भारत

राजस्थान: क्यों कोरोना वायरस के कारण घरेलू कामगार महिलाओं की समस्याएं और बढ़ गई हैं

कोरोना वायरस के कारण लागू लॉकडाउन के बाद घरेलू कामगार महिलाओं की आर्थिक हालत ख़राब है. काम न होने, मालिकों द्वारा मज़दूरी घटाने, सामाजिक भेदभाव के साथ-साथ ये वर्ग सरकार की उदासीनता से भी प्रताड़ित है.

राजस्थान की राजधानी जयपुर के मालवीय नगर में घरेलू कामगार महिलाओं का एक समूह जो लॉकडाउन के बाद विभिन्न समस्याओं का सामना कर रहा है. (सभी फोटो: माधव शर्मा)

राजस्थान की राजधानी जयपुर के मालवीय नगर में घरेलू कामगार महिलाओं का एक समूह, जो लॉकडाउन के बाद विभिन्न समस्याओं का सामना कर रहा है. (सभी फोटो: माधव शर्मा)

जयपुर: कोरोना वायरस के कारण लागू लॉकडाउन के बाद देश में अनलॉक की प्रक्रिया जारी है. फैक्ट्रियों में मज़दूर लौट रहे हैं तो दफ्तरों में अफसर, लेकिन वायरस का खौफ लोगों के जहन में ऐसा फैला है कि हमारे घरों में झाडू-पोंछा, बर्तन और खाना बनाकर गुजर बसर करने वाली लाखों महिला कामगारों का उन्हीं घरों में वापस लौटना पूरी तरह संभव नहीं हो पाया है.

राजस्थान की बात करें तो यहां लॉकडाउन के दौरान इनका घरों में काम करना बंद हुआ, लेकिन अनलॉक के बाद भी लोगों ने उन्हें पूरी तरह काम पर नहीं बुलाया है. इन कामगारों से जुड़े संगठन कहते हैं कि सामान्य हालातों में लौटने में इन्हें कम से कम तीन साल लगेंगे.

इन घरेलू महिला कामगारों की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि इन पर घर खर्च के लिए 10-50 हजार रुपये तक का कर्ज हो चुका है. काम न होने, मालिकों द्वारा मजदूरी घटाने, सामाजिक भेदभाव के साथ-साथ ये वर्ग सरकार की उदासीनता से भी प्रताड़ित है.

छह घरों में खाना बनाने वाली संध्या, अब बेरोजगार हैं

पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर की रहने वाली संध्या रानी दास 22 साल पहले पलायन कर जयपुर आ बसी थीं. एक बेहतर जिंदगी बिताने के इरादे से संध्या ने शहर के मालवीय नगर इलाके में किरासे का मकान लिया और बसर के लिए घरों में खाना बनाने का काम शुरू किया.

मूल रूप से पश्चिम बंगाल की संध्या रानी दास जयपुर में पहले छह घरों में खाना बनाती थीं, लेकिन लॉकडाउन के बाद बेरोजगार हैं.

मूल रूप से पश्चिम बंगाल की संध्या रानी दास जयपुर में पहले छह घरों में खाना बनाती थीं, लेकिन लॉकडाउन के बाद बेरोजगार हैं.

संध्या बताती हैं, ‘पहले मैं छह घरों में खाना बनाती थी. महीने में 18-20 हजार रुपये मिल जाते थे. लॉकडाउन लगा तो मालिकों ने काम पर बुलाना बंद कर दिया, लेकिन तब एक उम्मीद थी कि लॉकडाउन हटेगा तो फिर से काम मिलने लगेगा. आज लॉकडाउन हटे कई महीने बीत गए मुझे कोई काम नहीं मिला है. पुराने मालिकों ने काम पर वापस रखने से मना कर दिया.’

परेशानी बताते हुए संध्या कहती हैं, ‘मेरा पिछले छह महीने का मकान का किराया बाकी है. तीन हजार रुपये किराया और बिजली पानी सहित करीब पांच हजार रुपये रहने पर खर्च होते हैं. जब नकदी का संकट बढ़ा तो कोलकाता से 20 हजार रुपये मंगाए, लेकिन ये पैसे जल्द ही खत्म हो गए. अभी मैं एक-एक पाई के लिए भी मोहताज हूं. अब तो चावल खरीदने के लिए भी पैसे नहीं हैं.’

चार बेटियों की मां संध्या की चिंता है कि उसकी दो बेटियों की शादी बिना पैसे के कैसे होगी?

