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दिल्ली दंगे से जुड़े दो वॉट्सऐप ग्रुप और दिल्ली पुलिस के दोहरे मानक

दिल्ली दंगा मामले में सामने आए दो वॉट्सऐप ग्रुप में से एक ‘हिंदू कट्टर एकता ग्रुप’ है, जहां ‘मुल्लों को मारने’ के दावे किए गए हैं. दूसरी ओर दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप में सीएए विरोधी प्रदर्शन, हिंसा न करने और संविधान में भरोसा रखने की बातें हुई हैं. दिल्ली पुलिस ने दूसरे ग्रुप के कई सदस्यों को दंगों का साज़िशकर्ता बताया है.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

 

नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस ने हाल ही में उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगे को लेकर एफआईआर नंबर 59/2020 के तहत विवादित नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले 15 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर किया है.

यह दस्तावेज 17,000 से अधिक पन्नों का है और इसमें हत्या, हत्या की कोशिश, दंगा, यूएपीए समेत 25 धाराओं में आरोप लगाए गए है.

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में सीएए के खिलाफ हुए प्रदर्शनों को दंगे की ‘बड़ी साजिश का हिस्सा’ बताते हुए पुलिस ने तीन और ग्रुप को हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया है, जिसमें मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑफ जेएनयू (एमएसजे)-जिसके सदस्य शरजील इमाम थे, जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी (जेसीसी)- जिसकी अगुवाई सफूरा जरगर और मीरान हैदर ने की थी- हैं.

तीसरा ग्रुप दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप (डीपीएसजी) है- जिसके सदस्यों में कई नामी कार्यकर्ता जुड़े हैं. इनमें फिल्मकार राहुल रॉय और सबा दीवान, राजनीतिक कार्यकर्ता कविता कृष्णनन, योगेंद्र यादव, एनी राजा, सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर, अपूर्वानंद, अंजलि भारद्वाज और एनडी जयप्रकाश, ट्रेड यूनियनिस्ट गौतम मोदी, यूनाइटेड अगेंस्ट हेट के सदस्य नदीम खान और खालिद सैफी, पिंजरा तोड़ सदस्य नताशा नरवाल और पूर्व जेएनयू छात्र उमर खालिद और बनज्योत्सना लाहिरी शामिल हैं.

इससे पहले जून महीने में हिंदू कट्टर एकता ग्रुप को लेकर चार्जशीट फाइल की गई थी, जिसके सदस्यों पर आरोप है कि उन्होंने इसके जरिये मुसलमानों को मारने की प्लानिंग की थी.

इसमें कुल 11 आरोपी हैं, जिसमें से नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया और उन पर हत्या, दंगा और आपराधिक साजिश का आरोप लगाया गया है.

द वायर  ने डीपीएसजी वॉट्सऐप ग्रुप के 2,306 पेज के चैट की प्रति प्राप्त की है, जिसमें 28 दिसंबर 2019 से एक मार्च 2020 के बीच भेजे गए मैसेजेस का विवरण है.

हिंदू कट्टर एकता ग्रुप के उलट डीपीएसजी के चैट में विवादित सीएए के खिलाफ प्रदर्शन करने, अहिंसा बरतने और भारतीय संविधान में विश्वास रखने पर जोर दिया गया है. 

इसमें कहीं पर भी हिंसा भड़काने की बात नहीं दिखती है, बावजूद इस तथ्य के इस समूह के सदस्यों को कठोर यूएपीए के तहत भी गिरफ्तार किया गया है.

दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में डीपीएसजी ग्रुप को हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है, इसके सदस्यों को ‘वैचारिक तौर पर पथभ्रष्ट’ बताया गया है.

वहीं दो अन्य ग्रुप एमएसजे और जेसीसी के सदस्यों को ‘नौसिखिया छात्र कार्यकर्ता’ करार दिया गया है, हालांकि इसमें से कुछ को पुलिस की ‘कॉन्सपिरेसी थ्योरी’ में शामिल भी बताया गया है.

जहां एक तरफ कट्टर हिंदू एकता ग्रुप में ‘तुम्हारे भाई ने अभी नौ बजे के करीब भागीरथी विहार में दो मुल्लों को मारा है’ और ‘गंगा विहार, गोकुल पुरी, झोरीपुर, इन सब जगह घूमा हूं और 23 मुल्लों के सिर फाड़े हैं’, जैसे भड़काऊ एवं सांप्रदायिक मैसेज फैलाए जा रहे थे, वहीं दूसकी तरफ डीपीएसजी ग्रुप में अमन और शांति की बात की जा रही थी.

