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पंजाब: लुधियाना में प्रस्तावित औद्योगिक पार्क से मत्तेवाड़ा जंगल और सतलुज नदी पर गंभीर ख़तरा

मत्तेवाड़ा जंगल कई पक्षियों, बंदरों, हिरणों, मृगों, जंगली सूअर, नीलगाय और मोरों इत्यादि का घर माना जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह लुधियाना शहर के लिए फेफड़े का काम करता है. अगर पंजाब सरकार द्वारा प्रस्तावित औद्योगिक पार्क बनता है तो इससे न सिर्फ़ वन्यजीव, बल्कि मानव जीवन भी बुरी तरह प्रभावित होगा.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

पंजाब कैबिनेट ने लुधियाना जिले में मत्तेवाड़ा जंगल और सतलुज नदी के पास एक औद्योगिक पार्क को मंजूरी दी है. इस विवादित परियोजना लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जबकि सरकार का कहना है कि इससे अर्थव्यवस्था और पर्यावरण की क्षमता को बढ़ावा मिलेगा.

बीते जुलाई महीने में हुए कैबिनेट निर्णय के अनुसार, यह औद्योगिक पार्क 955.67 एकड़ में स्थापित किया जाएगा, जिसमें से 207.07 एकड़ पशुपालन विभाग, 285.1 एकड़ पुनर्वास विभाग (आलू बीज फार्म) और 416.1 एकड़ सेखोवाल ग्राम पंचायत, 27.1 एकड़ सलेमपुर ग्राम पंचायत तथा 20.3 एकड़ सेलकलान ग्राम पंचायत की जमीन है.

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट, 2019 के अनुसार, पंजाब का वन क्षेत्र उसके कुल भूभाग का 6 प्रतिशत से अधिक नहीं है. आरक्षित और संरक्षित वन क्षेत्र की सीमा 2.34 प्रतिशत (50,362 वर्ग किमी के कुल भौगोलिक क्षेत्र की तुलना में मात्र 1,181 वर्ग किमी) है.

लुधियाना के एक प्रमुख पर्यावरण कार्यकर्ता और व्यवसायी रणजोध सिंह परियोजना के खिलाफ सार्वजनिक समर्थन जुटा रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी को कैसे सुरक्षित किया जा सकेगा, जब परियोजना की जमीन (पशुपालन विभाग से संबंधित) का एक हिस्सा सड़क के बिल्कुल उस पार है, जहां से मत्तेवाड़ा जंगल क्षेत्र की सीमा शुरू होती है?’

वहीं इस परियोजना का दूसरा हिस्सा हैदर नगर और सतलुज नदी में एक और संरक्षित वन के साथ एक सीमा साझा करता है. उन्होंने कहा कि लुधियाना से मानव और औद्योगिक अपशिष्टों के बहाव के कारण नदी पहले ही बहुत प्रदूषित हो गई है.

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 18 जुलाई को एक बयान जारी कर कहा था कि राज्य सरकार पार्क को विकसित करने के लिए एक इंच भी वन भूमि नहीं लेगा और इसके पास औद्योगिक अपशिष्टों से निपटने के लिए उचित सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र (सीईटीपी) स्थापित किए जाएंगे.

हालांकि पर्यावरणविद बाबा बलबीर सिंह सीचेवाल जैसे लोगों ने परियोजना को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है.

सीचेवाल ने कहा, ‘राज्य सरकार भले ही वन भूमि का उपयोग नहीं कर रही हो, लेकिन क्या वे यह गारंटी दे सकते हैं कि औद्योगिक पार्क बनने के बाद वन के वनस्पतियों और जीवों को ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण और भारी मानवीय गतिविधियों से परेशान नहीं होना पड़ेगा?’

ईको-सिख जैसे गैर-सरकारी संगठनों और 70 प्रकृति प्रेमियों के एक समूह ने 20 जुलाई को राज्य सरकार को पहले ही एक कानूनी नोटिस दिया है, जिसमें इस परियोजना को रोकने की मांग की गई है, क्योंकि यह क्षेत्र के पारिस्थितिकी संतुलन को प्रभावित करेगा.

इनका प्रतिनिधित्व करने वाले वकील रोहित मेहता ने कहा, ‘पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में परियोजना के खिलाफ हमारी याचिका दो सप्ताह के भीतर आने की उम्मीद है. कुछ संबंधित दस्तावेजों के नहीं होने के चलते पिछले महीने (अगस्त) में याचिका दायर करने में देरी हो गई.’

जैव विविधता में समृद्ध, संरक्षण में कमी

2,300 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैला मत्तेवाड़ा वन कई पक्षियों, बंदरों, हिरणों, सांबर, मृगों, जंगली सूअर, नीलगाय, और मोरों का घर है. यह बॉटेनिकल एंड बटरफ्लाई गार्डन लुधियाना के वन विभाग द्वारा संचालित किए जाने वाले बेहतरीन और सबसे तेजी से विकसित होने वाले उद्यानों में से एक है.

