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मनुष्यता के लिए विरोध अनिवार्य है

किसान के प्रतिरोध में सिर्फ किसान रहें, मजदूर प्रतिरोध में सिर्फ मजदूर, दलितों के विरोध में सिर्फ दलित, यह भी अत्याचार को बनाए रखने का एक तरीका है. यह विरोध का संप्रदायवाद है. सत्ता इसलिए कहती है कि किसान का विरोध तब अशुद्ध है जब उसमें छात्र और व्यापारी शामिल हों.

कृषि विधेयकों के विरोध में हुए भारत बंद के दौरान अंबाला के करीब हाइवे पर प्रदर्शन करते विभिन्न किसान संगठनों के लोग. (फोटो: पीटीआई)

कृषि विधेयकों के विरोध में हुए भारत बंद के दौरान अंबाला के करीब हाइवे पर प्रदर्शन करते विभिन्न किसान संगठनों के लोग. (फोटो: पीटीआई)

किसान सड़क पर हैं. फिर से वे घर से बाहर हैं जिनके घर गिरने या गिरा दिए जाने पर कोई अदालत नहीं कहती कि बारिश में किसी को बिना छत कैसे रहने दिया जा सकता है. जिनकी ज़मीन रेल लाइन के लिए, कारखानों के लिए ले लिए जाने पर कहीं कोई हूक नहीं उठती.

किसान सड़क पर हैं, रास्ते रुके हुए हैं, किसानों ने रेल लाइनों पर डेरा डाल दिया है. ट्रेनों के रास्ते बदलने पड़े हैं.  क्या सबसे बड़ी अदालत की भौंह पर बल पड़ जाएंगे?

क्या वह इन किसानों की तम्बीह करेगी कि वे सड़क पर नहीं रह सकते, कि ये सार्वजनिक हित के विरुद्ध हैं? क्या वह उन्हें हुक्म देगी कि वे सड़क से हटकर उसके और सरकार एक आगे अर्जी लगाएं?

विरोध है, इसलिए असुविधा है. सड़क आज संसद के खिलाफ खड़ी है. विरोध संसदीय सुरुचि को भंग करता है. वह भीषण होता है, भयंकर और वह उस समझौते के विरुद्ध है जिसे सभ्यता कहते हैं.

क्या कारण है कि जो ‘सभ्य’ हैं वे इस विरोध से डरते हैं, डरने से ज्यादा क्यों उनके मन में इस विरोध के खिलाफ हिंसा पैदा होती है?

कौन हैं जिनके दिल इन किसानों के लिए कभी नहीं दुखते? कौन हैं जो मानते हैं कि यह विरोध एक साजिश है? कौन हैं जो मानते हैं कि विरोध करने वाले गुमराह हैं? उन्हें कोई और बरगला रहा है?

कौन हैं जो मानते हैं कि न तो छात्र अपने फैसले से विरोध का निर्णय ले सकते हैं, न दलित, न स्त्रियां, न मजदूर और न किसान? क्यों वे यह मानते हैं कि इन सबके पीछे कोई एक बड़ा दिमाग है और ये सब उसके गुलाम हैं?

क्या यह इसलिए है कि ऐसे लोग खुद खुदमुख्तारी का ख़याल और एहसास खो बैठे हैं?

खुदमुख्तारी हमारे वजूद से उपजती है लेकिन हर शख्स अपने को इसका हक़दार मानता हो, ऐसा नहीं. मैं हूं, यह बोध बिना कुछ किए पैदा नहीं हो सकता.

खुदमुख्तारी एक तरह से आत्म का उद्घाटन है. लेकिन वह सामाजिक कार्रवाई के बीच पैदा होता है, उसके जरिये. मेरे होने का मतलब है, मेरी आवाज़ किसी को अपनी जगह से हिला सकती है, किसी को मेरे करीब ला सकती है, मेरे होने से किसी और को होने का एहसास होता है, ये सब मिलकर मेरेपन को गढ़ती हैं.

विरोध क्यों मनुष्य के लिए अनिवार्य है? क्यों उसके बिना व्यक्ति के निर्माण की कल्पना नहीं की जा सकती? जो समाज सत्ता में खुद को विलीन कर देता है, वह व्यक्ति चेतना को भी गंवा देता है. फिर भी उस व्यक्ति का भ्रम बना रहता है.