दंगों से करीब एक महीने पहले 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर डीपीएजी ग्रुप के सदस्य राष्ट्रीय ध्वज फहराने, लोगों को सीएए के बारे में जागरूक करने तथा भारतीय संविधान की रक्षा करने की बात कर रहे थे.

गणतंत्र दिवस के मौके पर एक संदेश में कहा गया कि यदि आप सीएए द्वारा संविधान के सिद्धांतों के कमजोर पड़ने से चिंतित हैं और यदि आप संविधान की अखंडता के लिए अपनी प्रतिबद्धता दर्ज कराना चाहते हैं, तो अपने साथी नागरिकों के साथ जुड़ें.

इस ग्रुप में इंडियन सोशल इंस्टिट्यूट में सदस्यों के साथ हुए एक बैठक को लेकर चर्चा की गई है, जिसमें सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को लेकर छात्र संगठनों का शुक्रिया अदा किया गया है.

फिल्ममेकर सबा दीवान द्वारा भेजे गए एक मैसेज में स्पष्ट रूप से कहा गया है, ‘विरोध प्रदर्शन को अहिंसक बनाए रखने के लिए हरसंभव कोशिश की जानी चाहिए.’

इसके अलावा इसमें प्रदर्शन को लेकर सरकार के संभावित जवाबी हमले जैसे कि हिंदू-मस्लिम को लड़ाना, प्रदर्शन को अर्बन नक्सल बताना और फोर्स के जरिये विरोध के दमन इत्यादि की बात की गई है.

डीपीएसजी सदस्यों की पहली बैठक 26 दिसंबर 2019 को हुई थी, जिसके बाद एक वॉट्सऐप ग्रुप बना और इसके एडमिन राहुल रॉय और सबा दीवान बनाए गए.

अगली मीटिंग दो जनवरी 2020, उसके बाद 11 जनवरी और फिर 22 जनवरी को बैठक हुई. एक मीटिंग तीन फरवरी को भी हुई थी.

इन बैठकों में मुख्य रूप से सीएए/एनपीआर/एनआरसी को तत्काल वापस लेने की मांग की गई. इसके अलावा इसमें सीएए/एनआरसी पर रचनात्मक कंटेंट बनाने, गैर-भाजपा शासित राज्यों के नेताओं से मुलाकात करने, एनपीआर पर फैक्ट शीट बनाने, न्यूज रिपोर्ट मुहैया कराने इत्यादि को लेकर एक्शन प्लान बनाया गया.

चक्का जाम की साजिश?

दिल्ली पुलिस लगातार ये दावा करती आ रही है कि सीएए के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले लोगों ने जाफराबाद में ‘चक्का जाम’ करने की साजिश रची थी ताकि इससे हिंसा भड़के, हालांकि वॉट्सऐप मैसेज के अनुसार ये दावे हकीकत पर खरे नहीं उतरते हैं.

एक बात यहां स्पष्ट है कि डीपीएसजी विरोध प्रदर्शन का आयोजन नहीं कर रहा था, कम से कम जाफराबाद में तो बिल्कुल भी नहीं. मैसेजेस बताते हैं कि गररूप उन घटनाओं पर प्रतिक्रियाएं दे रहा था, जो आसपास घट रही थीं.

मैसेज से पता चलता है कि ग्रुप के कई सदस्यों ने चक्का जाम का विरोध किया, एक ने ने किसी दूसरे सदस्य पर इस बात को समर्थन देने का आरोप भी लगाया, लेकिन किसी का भी कोई मैसेज यह नहीं दिखाता कि चक्का जाम का समर्थन किया गया था.

लोगों से सड़क के दोनों ओर इकट्ठा होने की एक अपील पर इसके एक सदस्य ने कहा, ‘कृपया ध्यान रखें ये कदम अपने आप में हमें हराने वाला है. आईटीओ पर एक दूसरा शाहीन बाग बनाना सही नहीं होगा. चक्का जाम प्रदर्शन को आगे बढ़ाने में योगदान नहीं देगा. ये एक लंबा चलने वाला संघर्ष है, जनता की राय बनाने की स्ट्रेटजी होनी चाहिए. ऐसा कोई कदम जिससे लोग नाराज हो सकते हों, उसका विरोध किया जाना चाहिए.’

