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पंजाब: पूर्व डीजीपी को सुप्रीम कोर्ट से संरक्षण मिलने के बाद फ़र्ज़ी मुठभेड़ के अन्य पीड़ित सामने आए

पंजाब में उग्रवाद के दौरान राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक सुमेध सिंह सैनी पर प्रताड़ना, लोगों को गायब कराने का आदेश देने और फ़र्ज़ी मुठभेड़ में हत्याएं कराने के कई आरोप लगे हैं.

फाइल फोटो: बलवंत सिंह मुल्तानी.

फाइल फोटो: बलवंत सिंह मुल्तानी.

जालंधर: सुप्रीम कोर्ट ने 1991 में बलवंत सिंह मुल्तानी के लापता होने और हत्या के मामले में पूर्व डीजीपी सुमेध सिंह सैनी को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण दे दिया है.

हालांकि, अदालत के फैसले से असंतुष्टि जताते हुए पीड़ित के परिवार ने लड़ाई जारी रखने का फैसला किया है.

वहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब अन्य पीड़ितों के परिजन भी लड़ाई जारी रखने का साहस जुटा रहे हैं, जो पहले नहीं बोल रहे थे.

मुल्तानी के अलावा चंडीगढ़ के पास स्थित रोपड़ से भी एक कथित फर्जी मुठभेड़ का मामला सामने आया है. पीड़ित गुरमीत सिंह के भाई ने आरोप लगाया है कि गुरमीत को भी गैरकानूनी तौर पर हिरासत में लिया गया था और हिरासत में ही हत्या कर दी गई.

सैनी को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में पेश किए जाने से दस दिन पहले मुल्तानी मामले में मोड़ आया था.

शीर्ष अदालत ने बीते 15 सितंबर को सैनी की अग्रिम जमानत मांगने वाली याचिका पर पंजाब सरकार को नोटिस जारी किया और तीन हफ्तों में जवाब मांगा था. इसमें सैनी को भी जवाब दाखिल करने के लिए एक हफ्ते का समय दिया गया था.

शीर्ष अदालत ने सैनी को पंजाब पुलिस को जांच में सहयोग करने के लिए कहा है.

वर्ष 1991 में 18 दिसंबर को (पंजाब में उग्रवाद के दिनों के दौरान) भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी दर्शन सिंह मुल्तानी के बेटे बलवंत सिंह मुल्तानी की हत्या (उग्रवादी होने के संदेह में) के मामले में 1982 बैच के भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी और पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) सुमेध सिंह सैनी बीते 29 साल से वांछित हैं.

द वायर  से बात करते हुए एक आईपीएस अधिकारी से वकील बने प्रदीप विर्क, जो शिकायतकर्ता के वकील हैं, ने कहा, ‘जो लोग 29 साल से इंतजार कर रहे हैं, वे कुछ और दिन भी इंतजार कर सकते हैं. यह एक लंबी लड़ाई है. यह ईश्वर में हमारे विश्वास के कारण है कि मैंने और बलवंत सिंह मुल्तानी के परिवार ने उम्मीद नहीं खोई. हमें यकीन है कि न्याय होगा, जैसा कि मैं सत्यमेव जयते में विश्वास करता हूं.’

विर्क ने बताया कि एक समय था जब यह मामला लगभग बंद हो गया था, लेकिन फिर एक प्राथमिकी दर्ज की गई और सैनी के खिलाफ छापे मारे गए.

उन्होंने कहा, ‘बलवंत सिंह मुल्तानी आतंकवादी नहीं थे, वह एक निर्दोष व्यक्ति थे. लेकिन फिर भी उन्हें पुलिस द्वारा उठाया गया, अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और प्रताड़ित किया गया. अब शीर्ष अदालत ने सैनी को पंजाब पुलिस को जांच में सहयोग करने के लिए कहा है. यदि वह सहयोग नहीं करते हैं, तो मामला दर्ज करने वाली एसआईटी आगे की कार्रवाई के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाएगी.’