लुधियाना में तैनात एक वरिष्ठ वन्यजीव अधिकारी खुशविंदर सिंह गिल ने कहा कि मत्तेवाड़ा जंगल शेर, चीते, तेदुए आदि के लिए भी प्राकृतिक गलियारों का हिस्सा है. उदाहरण के लिए आनंदपुर साहिब और रोपड़ क्षेत्र के जंगलों से गुजरने वाले तेंदुओं को मत्तेवाड़ा में देखा जा सकता है.

जैव विविधता में समृद्ध होने के बावजूद जंगल को कभी भी संरक्षित वन श्रेणी से अधिक कठोर आरक्षित वन या वन्यजीव अभयारण्य श्रेणी में नहीं ले जाया गया, जिससे आसपास के क्षेत्र में वाणिज्यिक और आवासीय गतिविधियों को रोका जा सके.

राज्य सरकार को कानूनी नोटिस देने वाले समूह का नेतृत्व करने वाले अश्विंदर सेठी ने कहा कि पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में औद्योगिकीकरण के लिए राज्य की बेताबी निराशाजनक है और यह पर्यावरण विरोधी मानसिकता को दर्शाता है.

उन्होंने कहा, ‘मत्तेवाड़ा लुधियाना जैसे शहर के लिए फेफड़ों की तरह काम करता है, जो बड़े पैमाने पर औद्योगिक गतिविधियों के कारण बहुत प्रदूषित हो गया है. अगर इस परियोजना नहीं रोका जाता है, तो अगले कुछ वर्षों में यह बर्बाद हो जाएगा.’

पंजाब सरकार के उद्योग और वाणिज्य विभाग के निदेशक सिबीन सी. ने कहा कि परियोजना शुरू करने से पहले राज्य सभी पर्यावरणीय दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करेगा.

उन्होंने आगे कहा, ‘भारत सरकार के स्तर पर उचित पर्यावरणीय मंजूरी होगी, जहां पर्यावरण के दृष्टिकोण से परियोजना के सभी पहलुओं का आकलन किया जाएगा.’

हालांकि गैर सरकारी संगठन ईको-सिख के एक सदस्य जसकीरत सिंह ने कहा कि ये सभी रिपोर्ट अक्सर ‘भ्रामक’ होती हैं, क्योंकि अधिकतर मामलों में पर्यावरण संबंधी चिंताओं को दरकिनार कर आर्थिक विकास को तरजीह दे दी जाती है.

सिबिन ने जानकारी दी कि परियोजना के शुरू होने से पहले उचित पर्यावरणीय मूल्यांकन होगा. औद्योगिक पार्क ऐसे स्थानीय उद्योगों को लुधियाना शहर की सीमा से बाहर स्थानांतरित कर देगा, जो शहर के मास्टर प्लान के अनुरूप नहीं होंगे.

लुधियाना स्थित फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष गुरमीत सिंह कुलार ने कहा कि जब राज्य सरकार धनान्सू इंडस्ट्रियल फोकल पॉइंट को बनाने विफल रही है, जो कि चंडीगढ़-लुधियाना रोड पर बनाने के लिए साल 2013 में प्रस्तावित हुआ था, ऐसे में नई औद्योगिक टाउनशिप को लेकर इसके उद्देश्यों पर काफी संदेह है.

उन्होंने कहा, ‘एक नया प्रोजेक्ट बनाने पर सार्वजनिक धन खर्च करने से पहले क्यों न उन औद्योगिक शहरों को अपग्रेड किया जाए जिसका पूरा उपयोग नहीं किया जा सका है.’

कुलदीप सिंह खैहरा ने इस परियोजना से लड़ने के लिए एक 12 सदस्यीय पब्लिक एक्शन कमेटी का गठन किया है. उन्होंने कहा कि यदि राज्य की योजना उन्हें लुधियाना से स्थानांतरित करना है, तो इसके चलते सभी प्रकार की रेड श्रेणी (खतरनाक) के उद्योग मट्टेवाड़ा में बस जाएंगे.

उन्होंने कहा, ‘अगर ऐसा होता है तो यह यहां की पारिस्थितिकी का अंत होगा.’

सिंह ने कहा कि राज्य की एंटी-इकोलॉजिकल चिंताओं में कोई नई बात नहीं है. उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ की प्रतिष्ठित सुखना झील को बचाने के लिए आवश्यक कदम के रूप में सुखना वन्यजीव अभयारण्य के आसपास को पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र घोषित करना अभी बाकी है. यह स्थिति पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद है.

नदी के किनारे का औद्योगिक विकास

पर्यावरणविदों की एक और चिंता यह है कि प्रस्तावित परियोजना का एक हिस्सा सतलुज नदी के तट को छूता है. इस तथ्य की लुधियाना के उपायुक्त वरिंदर कुमार शर्मा द्वारा 14 जुलाई को उनके एक मीडिया बयान में पुष्टि की जा चुकी है.

यह साल 2018 के एक औद्योगिक दुर्घटना की याद दिलाता है जब ब्यास नदी के तट पर स्थित एक चीनी मिल से रासायनिक द्रव के निकलने से पानी प्रदूषित हो गया और अनगिनत मछलियों एवं जलीय जानवरों की मौत हो गई थी.