एक अन्य सदस्य ने पूछा, ‘हम इस नाकाबंदी के साथ क्या करने की कोशिश कर रहे हैं? अगर यह नाकाबंदी एक दिन भी जारी रहती है तो जनता की राय बहुत तेजी से बदल जाएगी.’

एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि ट्रैफिक की आवाजाही के लिए रोड की एक साइड खुली रखना जरूरी है.

इसके साथ ही एक स्थानीय प्रदर्शनकारी ने कहा कि किसी भी प्रदर्शन में स्थानीय लोग रोड ब्लॉक करने के लिए तैयार नहीं है. चूंकि वे लोकल हैं, तो उन्हें ही समस्या होगी. कुछ बाहरी लोग ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हम इसकी इजाजत नहीं दे सकते हैं.

इस तरह यहां स्पष्ट है कि ग्रुप में इसे लेकर बहस हो रही थी ‘चक्का जाम’ सही कदम है या नहीं. लेकिन दिल्ली पुलिस की इस भारी-भरकम चार्जशीट में कोई प्रमाण नहीं है कि इस ग्रुप के लोग चक्का जाम में शामिल थे.

जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे सीएए विरोधी प्रदर्शन. (फाइल फोटो: पीटीआई)

जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे सीएए विरोधी प्रदर्शन. (फाइल फोटो: पीटीआई)

वॉट्सऐप चैट से पता चलता है कि किसी एक कदम पर सहमति बनने के बजाय बातचीत में काफी कन्फ्यूजन था. ग्रुप के सदस्यों ने कई बार इस पर चर्चा की कि किस तरह हिंसा नहीं होने देना है.

राहुल रॉय ने अपने एक मैसेज में कहा, ‘शासन द्वारा संभावित हिंसा भड़काने के बारे में लोगों को चेतावनी देने के अलावा हमें कुछ आईडिया पेश करना होगा कि लोग क्या कर सकते हैं. यदि शांतिपूर्ण और प्रभावी विकल्प लोगों के सामने होगा, तो हिंसा की संभावना को कम किया जा सकता है. ’

हालांकि दिल्ली पुलिस ने शांति बनाने के सदस्यों की कोशिश को बिल्कुल दरकिनार कर दिया. पुलिस ने डीपीएसजी ग्रुप को ‘स्थानीय सुपरवाइजर’ और उत्तरी दिल्ली में हुए विभिन्न विरोध प्रदर्शनों के ‘स्थानीय नेताओं’ की संज्ञा दी है.

चार्जशीट में कहा गया, ‘षड्यंत्र के दायरे को बढ़ाने के लिए जेसीसी को अलर्ट किया गया कि वे चक्का जाम और हिंसा के जरिये 24×7 विरोध प्रदर्शन को उच्च स्तर पर ले जाएं.’

ग्रुप में स्थानीय लोगों द्वारा रोड ब्लॉक के कदम को लेकर चर्चा करने को दिल्ली पुलिस ने ‘रोड ब्लॉक और हिंसा भड़काने का प्लान’ बताया है, जबकि वॉट्सऐप चैट में कहीं भी चक्का जाम की प्लानिंग साबित नहीं होती है, जो दिल्ली पुलिस के अनुसार दंगे भड़कने की वजह था.

मैसेजेस से ऐसा प्रतीत होता है कि समूह के दो सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य विरोध कर रहे विभिन्न समूहों के बीच आम सहमति बनाना और मीडिया के माध्यम से जनता की राय को आकार देना था.

मामले में ‘प्रमुख षड्यंत्रकारी’ बताए गए उमर खालिद ने इस ग्रुप में ज्यादा से ज्यादा दो या तीन मैसेज भेज थे. एक जनवरी को ग्रुप के सदस्यों ने ‘संविधान को बचाने’ की शपथ ली थी.

हिंदुत्व समर्थक एवं एंटी-सीएए प्रदर्शनकारियों के वॉट्सऐप ग्रुप के लिए अलग-अलग रवैया अपनाना दिल्ली दंगे की जांच को लेकर दिल्ली पुलिस के भेदभावकारी रवैये को दर्शाता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)