रघुवीर सहाय की ‘खब्ती औरत’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां पढ़िए,

‘हम सब जानते थे गरीब क्या चीज़ होती है
हम सब गरीबी को बिसरा चुके थे
हममें से एक ने कहा रोज़ कम खाना मेरे दोनों बच्चों को तोड़ता
मोड़ता कुतरता है रोज़ रोज़ कुछ समझे?

बुझते हुए धीरे-धीरे एक दिन हज़ार लोग रोज़
सहने के अंतिम कगार पर खड़े हो
भारतवर्ष में फलांग पड़ते हैं
व्यक्ति स्वातंत्र्य के समुद्र में कोई धमाका नहीं.’

रोज़ कम खाने से आदमी धीरे-धीरे तोड़ा जाता है, रोज़ वह और कम आदमी होता जाता है. इस बात को समझना इतना भी मुश्किल नहीं होना चाहिए लेकिन वह ज़्यादातर लोगों के द्वारा नहीं समझी जाती है.

इस अंश की अंतिम दो पंक्तियों को पढ़िए और उस हाहाकार का अनुभव कीजिए जो इस बेहिसी के चलते कवि के मन में घुमड़ रहा है.

प्रायः दीन-दुखी, लाचार जो मन में दया उपजाते हैं, वे और हैं और वे एक स्तर का सुख और संतोष देते हैं. दया करके सुख मिलता है, संतोष होता है.

लेकिन वे जो दया के पात्र माने जाते हैं, उस दुख की वजह खोजकर उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं तो उन्हीं लोगों के मन में उनके विरुद्ध मन में हिंसा होती है.

क्यों? क्या इसलिए कि वे यह करते हुए उनके बराबर दिखलाई पड़ने लगते हैं? और यह उन्हें कबूल नहीं.

फर्ज कीजिए कि जो बच्ची आपकी गाड़ी की खिड़की को ठकठकाती हुई अपना हाथ अपने मुंह या पेट की ओर बार-बार ले जाती है, वह कल को आपकी गाड़ी के सामने आकर खड़ी हो जाए और कहे कि इस गाड़ी में तेल रहे इसलिए उसके शरीर से रोज़-रोज़ कुछ लहू निकाला गया है तो हम भौंचक्के रह जाएंगे.

और यह हमें उसका अपने खिलाफ अन्याय जान पड़ेगा. लेकिन जब वह यह करेगी तो उस रिश्ते को बदल देगी जो उसके और हमारे बीच है और खुद को भी बदल देगी.

अक्सर हम सोचा करते हैं कि इतनी नाइंसाफी और गैरबराबरी और हिंसा है तो प्रतिकार क्यों नहीं है. उसका एक कारण है जिसे रघुवीर सहाय अपनी ‘गुलामी’ शीर्षक कविता में इस तरह बतलाते हैं:

मनुष्य के कल्याण के लिए
पहले उसे इतना भूखा रखो कि वह और कुछ
सोच न पाए

फिर उससे कहो कि तुम्हारी पहली ज़रूरत रोटी है
जिसके लिए वह गुलाम भी होना मंज़ूर करेगा.

रोटी नहीं आज़ादी उसकी ज़रूरत है, जिससे रोटी भी इज्ज़त की मिल पाएगी, यह बोध समाज में एकबारगी नहीं आता क्योंकि इस बात पर वह चिरक्षुधित विचार न कर पाए इसके लिए संस्कृति का एक व्यापक षड्यंत्र रचा जाता है.

एक बड़ी दुरभिसंधि उनके बीच जिनके पास भाषा है और वे उस भाषा का प्रयोग उन्हें नहीं करने देना चाहते जो भूखे हैं क्योंकि उनके शब्दकोश में सिर्फ रोटी ही रहनी चाहिए, आज़ादी नहीं.

फिर भी मानव सभ्यता यही बताती है कि हमेशा ही गुलाम उठ खड़े होते रहे हैं. विरोध भी एक प्राकृतिक भाव है. वे जो बेजान जान पड़ते रहे हैं, उनका सिर उठाकर खड़ा हो जाना अनियम से अधिक नियम रहा है. मानव सभ्यता ऐसे विरोधों से गढ़ी गई है.

विरोध वह आवश्यक होता है जो अपने ऊपर किए गए अत्याचार के खिलाफ किया जा रहा हो. लेकिन विरोध वह सुंदर होता है, जो मैं दूसरों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ करूं.

