भारत

नरेंद्र मोदी की अगुवाई में कैसा रहा संसद का कामकाज

संसद में बीते कुछ वर्षों से सरकार बिना उचित विचार-विमर्श के आनन-फानन में विधेयकों को पारित करने पर आमादा दिखती है. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में महज़ 25 फीसदी विधेयकों को संसदीय समिति के पास भेजा गया, जो 15वीं लोकसभा के समय भेजे गए विधेयकों की तुलना में काफ़ी कम है.

मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: पीटीआई)

मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: विपक्षी दल के आठ राज्यसभा सांसदों ने बीते 22 सितंबर की पूरी रात कानून बनाने वाली देश की सर्वोच्च संस्था संसद में स्थिति महात्मा गांधी की मूर्ति के पास बिताई.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के संसदीय इतिहास में ये एक बेहत अप्रत्याशित घटना थी.

विरोध प्रदर्शन करने वाले इन सांसदों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के डेरेक ओ’ब्रायन और डोला सेन, आम आदमी पार्टी (आप) के संजय सिंह, कांग्रेस नेता राजीव सातव, रिपुन बोरा और सैयद नासिर हुसैन तथा माकपा के केके रागेश और एलाराम करीम शामिल थे.

वे उच्च सदन राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह को तत्काल निलंबित करने की मांग कर रहे थे. हालांकि सिंह अपने फैसले पर अड़े हुए थे, जिसके कारण अगली सुबह पूरे विपक्ष ने मानसून सत्र के बाकी दो दिनों की कार्यवाही का बहिष्कार करने का फैसला किया और वे संसद के भीतर ही विरोध प्रदर्शन करते रहे, जब तक इसे स्थगित नहीं किया गया.

हालांकि सिंह (भाजपा द्वारा नामांकित सांसद) अगली सुबह प्रदर्शन स्थल पर सांसदों को चाय देने आए थे, जो  सदस्यों ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया. इसके बाद हरिवंश नारायण सांसदों के कथित दुर्व्यवहार करने के चलते एक दिन के भूख हड़ताल पर चले गए.

वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिंह द्वारा निलंबित सांसदों को चाय पिलाने की कोशिश की वाहवाही की, लेकिन वे संसदीय नियमों के उल्लंघन को लेकर बिल्कुल चुप रहे.

क्या था मामला

बीते 22 सितंबर को विपक्ष केकुछ सांसदों ने राज्यसभा उपसभापति से गुजारिश की कि विवादित कृषि विधेयकों को प्रवर समिति को भेज दिया जाए ताकि अच्छे तरीके से विचार-विमर्श के बाद इसे कानून में तब्दील करने पर फैसला लिया जा सके.

विपक्षी दल अपनी मांगों को इस आधार पर जायज ठहरा रहे थे कि कृषि क्षेत्र के इन कानूनों को अध्यादेश के जरिये लागू किया गया है और विपक्ष के सांसदों को विधेयक का गहराई से आकलन करने का कोई मौका नहीं दिया गया.

हालांकि उपसभापति हरिवंश नारायण ने इन मांगों को नजरअंदाज किया. इसके बाद चार सांसदों ने प्रस्ताव रखा कि विधेयक को पारित करने के लिए ध्वनिमत के बजाय वोटों का बंटवारा होना चाहिए या काउंटिंग की जानी चाहिए.

लेकिन ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर विधेयक पर वोटिंग कराने की स्थापित प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए हरिवंश नारायण सिंह ने ध्वनि-मत से इसे पारित कराने का फैसला किया. इसके कारण राज्यसभा में हंगामा शुरू हो गया और सांसद नारेबाजी करने लगे.

चूंकि सदन में शोर हो रहा था, इसलिए कोई ये दावा नहीं कर सकता कि ‘ध्वनि-मत’ विधेयक के पक्ष में था, जिसके आधार पर इसे कानून में तब्दील करने का रास्ता साफ कर दिया गया.

अब इसे लेकर विपक्षी दल सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि मोदी सरकार के पास उच्च सदन में बहुमत नहीं था, बावजूद इसके उन्होंने नियमों का उल्लंघन कर विधेयक को पारित हुआ घोषित कर दिया.

यदि ये दावा सही है तो राज्यसभा उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह को भारत के संसदीय इतिहास में एक काले धब्बे के रूप में जाना जाएगा.

ऐसे मौके पर हमें ये देखने की जरूरत है कि कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के दौरान संसद की कार्यवाही किस तरीके से चलती थी और मोदी सरकार के पिछले छह सालों की तुलना में वो दौर किस तरह भिन्न था.

यहां पर द वायर  यूपीए कार्यकाल के दौरान प्रवर समिति को भेजे गए विधेयकों, संसद के कामकाज का कुल समय, सवालों एवं बहसों पर लगाए गए समय का विवरण पेश कर रहा है.

विधेयक

ये बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि यूपीए के सत्ता में होने के दौरान 14वीं एवं 15वीं लोकसभा के समय कानून बनाने के लिए उचित विचार-विमर्श की जरूरत को ध्यान में रखते हुए अच्छी-खासी संख्या में विधेयकों को प्रवर समिति के पास भेजा गया था.

एक संसदीय लोकतंत्र में इसे एक बेहद अच्छे कदम के रूप में देखा जाता है. जितने ज्यादा विधेयकों को जांच-पड़ताल के लिए संसदीय समिति के पास भेजा जाता है, उतने अच्छे कानून का निर्माण होता है.