महामारी का फायदा उठा मजदूरी कम की

पश्चिम बंगाल की ही रहने वाली सिंधु राय पांच घरों में बर्तन और खाना बनाती थीं. लॉकडाउन में काम बंद हुआ. उसके बाद सितंबर की शुरुआत में एक घर में खाना बनाने का काम मिला. घर में करीब सात सदस्य थे. 1500 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से 10,500 रुपये महीने सिंधु ने मेहनताना मांगा.

वे बताती हैं, ‘जब मैंने ये मजदूरी मांगी तो काम देने वाले ने झिड़कने के अंदाज में सिर्फ 5 हजार देने की बात कही. मैं जयपुर में अकेले रहती हूं तो सोचा, कुछ न कमाने से अच्छा है पांच हजार रुपये कमाना. छह महीने बाद मुझे काम मिला, लेकिन आधी मजदूरी में.’

सिंधु के 20 हजार रुपये अभी तक अलग-अलग जगह बकाया हैं.

बता दें कि राजस्थान में कुक (खाना बनाने वाले) कुशल श्रेणी के मज़दूर शामिल हैं, जिनकी न्यूनतम आय 249 रुपये प्रति दिन है. हालांकि घरेलू कामगार महिलाओं को सरकार की बनाई न्यूनतम आय भी नहीं मिल पा रही है.

कामगार महिलाओं से भेदभाव

कम मजदूरी के अलावा घरेलू कामगार महिलाओं के साथ भेदभाव भी बहुत होता है. एक कामगार महिला कल्पना ने बताया कि लॉकडाउन हटने के बाद अजीब तरह का भेदभाव शुरू हुआ है. मालिक ऐसे पेश आते हैं, जैसे कोरोना का पहला स्रोत हम ही हैं.

वे बताती हैं कि घर में घुसते ही सैनेटाइजर से भिगा देते हैं. काम के वक्त सभी दूर-दूर रहते हैं. हमें अछूत जैसा महसूस कराया जाता है. कई घरों में तो पहले नहाकर काम शुरू करना पड़ता है.

राजस्थान घरेलू महिला कामगार यूनियन में बतौर कोऑर्डिनेटर काम कर रहीं रमा भेदभाव को लेकर कहती हैं, ‘लॉकडाउन से पहले और अब में घरेलू कामगार महिलाओं की स्थितियों में काफी बदलाव आया है. कामगार महिलाओं का ये अधिकार है कि जिस घर में वे खाना बना रही हैं, वहां उन्हें खाना मिले, लेकिन उन्हें बासी खाना दिया जा रहा है. इसीलिए अब बहुत सी महिलाओं ने घर से टिफिन ले जाना शुरू किया है. लॉकडाउन से पहले ऐसा हमने कभी नहीं देखा.’

वे बताती हैं कि सुरक्षा के नाम पर कामगारों को अलग बर्तनों में खाना, जूठा-बासी भोजन और चीजों को छूने तक पर पाबंदी लगाई जा रही है. कोरोना के ऐसे प्रभावों पर कहीं बात नहीं हो रही. आर्थिक के साथ-साथ भेदभाव का रवैया मानसिक तौर पर भी गरीब महिलाओं को प्रभावित कर रहा है.

घर का किराया नहीं दे पा रहीं हैं महिलाएं

राजस्थान सहित पूरे देश में ज्यादातर घरेलू कामगार महिलाएं और उनका परिवार किराये के घरों में ही बसर करता है. लॉकडाउन के दौरान राजस्थान घरेलू महिला कामगार यूनियन की ओर से कराए गए सर्वे में सामने आया कि 75 फीसदी से ज्यादा परिवारों को यहां रहते हुए 10 से 25 साल हो गए हैं. करीब 95 प्रतिशत कामगार महिलाएं किराये के घरों में रहती हैं.

जयपुर की जिन बस्तियों में इन महिलाओं का ठिकाना है, वहां आमतौर पर किराया 2500-3500 रुपये प्रति माह है. बिजली और पानी का खर्च अलग है. करीब 500 महिला कामगारों पर किए सर्वे में सामने आया कि अप्रैल में 89 प्रतिशत और मई में 92 प्रतिशत कामगार परिवार अपना किराया नहीं चुका पाए हैं.

42 साल की गीता इन आंकड़ों की पुष्टि अपने रुंधे हुए गले और मकान मालिक के संवेदनहीन होने के दुख के साथ करती हैं.

जयपुर में घरेलू कामगार गीता चार महीने से अपने मकान का किराया नहीं दे पाई हैं.

जयपुर में घरेलू कामगार गीता चार महीने से अपने मकान का किराया नहीं दे पाई हैं.

