राजनीति

विदेशी चंदा क़ानून में संशोधन सरकार द्वारा प्रतिरोध की आवाज़ दबाने की कोशिश है: विपक्ष

विदेशी अंशदान विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020 लोकसभा में पेश कर दिया गया है. विधेयक के लक्ष्य और कारणों में कहा गया है कि साल 2010 और 2019 के बीच विदेशी योगदान की वार्षिक आमद लगभग दोगुनी हो गई है, लेकिन इसके कई प्राप्तकर्ताओं ने इस धन को उस उद्देश्य के लिए उपयोग नहीं किया है जिसके लिए उन्हें पंजीकृत किया गया था.

Stacks of one hundred dollar notes are piled up for counting at the headquarters of the Korea Exchange Bank in Seoul February 3, 2009. South Korea's central bank said on Tuesday that it injected $1.3 billion out of a planned $2 billion into local money markets via 3-month swap deals for the first time so far this year. REUTERS/Jo Yong-Hak (SOUTH KOREA) - RTXB666

(प्रतीकात्मक तस्वीर: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: विपक्ष ने विदेशी अंशदान विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020 यानी कि एफसीआरए में संशोधन का ये कहते हुए विरोध किया कि सरकार इसके जरिये ‘आलोचकों पर निशाना’ साधना चाह रही है. हालांकि सरकार का कहना है कि इसके जरिये किसी के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा.

बीते रविवार को लोकसभा में पेश विधेयक में प्रावधान किया गया है कि केंद्र किसी एनजीओ या एसोसिएशन को अपना एफसीआरए प्रमाण-पत्र वापस करने की अनुमति दे सकेगा. यह संशोधन विदेशों से मिलने वाले चंदे से संबंधित नियमों को और कड़ा बनाने के लिए किया गया है.

विधेयक में कहा गया है कि कानून को और मजबूत करने की आवश्यकता इसलिए बढ़ गई, क्योंकि तमाम संगठनों द्वारा धन की हेराफेरी की जा रही है.

मसौदा विधेयक में कहा गया है कि कुल विदेशी कोष का 20 प्रतिशत से ज्यादा प्रशासनिक खर्च में इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. वर्तमान में यह सीमा 50 प्रतिशत है.

विधेयक के लक्ष्य और कारणों के बारे में बयान में कहा गया है, ‘विदेशी अंशदान (योगदान) विधेयक 2010 को लोगों या एसोसिएशन या कंपनियों द्वारा विदेशी योगदान के इस्तेमाल को नियमित करने के लिए लागू किया गया था. राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पहुंचाने वाली किसी भी गतिविधि के लिए विदेशी योगदान को लेने या इसके इस्तेमाल पर पाबंदी है.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी और उनके पार्टी सहयोगी मनीष तिवारी ने कहा कि इस विधेयक के जरिये सरकार को ‘प्रतिरोध की आवाज’ को दबाने के लिए और शक्तियां मिल जाएंगी.

आधार अनिवार्य करने के विधेयक के एक प्रावधान का विरोध करते हुए तिवारी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार सरकार को ऐसा करने की मनाही है.

ये कहते हुए कि साल 2011 में लाए गए इस कानून के बाद से परिस्थितियां काफी बदल गई हैं, उन्होंने कहा, ‘अब इसका इस्तेमाल उन लोगों के खिलाफ किया जा रहा है जो कि सरकार का विरोध करते हैं.’

मसौदे में कहा गया है कि यह कानून एक मई 2011 को लागू हुआ था और दो बार इसमें संशोधन हुआ. वित्त कानून की धारा 236 के जरिये पहला संशोधन हुआ और वित्त कानून, 2018 की धारा 220 से दूसरा संशोधन हुआ.

इसमें कहा गया है कि हर साल हजारों करोड़ रुपये के विदेशी योगदान के इस्तेमाल और समाज कल्याण का काम करने वाले ‘वास्तविक’ गैर सरकारी संगठन या एसोसिएशन और भुगतान में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए संशोधन किया जाना जरूरी है.

तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत राय ने कहा कि इस विधेयक का मकसद हर जगह निगरानी करना है और सरकार विदेशी अनुदानों को रोकना चाह रही है, जिसके जरिये आदिवासी एवं ग्रामीण क्षेत्र समेत कई जगहों पर सामजिक संगठनों का कार्य चलता है.

गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने दावा किया कि इस विधेयक के प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध नहीं हैं.

मसौदा विधेयक में कहा गया है कि एफसीआरए के तहत पूर्व अनुमति या पंजीकरण अथवा एफसीआरए के लाइसेंस नवीकरण का अनुरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति को अब अपने सभी पदाधिकारियों या निदेशकों के आधार नंबर देने होंगे, विदेशी नागरिक होने की स्थिति में पासपोर्ट की एक प्रति या ओसीआई कार्ड की प्रति देना जरूरी होगा.

इसमें ‘लोक सेवक’ और ‘सरकार या इसके नियंत्रण वाले निगम’ को ऐसी इकाइयों की सूची में शामिल करने का प्रस्ताव दिया गया है, जो विदेशी अनुदान हासिल करने के योग्य नहीं होंगे.

एफसीआरए के तहत पंजीकृत एनजीओ को 2016-17 और 2018-19 के बीच 58,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का विदेशी कोष मिला. देश में करीब 22,400 एनजीओ हैं.

विधेयक के लक्ष्य और कारणों में कहा गया है कि साल 2010 और 2019 के बीच विदेशी योगदान की वार्षिक आमद लगभग दोगुनी हो गई है, लेकिन विदेशी योगदान के कई प्राप्तकर्ताओं ने इस धन को उस उद्देश्य के लिए उपयोग नहीं किया है जिसके लिए उन्हें पंजीकृत किया गया था या उक्त अधिनियम के तहत पूर्व अनुमति दी गई थी.

इसमें आगे कहा गया, ‘उनमें से कई द्वारा मूल वैधानिक अनुपालन सुनिश्चित किया जाना भी बाकी था, जैसे कि वार्षिक रिटर्न जमा करना और खातों का उचित ढंग से रिकॉर्ड रखना इत्यादि. इसने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिसके कारण केंद्र सरकार को 2011 और 2019 के बीच की अवधि के दौरान गैर-सरकारी संगठनों सहित 19,000 से अधिक प्राप्तकर्ता संगठनों के पंजीकरण के प्रमाण-पत्र को रद्द करना पड़ा था.’

केंद्र ने आगे कहा कि दर्जनों ऐसे गैर-सरकारी संगठनों के खिलाफ आपराधिक जांच भी शुरू की गई थी जो विदेशी योगदान का गलत इस्तेमाल करते थे.

सरकार का दावा है कि अब एफसीआरए में संशोधनों के जरिये इन समस्याओं से निजात पाया जा सकेगा.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)