किसान के प्रतिरोध में सिर्फ किसान रहें, मजदूर प्रतिरोध में सिर्फ मजदूर, दलितों के विरोध में सिर्फ दलित, यह भी अत्याचार को बनाए रखने का एक तरीका है. यह विरोध का संप्रदायवाद है.

सत्ता इसलिए कहती है कि किसान का विरोध तब अशुद्ध है जब उसमें छात्र और व्यापारी शामिल हों. इसे वह राजनीति कहती है. और सचमुच कोई विरोध तभी राजनीतिक होता है जब उसमें वे शामिल हों जिनका हित सीधे प्रभावित न हो रहा हो.

यानी जिन्हें प्रभावित तबका कहते हैं, उनसे अलग तबके भी जब विरोध में शामिल हों.

विरोध की वैधता खत्म करने के लिए भीतरी और बाहरी का अंतर चौड़ा किया जाता है, संवेदना और सहानुभूति को साजिश करार दिया जाता है.

कृषि विधेयकों के खिलाफ हुए भारत बंद के दौरान अमृतसर के पास रेलवे ट्रैक पर प्रदर्शन करते किसान. (फोटो: पीटीआई)

कृषि विधेयकों के खिलाफ हुए भारत बंद के दौरान अमृतसर के पास रेलवे ट्रैक पर प्रदर्शन करते किसान. (फोटो: पीटीआई)

इंडियन एक्सप्रेस ने किसानों के विरोध की खबर की सुर्खी लगाई है कि किसानों के इस आंदोलन में कौन पेश-पेश है?

20 साल की छात्रा नीलकमल जिसके घर कोई खेत नहीं. लेकिन वह समझती है कि छोटे दुकानदारों का हित काश्तकारों से जुदा है. वह जानती है कि खेती से जुड़े कानून और नागरिकता के कानून में एक रिश्ता है. एक नाइंसाफी दूसरे को जन्म देती है.

33 साल की अमनदीप, जो अपनी पीएचडी छोड़कर स्त्रियों के सवाल पर काम कर रही हैं, वे जानती हैं कि खेती के इस कानून का औरतों पर क्या असर पडेगा.

18 साल की हरमनजोत कौर, जो 11वीं के बाद पढ़ाई जारी नहीं रख पाईं, भारतीय किसान यूनियन का झंडा थामे घंटों खड़ी रही. वह मंच से बोलना चाहती है.

उसके मां-बाप बीमार हैं और वह खेत में काम करती है: खेती उसके खून में है. ‘मैं जनतंत्र समझती हूं और हमारी केंद्रीय सरकार को भी इसे समझ लेने की ज़रूरत है’, हरमनजोत चेतावनी के लहजे में कहती है.

हरमनजोत. हर मन की ज्योति! हर मन में विरोध की आग, रोशनी! वह अठारह साल की लड़की कवि सुकांत को ज़रूर अपनी लगती जो अपनी उम्र का तकाजा पूरा कर रही है.

विरोध के कर्तव्य को समझे बिना अपनी मानवीयता उपलब्ध की नहीं जा सकती. वह स्वार्थ के दायरे से निकलकर दूसरे से जुड़ने का नाम है.

एक इस्राइली जब एक फ़िलीस्तीनी के घर को ढहा दिए जाने के खिलाफ अपने ही देश के बुलडोज़र के आगे खड़ा हो जाए, जब एक हिंदू मुसलमान के खिलाफ हो ज़ुल्म का विरोध भारत में करे, एक बौद्ध श्रीलंका में तमिल हिंदू के लिए, पाकिस्तान में एक सुन्नी मुसलमान शिया या अहमदिया, हिंदू या ईसाई के लिए खड़ा हो तब इंसानियत का जन्म होता है.

लेकिन क्या यह ताज्जुब की बात है कि ऐसे सारे लोगो को उनके अपने समाजों में द्रोही माना जाता है!

किसान का विरोध हम सबका है. लेकिन यह नई जागृति का आरंभ है.

जिस दिन किसान दलितों के दमन का विरोध करना शुरू करेंगे, जिस दिन वे किसी पहलू खान के क़त्ल में हमलावर के आगे खड़े होंगे, जिस दिन ये सिर्फ अपने आर्थिक मसले से आगे विरोध की ज़मीन तोड़ेंगे, उस दिन से एक सच्चे इंसानी समाज की रचना शुरू होगी.

आज का उनका विरोध इस मानवता के जन्म के लिए इसीलिए अनिवार्य है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)