वे बताती हैं, ‘मेरा चार महीने का किराया बाकी है. मकान मालिक लगातार किराया मांग रहा है. काम बंद है. बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई का खर्च अलग से बढ़ा है. चारों तरफ से मानो मुसीबतों का पहाड़ टूटा है. किराया मांगते वक्त मकान मालिक बदतमीज़ी से पेश आता है. काम और पैसा नहीं होने की बात पर वो कहीं से भी इंतज़ाम करने का दवाब डालता है.’

गीता कहती हैं, ‘जब हमारे घर में कुछ खाने के लिए ही नहीं है तो हम किराया कहां से भरें? सरकार और प्रशासन हमारी समस्याओं के बारे में जानते हुए भी कुछ नहीं कर रहा है.’

गीता के परिवार में दो बेटे और रिक्शा चलाने वाले पति हैं. वे लॉकडाउन से पहले सात घरों में काम करती थीं. अब सिर्फ एक घर में ही काम मिला है.

सैनेटाइजर के इस्तेमाल से हुआ इंफेक्शन

जिन घरों में कामगार महिलाओं को काम पर बुलाया है, वहां कई तरह की परेशानियों से इन्हें दो-चार होना पड़ रहा है. मसलन, मालिकों द्वारा अधिक सैनेटाइज़र का इस्तेमाल कराना इनकी त्वचा के लिए घातक हो रहा है. कई घरेलू कामगार महिलाओं को स्किन एलर्जी और इंफेक्शन की शिकायतें आई हैं.

जयपुर में बीते 15 साल से सुमन घरों में खाना बनाने का काम रही हैं.

जयपुर में बीते 15 साल से सुमन घरों में खाना बनाने का काम रही हैं.

27 साल की सुमन भी इसका शिकार हुई हैं. सुमन 15 साल से घरों में खाना बना रही हैं. आठ की जगह अब सिर्फ पांच घरों में ही वे काम कर रही हैं. हर घर में घुसने से पहले मालिक उन्हें सैनेटाइज कराता है. काम के दौरान भी बार-बार सैनेटाइज करने का दवाब डाला जाता है.

इससे सुमन के हाथों, नाखूनों में खुजली होने लगी और उनके हाथों की त्वचा उतरने लगी. अब जब इस्तेमाल कम किया है तो इंफेक्शन थोड़ा कम हुआ है.

‘कोरोना का मालिकों में भय इतना भर गया है कि वे हम कामगार महिलाओं को ही वायरस समझने लगे हैं.’ कामगार सिंधु राय ये कहते हुए सैनेटाइजर से जला अपना कुर्ता दिखाने लगती हैं.

वे बताती हैं, ‘हमारे लिए घरों में अलग सैनेटाइजर रखा गया है, जो सस्ता है और शायद नकली भी. जिस दिन मैंने काम शुरू किया तो पहले ही दिन मालिक के लड़के ने मेरे ऊपर इतना सैनेटाइजर छिड़का कि मेरे कपड़े ही जल गए और गुलाबी रंग के कुर्ते पर सफेद निशान आ गए.’

89 प्रतिशत का वेतन कटा, 92 फीसदी नहीं दे पाए मकान का किराया

राजस्थान महिला कामगार मजदूर यूनियन ने मई माह में जयपुर की 500 घरेलू कामगार महिलाओं पर एक सर्वे किया. इसमें इन प्रवासी महिलाओं की बदतर स्थिति सामने आई है.

सर्वे के मुताबिक, अप्रैल में 89 प्रतिशत घरेलू कामगार महिलाओं का उनके मालिकों ने वेतन काटा. इतना ही नहीं सैकड़ों महिलाओं का लॉकडाउन के बाद मार्च महीने के आखिरी हफ्ते का पैसा भी काटा गया.

आर्थिक संकट के कारण अप्रैल में 89 प्रतिशत और मई में 92 फीसदी महिला कामगार घरों का किराया नहीं चुका पाई हैं. एक घरेलू कामगार महिला पर औसतन 9500 रुपये मकान किराया बाकी है.

इसी सर्वे में सामने आया कि लॉकडाउन की घोषणा के वक्त घरों में काम करने वाली इस महिलाओं के परिवारों के पास सिर्फ 15 दिन का ही राशन और बचत थी. इसके बाद ये परिवार राशन के लिए इनकी यूनियन, दानदाताओं के भरोसे ही रहे हैं.

सिर्फ 20 प्रतिशत परिवारों को सरकार की ओर से दी जाने वाली आर्थिक सहायता मिली है. 50 फीसदी परिवारों ने गुजर करने के लिए अपने मालिकों से कर्ज लिया है.