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च डेटा के मुताबिक 16वीं लोकसभा (मोदी सरकार का पहला कार्यकाल) के दौरान 25 फीसदी विधेयकों को समिति के पास भेजा गया, जो 15वीं एवं 14वीं लोकसभा के समय भेजे गए 71 फीसदी एवं 60 फीसदी विधेयकों से काफी कम है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में किसी भी विधेयक को संसदीय समिति के पास नहीं भेजा गया है.

भारतीय विधायी प्रक्रिया का अध्ययन करने वाले प्रमुख गैर-लाभकारी शोध संस्थान ने 16 वीं लोकसभा (2014-2019) पर अपनी एक रिपोर्ट में इस तरह की संसदीय प्रक्रिया के महत्व पर प्रकाश डाला है.

उन्होंने कहा, ‘समय की कमी के कारण प्रत्येक सांसद के लिए यह संभव नहीं है कि वो सदन में सभी विधेयकों पर चर्चा और जांच कर सके. समिति कानून की विस्तृत जांच के लिए अनुमति देती है, विभिन्न हितधारकों से प्रतिक्रिया के लिए एक मंच प्रदान करती है और सभी पक्षों के बीच सर्वसम्मति बनाने के एक मंच के रूप में कार्य करती है.’

हालांकि दिलचस्प बात यह है कि यूपीए के दस वर्षों की तुलना में मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में संसद में विधेयकों पर लंबे समय तक चर्चा हुई थी.

पीआरएस डेटा के अनुसार मोदी शासन के पहले कार्यकाल में 32 फीसदी विधेयकों पर लोकसभा में तीन घंटे से अधिक समय तक चर्चा की गई, जबकि यूपीए-1 और यूपीए-2 के शासनकाल के दौरान यह आंकड़ा क्रमशः 14 फीसदी और 22 फीसदी था.

इसके अलावा दो अन्य आंकड़े मोदी सरकार के कार्यकाल में संसद की कार्यवाही की स्थिति बयां करते हैं.

पीआरएस के आंकड़ों से पता चलता है कि आधे घंटे के भीतर पारित होने वाले विधेयकों की संख्या 15वीं लोकसभा में 26 फीसदी से काफी घटकर 16वीं लोकसभा में छह फीसदी पर पहुंच गई.

ऐसा संभवत: इसलिए हुआ होगा कि भाजपा सरकार द्वारा लाए गए हर एक विधेयक पर विपक्षी सांसदों ने काफी रुचि दिखाई होगी और उस पर बहस करने की कोशिश की होगी.

इसके साथ ही एक आंकड़ा यह भी बताता है कि 16वीं लोकसभा में मोदी सरकार 133 विधेयकों को पारित कराने में सफल रही, जो इससे पिछले लोकसभा की तुलना में 15 फीसदी अधिक है.

यह दर्शाता है कि मौजूदा सरकार पिछली सरकारों की तुलना में अधिक से अधिक विधेयकों को पारित कराने पर आमादा है. इन 133 विधेयकों में से सबसे ज्यादा विधेयक आर्थिक क्षेत्र से जुड़े हुए थे.

मालूम हो कि कानून बनाने के अलावा संसद हर साल के सालाना बजट को भी पारित करती है. ध्यान देने वाली बात ये है कि वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान सदन के पटल पर 17 फीसदी बजट पर चर्चा हुई थी, जो यूपीए सरकार की तुलना में अधिक है, लेकिन ‘मांग संबंधी 100 फीसदी मामलों को बिना चर्चा के पारित किया गया.’

पीआरएस डेटा के अनुसार पिछली बार ऐसा साल 2004-05 और 2013-14 के बजट के दौरान हुआ था.

सवाल पूछना मना है!

बीते 22 सितंबर को उपसभापति के आचरण के अलावा मौजूदा मानसून सत्र इतिहास में ऐसे सत्र के रूप में जाना जाएगा जिसने प्रश्नकाल को समाप्त कर दिया था. इससे भारत के संसदीय लोकतंत्र का बेहद महत्वपूर्ण अंग के रूप में जाना जाता है.

इस नियम के तहत हर दिन एक घंटा प्रश्नकाल के लिए आवंटित किया जाता है, जहां सांसद सरकार के सवाल पूछते हैं और उन्हें उनके कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराते हैं.

यदि पिछली चार लोकसभाओं के उपलब्ध आंकड़ों पर गौर करें तो प्रश्नकाल के आवंटित समय का सिर्फ 59 फीसदी इस्तेमाल किया गया है. उच्च सदन में यह विशेष रूप से और घट रहा है.

15वीं और 16वीं लोकसभा के दौरान राज्यसभा में प्रश्नकाल के समय का केवल 41 फीसदी उपयोग किया गया था.

यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि कोविड-19 महामारी का हवाला देते हुए मोदी सरकार ने पहले ही सांसदों के सांसद निधि (एमपीलैड फंड) को स्थगित कर दिया है.

यह विशेष रूप से विपक्ष के सांसदों को प्रभावित करेगा, जो सत्ता से बाहर हैं और इससे उनके क्षेत्र में किसी भी विकास कार्य में भी कोई भूमिका नहीं होगी.

इसका अर्थ यह है कि संसद का सदस्य एक प्रतिनिधि के रूप में मतदाताओं की पसंद होने के बाद भी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्य नहीं कर सकता है.

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)