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मिड-डे मील से वंचित बच्चों में पोषण की कमी अधिक राशन देकर पूरी हो सकती है: विश्व खाद्य कार्यक्रम

संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम की ओर से कहा गया है कि कोविड-19 संकट के कारण कुपोषण को कम करने की पहल की प्रगति पर असर पड़ा और वर्तमान चुनौतियां और भी बढ़ गई हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (यूएनडब्ल्यूएफपी) के भारत के लिए कंट्री डायरेक्टर बिशो पराजुली ने कहा है कि कोविड-19 के कारण लगे लॉकडाउन में बच्चों को मध्याह्न भोजन नहीं मिल पाने के कारण पोषक तत्वों की जो कमी हुई है उसे पोषक भोजन शुरू करके, पोषण जरूरतों को पूरा करने पर ध्यान देकर तथा राशन की मात्रा बढ़ाकर कम किया जा सकता है.

पराजुली ने कहा कि भारत मध्याह्न भोजन के रूप में स्कूलों के जरिये भोजन उपलब्ध करवाने वाले सबसे बड़े कार्यक्रम का संचालन करता है, लेकिन कोविड-19 संकट के कारण कुपोषण को कम करने की पहल की प्रगति पर असर पड़ा और वर्तमान चुनौतियां और भी बढ़ गई हैं.

उन्होंने कहा, ‘हमें पता है कि महामारी के रोगियों की लगातार बढ़ती संख्या के बीच स्कूलों को खोलना और संचालित करना बहुत ही चुनौतीपूर्ण काम है. मध्याह्न भोजन बच्चों के लिए भोजन एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने का सबसे अच्छा मार्ग है, लेकिन सरकार कोरोना वायरस महामारी के चलते प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना के तहत आने वाले परिवारों के लिए अगले पांच महीने के लिए अतिरिक्त राशन जारी कर रही है, इससे बच्चों की भोजन संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी.’

उन्होंने लॉकडाउन और गर्मी की छुट्टियों के दौरान बच्चों को विभिन्न साधनों से मध्याह्न भोजन सुनिश्चित करने के केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के कदमों की सराहना की.

सरकार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को बच्चों को मध्याह्न भोजन उपलब्ध करवाने के संबंध दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिसमें कहा था कि इन्हें सूखे राशन के रूप में अथवा खाद्य सुरक्षा भत्ते के रूप में मुहैया करवाया जाए जिसमें अनाज का खर्च, भोजन पकाने का खर्च लाभांवितों के खातों में भेजा जाए, ताकि बच्चों की पोषण जरूरतें गर्मी की छुट्टियों में भी पूरी होती रहें और उनकी प्रतिरोधक क्षमता कायम रहे.

हालांकि, उन्होंने कहा कि योजना को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया है और सभी बच्चों तक नहीं पहुंच सका है, क्योंकि स्कूल बंद हैं और होम डिलीवरी आधारित योजना एक राज्य से दूसरे राज्य में भिन्न होती है.

उन्होंने कहा कि इसलिए खुद और अपने परिवार के भरण पोषण के लिए बाल श्रम के बढ़ने की संभावना अधिक हो गई है.

उन्होंने कहा, ‘महामारी का बच्चों और उनके परिवारों पर पड़ने वाले सामाजिक-आर्थिक प्रभाव और पोषक भोजन तक सीमित पहुंच का मतलब होगा कुपोषण में वृद्धि. इस चुनौती से निपटने के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है.’

लॉकडाउन के दौरान बीते जुलाई महीने में बिहार के भागलपुर ज़िले में मिड-डे मील बंद होने के कारण ग़रीब परिवार से आने वाले स्कूली बच्चों के कूड़ा बीनने और भीख मांगने के साथ ठेकेदारों के पास काम करने का मामला सामने आया था. ये मामला ज़िले के बडबिला गांव के मुसहरी टोला का था.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने इस संबंध में नाराजगी जाहिर की थी और केद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय तथा बिहार सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था.

द वायर  ने अपनी कई रिपोर्टों में बताया था कि किस तरह मिजोरम के अलावा पश्चिम बंगाल, दिल्ली, उत्तराखंड और त्रिपुरा में भी लॉकडाउन के दौरान मिड-डे मील योजना का सभी बच्चों को लाभ नहीं मिल पाया है.

उत्तराखंड राज्य ने अप्रैल और मई महीने में लगभग 1.38 लाख बच्चों को मिड-डे मील मुहैया नहीं कराया है, जबकि त्रिपुरा की भाजपा सरकार ने मिड-डे मील के एवज में छात्रों के खाते में कुछ राशि ट्रांसफर करने का आदेश दिया था, जो कि सिर्फ खाना पकाने के लिए निर्धारित राशि से भी कम है.

वहीं राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के बच्चों को अप्रैल से लेकर जून तक मिड-डे मील योजना के तहत खाद्यान्न या खाद्य सुरक्षा भत्ता (एफएसए) नहीं दिया गया है. पश्चिम बंगाल लॉकडाउन के दौरान बच्चों को सिर्फ आलू और चावल दिया है.

कोरोना महामारी के बीच उत्तर-पूर्व के राज्य मिजोरम के बच्चों को मिड-डे मील के तहत अप्रैल से लेकर जून तक खाना पकाने की राशि अभी नहीं मिली है.

इसके अलावा मार्च-अप्रैल में लॉकडाउन के दौरान बंद हुए स्कूलों के हर तीन में से लगभग एक बच्चे को मिड-डे मील के तहत पका हुआ भोजन या इसके एवज में राशन और खाना पकाने की राशि नहीं मिली है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)