वकील ने यह भी कहा कि अगर लोग इस तरह के जबरन गायब होने या फर्जी मुठभेड़ के मामलों के बारे में कुछ भी जानते हैं या आगे आना चाहते हैं तो उन्हें सामने आना चाहिए.

विर्क पंजाब के पूर्व डीजीपी एसएस विर्क के बेटे हैं, जो मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के पिछले कार्यकाल के दौरान (2002 से 2007 तक) सेवा में थे. उन्होंने कानून को पेशा अपनाने के लिए आईपीएस प्रशिक्षण पूरा होने से ठीक पहले  छोड़ दिया था.

क्या है मामला?

1991 में एक आतंकवादी हमला हुआ, जिसमें पूर्व डीजीपी सुमेध सिंह सैनी घायल हो गए थे और उनकी सुरक्षा में तैनात तीन पुलिसकर्मियों की मौत हो गई थी.

सैनी का मानना था कि बलवंत सिंह मुल्तानी को हमले के पीछे संदिग्ध मास्टरमाइंड देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर के ठिकाने का पता था. वर्तमान में भुल्लर 1993 के दिल्ली बम विस्फोट मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है.

एफआईआर में मुल्तानी के जालंधर स्थित भाई पलविंदर सिंह ने कहा है, ‘मेरे भाई बलवंत सिंह मुल्तानी चंडीगढ़ इंडस्ट्रियल एंड टूरिज्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (सीआईटीसीओ) में जूनियर इंजीनियर के रूप में कार्यरत थे और मोहाली में रहते थे. उन्हें चंडीगढ़ पुलिस की एक टीम ने 11 दिसंबर, 1991 को उनके घर से उठाया और तत्कालीन एसएसपी चंडीगढ़ सुमेध सिंह सैनी के आदेश पर सेक्टर -17 पुलिस स्टेशन ले जाया गया.’

वे कहते हैं, ‘मेरे पिता ने मेरे भाई की रिहाई के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. पुलिस प्रताड़ना के दौरान थर्ड डिग्री के इस्तेमाल से बलवंत सिंह मुल्तानी ने दम तोड़ दिया.’

सैनी ने कथित तौर पर गलत तरीके से दर्शाया कि उप-निरीक्षक जागीर सिंह 18 दिसंबर, 1991 को बलवंत को बटाला जिले के कादियान ले गए थे, जहां मृतक को घोषित अपराधी के रूप में दिखाया गया था.

पलविंदर सिंह ने मामले को फिर से खोलने के लिए तब मोहाली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जब पंजाब पुलिस के दो पूर्व पुलिसकर्मियों जागीर सिंह और कुलदीप सिंह ने हाईकोर्ट को दिए अपने बयान में कहा कि उन्होंने देखा था कि कैसे सुमेध सिंह सैनी ने बलवंत सिंह मुल्तानी को प्रताड़ित किया और फिर उन्हें बेहोशी की हालत में एक वाहन में स्थानांतरित कर दिया गया.

पुलिसकर्मियों ने यह भी दावा किया था कि उन्होंने सैनी के आदेशों का पालन करते हुए मुल्तानी को लापता और फरार घोषित कर दिया था.

अवैध अपहरण, अमानवीय अत्याचार के लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 364, 201, 344, 330, 219 और 120B के तहत अमानवीय यातना और बलवंत सिंह मुल्तानी की फर्जी गुमशुदगी का मुकदमा 6 मई, 2020 को जिला एसएएस नगर, मोहाली के मातापुर पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था.

हालांकि, एफआईआर में 21 अगस्त, 2020 को आईपीसी की धारा 302 (हत्या के लिए सजा) को जोड़ने के बाद, जब सुमेध सिंह सैनी को पकड़ने के लिए पुलिस ने पंजाब, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली में छापे मारे थे तब वह अपनी जेड श्रेणी की सुरक्षा को छोड़कर फरार हो गए.

गुरमीत सिंह मामला

रोपड़ के एक सरकारी कॉलेज के 21 वर्षीय छात्र गुरमीत सिंह को 4 मई, 1991 को चंडीगढ़ के तत्कालीन एसएसपी सुमेध सिंह सैनी के कहने पर कथित रूप से उनके कॉलेज के बाहर से उठाया गया था.

