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मथुरा की अदालत का फ़ैसला और संविधान

संविधान और संवैधानिक सोच सिर्फ़ कागज़ पर लिखे लफ्ज़ नहीं हैं. यह सोच हमें जीनी है, आगे बढ़ानी है. ठीक वैसे ही जैसे मथुरा की अदालत ने बुधवार को अपने फ़ैसले में किया.

मथुरा में कृष्ण जन्मस्थान मंदिर. (फोटो साभार: www.uptourism.gov.in)

मथुरा में कृष्ण जन्मस्थान मंदिर. (फोटो साभार: www.uptourism.gov.in)

नई दिल्ली: मथुरा की एक अदालत ने बुधवार को एक केस ख़ारिज किया. लखनऊ की सीबीआई अदालत में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले के फैसले के चलते इस फैसले पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया गया लेकिन यह फैसला शायद उस फैसले से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है.

यह केस मथुरा की ईदगाह मस्जिद के खिलाफ किया गया था. इसमें यह कहा गया था कि ईदगाह मस्जिद कृष्ण देव मंदिर के हिस्से को तोड़कर बनाई गई थी.

इस केस में यह भी कहा गया था कि मराठाओं ने मस्जिद तोड़कर मंदिर फिर बनवा दिया था. 1968 में श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान ने ईदगाह ट्रस्ट से केस के तहत समझौता किया, जिसके तहत विवाद को सुलझा लिया गया.

अब 52 साल बाद कुछ लोगों ने नया केस दायर किया यह कहके कि पुराने केस में कुछ तकनीकी कमियां रह गई थीं इसलिए वो माननीय नहीं है.

वैसे तो संपत्ति के विवाद कोर्ट में 12 सालों के भीतर दायर होने होते हैं. किसी पुराने केस के फैसले को वैसे भी नए केस में बिना अपील के नहीं बदला जा सकता. लेकिन बात इन मुद्दों तक पहुंची नहीं.

18 सितम्बर 1991 को संसद में एक कानून पारित किया गया था जिसका नाम है उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम. यह कानून कहता है कि भारतीय कानून 15 अगस्त 1947 को हर उपासना स्थल के चरित्र का एक ‘कट ऑफ डेट’ मानेगा.

इसका मतलब है कि जो भी स्थल या इमारत 15 अगस्त 1947 के दिन किसी भी धर्म के अनुयायियों द्वारा इस्तेमाल की जा रही थी वह उसी धर्म के अनुयायियों के द्वारा इस्तेमाल की जाती रहेगी.

इस कानून में बस अयोध्या राम जन्मभूमि को अलग रखा गया था. इसी कानून में किसी भी उपासना स्थल का चरित्र बदलने पर भी पूरी रोक लगाई गई है.

इस कानून को लाया गया था ताकि आनन-फानन राजनीतिक या अन्य मक़सदों के चलते हर मंदिर-मस्जिद पर विवाद न खड़ा होने लगे. यही कानून इस नए केस को फौरन खत्म करने के काम आया है.

वैसे केस पढ़कर ही काफी ऐसे तर्क सामने आते हैं, जो केस को कमज़ोर बनाते हैं. इस केस में औरंगज़ेब का नाम और बार-बार हिंदू मुस्लिम विवादों का सिला दिया गया.

विवाद असली हो या बनावटी, जब तक यह फैसला होता, तब तक कई राजनीतिक रोटियां सिंक गई होतीं. अदालत ने संविधान और कानून के तहत फैसला दिया. असल में उपासना स्थल कानून सिर्फ मामूली कानून नहीं है.

इसमें शामिल सिद्धांतों को पिछले साल के अयोध्या राम जन्मभूमि फैसले में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने संविधान का ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ या ‘मूल रूप’ का दर्जा दिया है.

उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि यह कानून संविधान के मूल रूप की सुरक्षा के लिए बनाया गया है. इसका महत्व यह है कि संसद भी संविधान के मूल रूप को नहीं बदल सकती. जब तक भारत गणराज्य रहेगा तब तक संविधान के दिए हुए अधिकार भी रहेंगे.

सीबीआई अदालत द्वारा दिया गया बाबरी विध्वंस मामले का फैसला मुस्लिम पक्ष के लिए बहुत निराशाजनक था. उस फैसले की अपील होगी.

पर निराशाजनक फैसले के साथ ऐसे सकारात्मक फैसलों पर भी ध्यान देना ज़रूरी है. संविधान और संवैधानिक सोच सिर्फ कागज़ पर लिखे लफ्ज़ नहीं हैं. यह सोच हमें जीनी है, आगे बढ़ानी है.

देश की उन्नति, सबका विकास संविधान के उसूलों पर ही चलकर पाया जा सकता है. आजकल राजनीतिक मुद्दों को कई ढंग से पेश किया जाता है, लेकिन असली असली लड़ाई एक ही है, संविधान की सुरक्षा और संवैधानिक सोच के बढ़ावे की.

इसे नकारना सबसे बड़ा देशद्रोह है. देश की प्रगति इस ही पर निर्भर है. जैसे बुधवार को मथुरा की कोर्ट ने किया है, आगे भी संवैधानिक सोच देश की शांति और अहिंसा की सुरक्षा करती रहेगी.

(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं.)