हैं? फिर भी हमारी कोशिश रहती है कि शिक्षा पाने के साथ वे हिंदू संस्कृति को जानें. मिशनरियों ने भी शिक्षा के साथ उन्हें अपनी ओर आकर्षित किया है. पर हमारी संख्या कम है, मिशन ज्यादा संगठित है. इसलिए ज्यादा लोग उधर आकर्षित होते हैं. पर दोनों का मूल मकसद लगभग एक-सा दिखता है.’

मुख्यधारा से अपनी शर्तों पर जुड़ें

ब्राज़ील के दार्शनिक और शिक्षाविद पाउलो फ्रेरे ने कहा है कि आधुनिक शिक्षा पिछड़े समुदाय को मानसिक गुलामी से मुक्त नहीं करती बल्कि उन्हें अपनी तरह बनाती है.

इसलिए आधुनिक शिक्षा पाने के बाद भी अपने ही समाज के भीतर एक शोषक और तटस्थ समाज खड़ा होता है, जो अपने लोगों का ही शोषण करता है.

पद्मश्री डॉक्टर रामदयाल मुंडा कहते थे कि आदिवासियों को अपनी शर्तों पर मुख्यधारा में आना चाहिए. अपनी कमियों पर भी काम करना चाहिए.

लेकिन वर्चस्ववादी संस्कृति के निरंतर हमले से आदिवासी समाज की अपनी आस्था और व्यवस्था टूट रही है. अपने ऊपर विश्वास खो देने वाले समाज को किसी भी सांचे में ढाल देना आसान होता है और ढालने का यह काम आधुनिक शिक्षा व्यवस्था करती है.

इस तरह उन्हें तोड़ने और ढालने दोनों का काम एक साथ होता है. पर उनके तौर तरीकों को समझने में असमर्थ, कोई सवाल पूछने में असमर्थ आदिवासी, जीवनभर अलग तरह की मानसिक गुलामी जो कृतज्ञता के भार के रूप में भी होती है, उसके नीचे दबकर उनके आगे झुका रहता है.

यही वजह है कि आज का पढ़ा-लिखा आदिवासी समाज भी अपने ही समाज को लूटने का काम करता है. पढ़े-लिखे आदिवासी नेता आदिवासी हित के नाम पर इस दल से उस दल कूदते-फांदते हुए आदमी से ज्यादा अपने समाज का सौदा करने वाले बन जाते हैं.


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इतने वर्षों में आदिवासी समाज के भीतर सिर्फ एक शिक्षित मिडिल क्लास तैयार हुआ है, जो आदिवासियों को उसी नज़र से देखता है जिस नज़र से कथित मुख्यधारा का समाज.

पढ़े-लिखे कई आदिवासी परिवार में गोरे सदस्य खुद को सवर्ण समझते हैं और काले सदस्यों को आदिवासी कहकर तिरस्कृत भी करते हैं. आधुनिक शिक्षा से उनमें वह दृष्टि कभी पैदा नहीं हो सकी, जिससे वह अपने और आदिवासी समाज को आदिवासी नजरिये से समझ सके.

इसलिए मूल प्रकृति पूजक आदिवासी और आधुनिक शिक्षा के साथ संगठित धर्मों में चले गए आदिवासियों के बीच एक बड़ी खाई पैदा हो रही है, जो निरंतर उनके बीच आपसी संघर्ष का कारण बनी हुई है.

शायद यह खाई प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न आदिवासियों को बांटने के लिए बाजारवाद द्वारा धर्म को हथियार बनाने से उत्पन्न है.

आज दुनिया में विकास का अर्थ पूरी तरह कंक्रीट के शहरों की शर्तों को पूरा करना है, जो सुदूर इलाकों के आदिवासियों के विस्थापन, पलायन और उनके पास मौजूद संसाधनों के दोहन पर टिका है.

उसमें आदिवासियों और उसकी आने वाली पीढ़ियों के लिए कोई हिस्सा नहीं है. यह व्यवस्था निरंतर उनको बुरी स्थिति की ओर धकेलती है.

आधुनिक शिक्षा इसी व्यवस्था को मजबूत करती है. इस व्यवस्था से तैयार आदिवासी जब भी गांव की ओर लौटकर जाता है, वह समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष नहीं, प्रार्थना करना सिखाता है क्योंकि आधुनिक शिक्षा के साथ उन्होंने संगठित धर्मों के सिद्धांत और दर्शन भी मिले हैं.

छत्तीसगढ़ के कोया आदिवासियों ने की है पहल

ऐसे में, छत्तीसगढ़ के कोया आदिवासी समाज के लोगों का संगठित होकर पिछले 15 सालों से आदिवासी युवाओं को आदिवासी नजरिया देने, उस नजरिये से पढ़ने-लिखने, शोध करने, रोजगार के नए तरीके ढूंढने की दिशा में प्रयास उम्मीद जगाती है.