सर्वे में भविष्य में सरकार की ओर से सहायता की मांग में 35 प्रतिशत कामगार महिलाएं चाहती हैं कि उनके मकान का किराया माफ किया जाए. 34 प्रतिशत का मानना है कि उन्हें सरकार की ओर से बैंक में सीधे पैसे ट्रांसफर किए जाएं.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

यूनियन से जुड़ीं मेवा भारती कहती हैं, ‘घरेलू कामगार महिलाएं असंगठित हैं इसीलिए इनसे जुड़ीं समस्याएं भी सरकार पर ज्यादा प्रभाव नहीं डाल पाती. हमने लॉकडाउन के वक्त और बाद में भी प्रशासन को कई बार इनकी जरूरतों और मांगों के बारे में लिख कर दिया है, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया.’

वे कहती हैं, ‘कम मज़दूरी, मालिकों का भेदभाव, मकान मालिकों की दादागिरी और परिवार के अन्य सदस्यों के बेरोजगार होने से घरेलू कामगार महिलाओं का संकट बढ़ गया और इस दर्द को कहीं दर्ज भी नहीं किया जा रहा.’

न्यूनतम मजदूरी न मिलने और कामगार महिलाओं के मानवाधिकार के उल्लंघनों पर राजस्थान श्रम एवं रोजगार विभाग के सचिव नीरज के. पवन बताते हैं, ‘असंगठित श्रमिकों के लिए हाल ही में मुख्यमंत्री ने एक बोर्ड बनाने की घोषणा की है. बोर्ड के बनने से इनके हितों और अधिकारों की रक्षा हो सकेगी. बोर्ड बनने तक लेबर हेल्पलाइन पर शिकायत की जा सकती है.’

विभाग की ओर से खुद कार्रवाई को लेकर नीरज कहते हैं कि वो लेबर कमिश्नर से सैनेटाइज़र के ज्यादा इस्तेमाल, कम मजदूरी जैसे विषयों पर बात करेंगे और विभाग कार्रवाई करेगा. हम कोशिश करेंगे कि इनके मानवाधिकार सुरक्षित किए जाएं.

सुरक्षा के लिए कोई कानून तक नहीं

घरों में काम करने वाली महिलाओं की संख्या देशभर में करोड़ों में हैं. इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद देश में घरेलू कामगार महिलाओं के हितों की सुरक्षा के लिए कोई कानून तक नहीं है. राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र सहित कुछ ही राज्यों में इन्हें न्यूनतम मज़दूरी एक्ट में जोड़ा गया है.

स्पष्ट कानून न होने और उससे होने वाले नुकसान को लेकर गुजरात में मजदूर और महिला अधिकारों पर काम कर रहीं मीना पटेल बताती हैं, ‘घरेलू कामगार महिलाओं की स्थिति दो तरह से समझी जा सकती है. पहली कोरोना से पैदा हुई परिस्थिति और दूसरा आज़ादी के बाद से अब तक इस समूह को सरकारों द्वारा नजरअंदाज करना. जो सामाजिक सुरक्षा कानून अभी बना हुआ है वो किसी काम का नहीं है.’

वे कहती हैं, ‘इस कानून में घरेलू कामगार महिलाएं शामिल हैं, लेकिन इसका फायदा नहीं मिल रहा. कानून में हेल्थ, एजुकेशन, पोस्ट रिटायरमेंट, चाइल्ड केयर कवर होना चाहिए, लेकिन ये इसमें शामिल नहीं हैं. इसके अलावा काम के घंटे, काम के दौरान मिलने वाली सुविधाएं और छुट्टियों के बारे में भी कुछ स्पष्ट नहीं है.’

वे आगे बताती हैं, ‘साल 2009 में कई जन संगठनों ने घरेलू कामगार महिलाओं के लिए अलग से कानून बनाने की लड़ाई शुरू की. राष्ट्रीय महिला आयोग ने इसी साल इस विषय से संबंधित एक ड्राफ्ट पर चर्चा के लिए कमेटी बनाई. कमेटी ने 2010 में कानून का ड्राफ्ट तैयार किया था, लेकिन इस ड्राफ्ट पर किसी सरकार ने काम ही नहीं किया. हम अभी भी उस कानून की मांग कर रहे हैं.’

पटेल कहती हैं, ‘दरअसल ऐसे मुद्दे अब न तो सरकार की प्राथमिकता में हैं और न ही मीडिया के. 11 साल से ड्राफ्ट पर सरकार ने एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया. अगर आज घरेलू कामगारों से जुड़ा कोई कानून होता तो शायद कोरोना के बाद उनकी ये हालत न होती.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)