गुरमीत सिंह की तस्वीर दिखाते उनके भाई रंजीत सिंह.

गुरमीत सिंह की तस्वीर दिखाते उनके भाई रंजीत सिंह.

चंडीगढ़ के पास रोपड़ स्थित पक्का बाग में रहने वाले गुरमीत सिंह के छोटे भाई रंजीत सिंह (अब 45 वर्षीय) ने कहा, ‘16 साल की उम्र में मुझे भी अवैध हिरासत में रखा गया था और 17 दिनों तक क्रूरतापूर्वक प्रताड़ित किया गया था. मुझे अब भी याद है कि कैसे सैनी कमरे में आए और उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने मेरे भाई को मार दिया है.’

रंजीत आगे कहते हैं, ‘सैनी ने मुझसे कहा कि अगर तुम जीवित रहना चाहते हो तो अपने चाचा को अपनी हद में रहने के लिए कहो वरना फिर दूसरी दुनिया में जाने के लिए तैयार हो जाओ. मेरी बहनों और मां को भी पीटा गया था. आज तक हम डर के कारण चुप रहे, लेकिन मुल्तानी के मामले ने हमें डीजीपी सैनी के खिलाफ बोलने का साहस दिया.’

रंजीत सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भारत के मुख्य न्यायाधीश और पंजाब और हरियाणा के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा था, जिसमें गुरमीत की हत्या की निष्पक्ष जांच एजेंसी से जांच की मांग की गई थी.

सिंह बताते हैं कि उनके भाई कॉलेज में ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट फेडरेशन से जुड़े थे और उन्हें उग्रवाद के दौरान पुलिसिया कार्रवाई में मारे गए अपने दोस्त के लिए अखंड पाठ आयोजित करने के लिए उठाए गए थे.

उन्होने कहा कि जब उनके चाचा साधू सिंह उनके भाई गुरमीत को देखने सीआईए स्टाफ पटियाला गए थे, तब उन्होंने देखा था कि उनके भाई को इतना प्रताड़ित किया गया था कि वह न तो चल पा रहे थे, न बोल पा रहे थे और न ही कुछ खा पा रहे थे. उन्होंने सैनी को पुलिस पर एक धब्बा बताया.

रोपड़ के वकील कुलवंत सिंह का मामला

रंजीत सिंह ने आरोप लगाया, ‘रोपड़ के अधिवक्ता कुलवंत सिंह, उनकी पत्नी और बेटे को भी सैनी ने कथित रूप से मार दिया था. कुलवंत की कार भाखड़ा नहर के पास छोड़ दी गई थी और उनका और उनके परिवार का कुछ पता नहीं चल पाया था.’

लुधियाना के विनोद कुमार का मामला

पूर्व डीजीपी सैनी पर गायब होने के एक अन्य मामले का भी आरोप है जिसमें वह दिल्ली की विशेष सीबीआई अदालत में मुकदमे का सामना कर रहे हैं.

15 मार्च, 1994 को लुधियाना के व्यवसायी विनोद, उनके बहनोई अशोक कुमार और उनके ड्राइवर मुख्तियार सिंह को अगवा कर लिया गया और अवैध रूप से हिरासत में लिया गया. उनके शव कभी नहीं मिले. विनोद की मां ने 2017 में 102 वर्ष की आयु में अपनी मृत्यु तक केस लड़ा.

बेहबल कलां गोलीबारी, 2015

डीजीपी सैनी के खिलाफ साल 2015 के बेहबल कलां गोलीबारी मामले की भी जांच चल रही है. सैनी के डीजीपी पंजाब रहने के दौरान पुलिस ने गुरु ग्रंथ साहिब के अपमान के खिलाफ प्रदर्शन कर रही भीड़ पर गोलियां चला दी थीं, जिसमें 14 अक्टूबर, 2015 को बेहबल कलां गांव में दो सिख युवकों की मौत हो गई थी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)