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32 सांसदों ने राष्ट्रपति से भारत के सांस्कृतिक इतिहास पर गठित समिति भंग करने की मांग की

केंद्र सरकार ने 12,000 साल पहले से भारतीय संस्कृति की उत्पत्ति और विकास का अध्ययन करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की है. 32 सांसदों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर कहा है कि समिति के लगभग सभी सदस्य एक विशिष्ट सामाजिक समूह से हैं, जो देश के बहुलतावादी समाज को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं.

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद. (फोटो: रॉयटर्स)

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद. (फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: कम से कम 32 सांसदो ने राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को पत्र लिखकर भारत के सांस्कृतिक इतिहास का अध्ययन करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति को भंग करने में उनके हस्तक्षेप और ‘सलाह’ की मांग की है.

उनका कहना है कि इसके सदस्य देश के बहुलतावादी समाज को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं.

23 सितंबर को राष्ट्रपति कार्यालय को भेजे गए पत्र में लिखा गया, ‘हम आपके ध्यान में लाना चाहते हैं कि 16-सदस्यीय अध्ययन समूह में ऐसे बहुलवादी समाज का प्रतिबिंब नहीं है. दक्षिण भारतीय, पूर्वोत्तर भारतीय, अल्पसंख्यक, दलित और महिलाएं नहीं हैं. उक्त समिति के लगभग सभी सदस्य एक निश्चित विशिष्ट सामाजिक समूहों से हैं जो भारतीय समाज की जाति पदानुक्रम में शीर्ष पर हैं.’

पत्र में कहा गया है कि समिति के पास तमिल सहित दक्षिण भारतीय भाषाओं के शोधकर्ता नहीं हैं, जिनका गौरवशाली इतिहास है और जिसे केंद्र सरकार द्वारा शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता दी गई है.

14 सितंबर को केंद्रीय संस्कृति मंत्री प्रह्लाद पटेल ने एक लिखित जवाब के माध्यम से संसद में कहा था कि 12,000 साल पहले से भारतीय संस्कृति की उत्पत्ति और विकास का अध्ययन करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया था.

समिति के सदस्यों के रूप में दिए गए नाम केएन दीक्षित (भारतीय पुरातत्व सोसाइटी के अध्यक्ष), आरएस बिष्ट (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व संयुक्त महानिदेशक), बीआर मणि (राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली के पूर्व महानिदेशक), संतोष शुक्ला (संस्कृत अध्ययन के लिए विशेष केंद्र, जेएनयू), पीएन शास्त्री (राष्ट्रीय संस्कृति संस्थान के कुलपति), एमआर शर्मा (संगमर्ग विश्व ब्राह्मण महासंघ के अध्यक्ष) और रमेश कुमार पांडे (कुलपति, लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ) हैं.

न्यूज रिपोर्टों के अनुसार, 2016 में एक समान समिति का गठन किया गया था जिसमें ये सदस्य शामिल थे लेकिन समिति एक साल की समय सीमा के भीतर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने में विफल रही.

समिति का विरोध करते हुए सांसदों ने पूछा, ‘क्या भारत विंध्य पहाड़ी से नीचे नहीं है? क्या वैदिक सभ्यता के अलावा कोई सभ्यता नहीं है? क्या संस्कृत के अलावा यहां कोई प्राचीन भाषा नहीं है?’

उन्होंने कहा, ‘हमारे देश के विकास और अध्ययन में बहुलतावाद की महान विरासत है और स्वाभाविक रूप से महान देश की विविध संस्कृतियों से जानकारी की आवश्यकता है.’

देश में लिंग संवेदनशीलता, विविध राष्ट्रीयताओं, सामाजिक समूहों की उपेक्षा करते हुए समिति के गठन के इरादे पर संदेह व्यक्त करते हुए सांसदों ने यह भी कहा कि उन्हें डर है कि जॉन मार्शल, सुनीति कुमार चटर्जी, इरावाथम महादेवन, टोनी जोसेफ और आर. बालाकृष्णन जैसे प्रमुख विद्वानों के सकारात्मक योगदान की उपेक्षा हो सकती है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)