वे गांवों के जानकार बुजुर्गों, शहर के शिक्षित आदिवासियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, दूसरे समाज के विद्वान, सबको जोड़ते हुए नई युवा पीढ़ी को भी साथ लाने का काम कर रहे हैं.

वे सभी गोटूल जैसी पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था को नई दृष्टि से परिभाषित कर रहे हैं. वे जंगलों-नदियों-पहाड़ों को पढ़ रहे हैं. देश का संविधान और हक-अधिकार की जानकारी भी ले रहे हैं.

ऐसे प्रयासों से युवाओं को नई दृष्टि मिलती है, जो कथित मुख्यधारा द्वारा स्थापित कारखानेनुमा शिक्षण संस्थानों से नहीं मिल सकती है.

कैसी हो हमारी शिक्षा?

ओडिशा में नियमगिरि आंदोलन के सशक्त नेतृत्वकर्ता लोदो शिकोका आधुनिक शिक्षा के संबंध में कहते हैं, ‘मेरा एक लड़का शहर पढ़ने गया. कभी वापस नहीं लौटा. आधुनिक शिक्षा हमारे बच्चों को गायब कर देती है. वे माता-पिता को भी नहीं पहचानते. ऐसी शिक्षा पहले हमसे हमारी भाषा छीन लेती है, बच्चों को अपनी संस्कृति से काट देती है और हमारा अस्तित्व खत्म करती है.’

वे आगे कहते हैं, ‘फिर सब उजाड़ने के बाद पढ़े-लिखे बच्चे हमारे ही ऊपर शोध करने आते हैं. शोध करने के पहले और बाद भी वे हमारे बारे ज्यादा नहीं समझ पाते. आज पढ़े-लिखे शहरी लोगों को खुद ऐसी शिक्षा चाहिए, जो उन्हें सही मायने में इंसान बना सके.’

ओडिशा के मलकानगिरी में शिक्षकों के प्रशिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता हेमंत दलपती का कहना है, ‘आदिवासी, आधुनिक विकास के बुलडोजर से या तो मार दिए जाते हैं या मानसिक रूप से गुलाम बना लिए जाते हैं.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘यह आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के तहत उनकी संस्कृति और जीवन दर्शन को ख़त्म करते हुए होता है. इसके बाद वर्चस्ववादी व्यवस्था के भीतर आदिवासी पूरी जिंदगी उनकी तरह होने, उनकी हेय दृष्टि और जातिवादी दुर्भावना झेलने से जूझता रहता है. दूसरी तरफ वह अपने समाज को भी उनकी ही दृष्टि से देखता है या भ्रष्ट होते हुए उनके लिए मध्यस्थ का काम करता है.’

दलपती कहते हैं, ‘वर्चस्ववादी संस्कृति ने अपने लिए ऐसा शहर और समाज तैयार किया है, जहां सभ्यता के नाम पर सिर्फ उनके कपड़े और मकान के रंग बदले हैं. दूसरे समुदायों के प्रति आज भी वे उतने ही हिंसक और बर्बर हैं. इसलिए आदिवासियों के लिए आदिवासी नजरिये से तैयार पेडागोजी चाहिए. उसी से प्रकृति और इंसान दोनों के विकास का रास्ता खुल सकता है.’

छत्तीसगढ़ में जंगलों का गहन अध्ययन करने वाले नारायण मरकाम का मानना है कि आधुनिक शिक्षा में विकास के मायने ही गलत हैं.

वे कहते हैं, ‘प्रकृति में हर चीज एक दूसरे से जुड़ी हुई है. इसी से इसका संतुलन भी है और जीवन भी. प्रकृति में विकास का मतलब एक दूसरे से जुड़ा हुआ होना होता है. वहीं, आधुनिक शिक्षा में विकास शब्द का अर्थ हर चीज को एक दूसरे से काटना होता है. इस व्यवस्था में पूरे समाज का समान रूप से विकास संभव नहीं है.’

नारायण आगे कहते हैं, ‘विकास एक दूसरे से जुड़ते हुए, सहयोग करते हुए विकसित होने से ही संभव है. यह उन लोगों की श्रेष्ठतावादी मानसिकता से कभी नहीं हो सकता, जिसमें कुछ समुदायों को हमेशा निचले पायदान पर रखते हुए, उनका शोषण करते हुए, खुद को सभ्य और विकसित समझने की सोच हो.’

वे बात खत्म करते हुए कहते हैं, ‘आधुनिक शिक्षा अगर ऐसी मानसिकता से मुक्ति नहीं देती, तो उस शिक्षा व्यवस्था से आदिवासियों का ही नहीं किसी भी मनुष्य का विकास नहीं हो सकता है. इन बातों को आदिवासियों को ही नहीं, दूसरों को भी समझना होगा और शिक्षा-रोजगार दोनों के रास्ते आदिवासी नजरिये से ढूंढने होंगे.’

(जसिंता केरकेट्टा स्वतंत्र पत्रकार हैं.)