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साल 2016 से जेएनयू प्रशासन के ख़िलाफ़ केस बढ़ने के कारण इसके क़ानूनी ख़र्च में इज़ाफ़ा: रिपोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट की वेबसाइट के मुताबिक, साल 2016-20 के दौरान जेएनयू प्रशासन के ख़िलाफ़ 183 केस दायर किए गए हैं. यह आंकड़ा साल 2011-15 के दौरान दर्ज मामलों की तुलना में चार गुना है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय. (फोटो: शोम बसु)

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय. (फोटो: शोम बसु)

नई दिल्ली: साल 2016 से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के कानूनी खर्च में काफी इजाफा हुआ है. इसकी प्रमुख वजह ये है कि पिछले कुछ वर्षों में जेएनयू के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में कई केस दायर किए गए हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली हाईकोर्ट की वेबसाइट के मुताबिक साल 2016-20 के दौरान जेएनयू प्रशासन के खिलाफ 183 केस दायर किए गए हैं यानी कि हर साल औसतन 37 केस दायर किए गए.

यह साल 2011-15 के दौरान दायर किए कुल 47 केस की तुलना में चार गुना है. इस बीच प्रति साल औसतन नौ केस दायर किए गए थे.

मालूम हो कि साल 2016 से प्रशासन और छात्रों के बीच कई सारे मुद्दों को लेकर अनबन बनी हुई है. इसमें प्रशासनिक कार्रवाई, फैकल्टी नियुक्ति, डीन एवं अध्यक्षों की नियुक्ति जैसे कई मामले शामिल हैं.

बीते सात सितंबर को कार्यकारिणी समिति की हुई बैठक में विश्वविद्यालय ने 30 लाख रुपये के अतिरिक्त फंड की स्वीकृति दी. इस दौरान बताया गया कि कानूनी मामलों के लिए आवंटित 9.40 लाख रुपये को पहले ही खर्च किए जा रहे हैं और इस वित्त वर्ष में 18 लाख रुपये के बिल का भुगतान होना अभी बाकी है.

हाईकोर्ट की वेबसाइट के मुताबिक, जेएनयू के खिलाफ साल 2016 से लेकर 2020 के बीच 28, 24, 52 और 20 मामले दायर किए गए थे. वहीं 2011 से 2015 के बीच जेएनयू के खिलाफ 7, 3, 12, 14, और 11 मामले दायर किए गए थे.

जेएनयू के वित्तीय रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि 2016 के बाद से विश्वविद्यालय के कानूनी खर्च में बढ़ोतरी हुई है. साल 2016-17 में संस्थान ने इसके लिए 4.55 लाख रुपये खर्च किए और 2017-18 में 2.72 लाख रुपये खर्च किए.

इसी तरह जेएनयू ने 2018-19 में 17.72 लाख रुपये केस वगैरह लड़ने में खर्च किया था. साल 2019-20 के आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं.

जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन के सचिव सुरजीत मजूमदार ने कहा, ‘प्रशासन द्वारा उच्च स्तर की अनियमितताओं के कारण मुकदमेबाजी में बढ़ोतरी होती है. यहां का शिकायत निवारण तंत्र खत्म हो चुका है, क्योंकि प्रशासन विश्वविद्यालय समुदाय के साथ बातचीत नहीं चाहता है. यह अतिरिक्त राशि कहां से आ रही है?’

वहीं रजिस्ट्रार प्रमोद कुमार ने कहा, ‘हमारे पास विविध कार्यों के लिए निधि है, हम वहां से धन का उपयोग कर रहे हैं. हमें किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं है. मामलों में वृद्धि इसलिए हो रही है क्योंकि लोग छोटे-मोटे मुद्दों पर अदालत जा रहे हैं. हम (अदालत में) नहीं जा रहे हैं, तो हम क्या कह सकते हैं?’