पंजाब पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (पीपीसीबी) के तत्कालीन अध्यक्ष काहन सिंह पन्नू ने कहा था कि जल निकायों के करीब उद्योगों को अनुमति नहीं देने की कोई नीति नहीं थी, लेकिन यह प्रकरण इस तरह की नीति का रास्ता बनाएगा.

फरीदकोट स्थित भाई गनहिया कैंसर रोको सोसाइटी के संयोजक गुरप्रीत सिंह चंदबाजा ने कहा, ‘मत्तेवाड़ा औद्योगिक पार्क योजना यह दर्शाती है कि नदी के किनारों पर उद्योग स्थापित करने के परिणामों का राज्य को पूरी तरह अंदाजा नहीं है.’

चंदबाजा ने कहा कि राज्य के जल निकाय मुख्य रूप से नालियों और नदियों के किनारे उद्योग स्थापित करने के कारण प्रदूषित हो गए. पीपीसीबी ने उन पर नजर रखने के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाए, लेकिन चीजें नहीं बदलीं.

उन्होंने कहा कि लुधियाना में बुद्धा नाला, जो सतलुज नदी में अधिकतम गंदगी पहुंचाने का काम करता है, यह इस बात का एक उदाहरण है कि शहर की मरती हुई कपड़ा इकाइयां और अन्य भारी रासायनिक उद्योगों ने कठोर पर्यावरणीय नियम होने के बावजूद इसे खत्म करने का काम किया है.

उन्होंने आगे कहा, ‘हम मानते हैं कि कपड़ा उद्योग ने बुद्धा नाले के लिए जो किया, वही प्रस्तावित औद्योगिक पार्क के कारण सतलुज के साथ भी होगा. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि राज्य सीईटीपी (कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट पार्क) स्थापित करने का दावा कर रहा है.’

चंदबाजा ने कहा, ‘हम 10 सालों से इंतजार कर रहे हैं कि सीईटीपी बुद्धा नाले के प्रदूषण को खत्म कर दे, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है.’

पीपीसीबी के सदस्य सचिव क्रुनेश गर्ग ने कहा कि बुद्धा नाले के पास एक सीईटीपी स्थापित किया जा रहा है और यह साल के अंत तक पूरा हो जाएगा. इसके अतिरिक्त, लुधियाना और जालंधर में चार स्थानों पर चार सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने की आवश्यकता है, जो राज्य सरकार के पास विचाराधीन हैं.

उन्होंने बताया कि पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानदंडों के अनुसार, लुधियाना और जालंधर के आसपास सतलुज नदी को ई-श्रेणी (अत्यंत प्रदूषित जलधारा) में वर्गीकृत किया गया है. उन्होंने कहा, ‘हमने इसे बी-श्रेणी में लाने की योजना बनाई है और फिर चरणबद्ध तरीके से ए-श्रेणी में लाया जाएगा.’

पीपीसीबी मानदंडों के अनुसार, बी-श्रेणी को मध्यम प्रदूषित है और ए-श्रेणी साफ जलधारा कहते हैं.

प्रस्तावित मत्तेवाड़ा पार्क पर उन्होंने कहा कि ये परियोजना अभी प्रारंभिक चरण में है. उन्होंने कहा, ‘जब यह प्रस्ताव हमारे पास आवश्यक अनुमतियों के लिए आएगा, तो हम केवल इसका मूल्यांकन करने में सक्षम होंगे.’

सेखोवाल गांव ने अपनी जमीन देने से किया इनकार

इस बीच सेखोवाल गांव, जो कि लुधियाना कस्बे से करीब 20 किमी दूर है, ने प्रस्तावित प्रोजेक्ट के लिए अपनी 416 एकड़ भूमि देने से इनकार कर दिया है.

पूर्व सरपंच धिरा सिंह ने बताया कि मौजूदा सरपंच अमरीक कौर द्वारा एक बैठक बुलाई गई थी, जिसमें गांव की जमीन पर औद्योगिक प्रोजेक्ट लगाने के खिलाफ 22 जुलाई को एक प्रस्ताव पारित किया गया है.

उन्होंने कहा, ‘ग्राम सभा की बैठक के दौरान सरपंच अमरीक कौर ने ग्रामीणों को बताया कि स्थानीय प्रशासन ने झूठ बोलकर उनसे गांव की जमीन के अधिग्रहण के कागज पर हस्ताक्षर करवा लिए. इसे अब संवैधानिक रूप से वैध प्रस्ताव पारित करके खारिज कर दिया गया है. अगर सरकार हमारी जमीन को जबरन अधिग्रहित करने की कोशिश करती है, तो हम अदालत जाएंगे.’

एक ग्रामीण मनजिंदर सिंह बावा ने कहा कि गांव में अधिकांश आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है. उन्होंने कहा कि अगर सरकार उनसे जमीन छीन लेती है तो उनकी आजीविका खतरे में पड़ जाएगी.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. यह लेख मूल रूप से मोंगाबे पर प्रकाशित हुआ है.)