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राष्ट्रीय डिजिटल हेल्थ मिशन की मसौदा नीति को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता जताई

विशेषज्ञों ने कहा है कि राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन का लक्ष्य दुनिया की सबसे बड़ी केंद्रीयकृत डिजिटल पहचान परियोजनाओं में से एक को लागू करना है, लेकिन वर्तमान मसौदा नीति में संरचनात्मक समस्याएं हैं तथा कई बातों को लेकर स्पष्टता भी नहीं है.

Doctor Health Medicine Reuters

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: पिछले महीने सरकार ने ‘राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन’ (एनडीएचएम) के तहत लोगों से एकत्रित गोपनीय स्वास्थ्य आंकड़ों की सुरक्षा के लिए मान्य कानूनों और विनियमों के अनुपालन के साथ ही न्यूनतम मापदंडों के एक प्रारूप का प्रस्ताव रखा था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 74वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर एनडीएचएम की घोषणा की थी. कार्यक्रम के मुताबिक मिशन के लिए नामांकित हर व्यक्ति को एक स्वास्थ्य पहचान-पत्र मिलेगा, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं तक उसकी पहुंच सुगम होने का दावा किया गया है.

अब इसे लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने ‘संस्थागत समस्याएं’ एवं ‘मरीजों की निजी जानकारियों की सुरक्षा’ पर चिंता जाहिर की है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, गैर-लाभकारी संस्था ‘एक्सेस नाउ’ में एशिया नीति निदेशक और वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय वकील रमन जीत सिंह चीमा ने कहा कि राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन का लक्ष्य दुनिया की सबसे बड़ी केंद्रीयकृत डिजिटल पहचान परियोजनाओं में से एक को लागू करना है, लेकिन वर्तमान मसौदा नीति में ‘संरचनात्मक समस्याएं’ हैं.

उन्होंने आगे कहा, ‘यह बिना किसी सांविधिक ढांचे के तहत जारी किया गया एक नीति दस्तावेज है और भारत के संघीय ढांचे को आंशिक रूप से प्रभावित करता है, क्योंकि स्वास्थ्य राज्य का विषय है. इस नीति के तहत यह स्पष्ट नहीं है कि क्या आपको हर बार सूचित किया जाएगा कि आपका डेटा इस्तेमाल किया जा रहा है या नहीं और यह स्पष्ट नहीं है कि कौन यह सुनिश्चित करेगा.’

चीमा ने आगे कहा, ‘अगर मैं कानून लागू करने वाली एजेंसी हूं और मैं आपके पूरे मेडिकल रिकॉर्ड्स को देखना चाहता हूं कि आपको किसने क्या दवा बेची और किस उद्देश्य के लिए, तो मैं ये आसानी से प्राप्त कर सकूंगा. ऐसा होने से रोकने के लिए कोई उपाय तंत्र इसमें मौजूद नहीं है.’

विशेषज्ञों ने इस संबंध में एक और समस्या की ओर ध्यान दिलाया कि यदि कोई अपना डेटा मिटाना चाहता है तो इसकी प्रक्रिया भी आसान नहीं है.

सेंटर फॉर इंटरनेट एंड सोसायटी में पॉलिसी ऑफिसर श्वेता मोहनदास ने कहा, ‘जहां तक डेटा को मिटाने का सवाल है तो इस पॉलिसी के तहत केवल कुछ परिस्थितियों में व्यक्तिगत डेटा मिटाने की इजाजत दी गई है.’

वहीं सिप्ला और ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स के लिए वकील और पूर्व वैश्विक महाप्रबंधक मुरली नीलकांतन ने कहा, ‘ये नीति मरीज को केवल यह अनुरोध करने देती है कि यदि वे अपनी सहमति वापस ले रहे हैं तो उनका डेटा मिटा दिया जाए, लेकिन इस अनुरोध को भी अस्वीकार किया जा सकता है. इससे मरीज को अपने स्वयं के डेटा पर अधिकार या नियंत्रण नहीं मिलेगा, क्योंकि इस नीति में कोई भी भूल होने का अधिकार नहीं है.’

उन्होंने आगे कहा कि इसमें यह भी स्पष्ट नहीं किया जाएगा कि किस डेटाबेस में संबंधित मरीज की जानकारी उपलब्ध होगी.

बता दें कि ‘आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) ने लोगों के लिए ‘स्वास्थ्य आंकड़ा प्रबंधन नीति’ का मसौदा जारी किया है.

एनएचए को ही एनडीएचएम की रूपरेखा तैयार करने और उसे अमलीजामा पहनाने का जिम्मा सौंपा गया है. यह मसौदा राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन की सरकारी वेबसाइट पर डाला गया है और उस पर लोगों से 21 सितंबर तक राय मांगी गई है.

इस मसौदा नीति में ‘व्यक्तियों के निजी एवं संवेदनशील आंकड़ों के सुरक्षित उपयोग/रखरखाव’ के लिए एक प्रारूप तैयार करने की कोशिश की गई है. ये आंकड़े राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य पारितंत्र का हिस्सा हैं.

दस्तावेज के अनुसार, एनडीएचएम के तहत जुटाए गए आंकड़े केंद्रीय स्तर पर, राज्य या केंद्रशासित स्तर और स्वास्थ्य सुविधा केंद्र पर न्यूनता के सिद्धांत का पालन करते हुए संभालकर रखे जाएंगे.

ड्राफ्ट के अनुसार, संघीय ढांचे में ऐसे प्रारूप का विकास जरूरी हो जाता है जिसका गोपनीय स्वास्थ्य आंकड़ों की निजता की सुरक्षा के लिए पूरे एनडीएचएम में इस्तेमाल किया जा सके.